सुबकते पन्नों पर बहस : एक सार्थक संवाद
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सुबकते पन्नों पर बहस : एक
सार्थक संवाद
कवि-आलोचक डॉ. अनिल पांडेय ने सुबकते पन्नों पर बहस की कविताओं के माध्यम से समकालीन हिंदी कविता पर जो आलोचनात्मक टिप्पणियां दी हैं वे सुबकते पन्नों पर बहस के कवि अनुज देवेंद्र धर के लिए तो निसंदेह उत्साहवर्धक होंगी ही -कविता के मर्मज्ञ पाठकों के लिये भी लाभप्रद होंगी जो साहित्य के इस दमघोटू माहौल में श्रेष्ठ कविताओं की तलाश करते रहते हैं। दिल की गहराइयों से आपका आभार डॉ अनिल पांडेय ।
अपने इस संवाद में कवि देवेंद्र धर की कविताओं पर टिप्पणी दर्ज करते हुए
डॉ. अनिल पांडेय कहते हैं:...ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं देवेन्द्र धर के पास जिनको आप मजबूत कविताएँ कह सकते हैं...यह संग्रह अमूमन सुबकते पन्नों पर बहस जो शीर्षक है उसको इतनी सार्थकता के साथ अभिव्यक्त करता है, इतनी सार्थकता के साथ मजबूती देता है कि आप कल्पना नहीं कर सकते|" अनिल पांडेय जी ने गांव अब लौट जा कविता से अपना संवाद प्रारंभ किया।संग्रह की एक सशक्त कविता इंतज़ार पर भी इस संवाद में चर्चा की है।कविता की अंतिम पंक्तियों- हम जानते हैं/बीज हैं हम फिर उगेगें/बस मौसम और खाद का इंतजार है-पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आपने कहा है:"बस मौसम और खाद का इंतजार है और ये कि बीज हैं
हम फिर उगेंगे यह एक कविता की सबसे मजबूत सम्भावना है कि जो बार-बार दबाए कुचले मारे जाने के बाद भी उग आने और अपनी उपस्थित दर्ज करवाने के लिए वह संकल्पित है और प्रतिबद्ध| एक और कविता मैं- वो गीत नहीं लिखूंगा- पर डॉ पांडेय का महत्वपूर्ण व्यक्त है:
"...कवि जो कहना चाहता है या लिखना चाहता है वह मजबूती के साथ लाता है|
उसको लय से नहीं लेना देना, उसको तुकबंदियों से नहीं लेना-देना और सच में जिसको आप लोकप्रिय कहते हैं...लोकप्रिय होना एक अलग बात है...लोकहित में होना एक अलग बात है| छंदबद्ध और छंदमुक्त के बीच संघर्ष और लड़ाइयों की जो वजह है और लोकप्रियता और लोकहित की भी तो लोकप्रिय कवि नहीं होना चाहता| कवि अगर पर्दे के पीछे भी है और अगर लोकहित में मजबूत अभिव्यक्ति दे रहा है लोकप्रिय ना भी हो तो उसे कोई
अपेक्षा नहीं है| "
आपका कवियों और प्रकाशकों को निम्न संदेश वस्तुतः अत्यंत महत्वपूर्ण है: "...प्रकाशक भी यदि अपनी ज़िम्मेदारी को ठीक से समझे और कवि...जो महानगरों तक सीमित हो जा रहे हैं वह अगर गाँव में बढने और पहुँचने का ख्व़ाब पालें जैसे एक समय बिसारती हुआ करते थे गाँव में जो चूड़ियाँ, कंगन वगैरह बेचते हैं, अगर उस तरीके से ये कविता लेकर लोगों को सुनाने के लिए
निकले तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये ऐसी कविताएँ हैं जो एक मजबूत नींव डाल सकती हैं परिवर्तन और बदलाव की ।
परिवर्तन और बदलाव अचानक नहीं आते ये धीरे धीरे आते हैं, धीरे धीरे कार्य करते हैं धीरे धीरे लोगों की चेतना में प्रवेश करते हैं और धीरे धीरे लोग अपने घरों और महलों को छोड़कर सडकों पर आते हैं| यह शुरुआत भी कवियों को करना पड़ेगा| गीत ऐसा लिखना पड़ेगा कि उससे आन्दोलन और क्रांति की आवाज़ आए|"
साभार
खाली भरे हाथ का विमोचन
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पुस्तक खाली भरे हाथ का विमोचन हिमाचल प्रदेश के महामहिम राज्यपाल श्री शिव प्रताप शुक्ल ने आज
किया। पुस्तक में 78 बोध कथाएं है । इन बोध कथाएं को आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र ने
हिन्दी में लिखा है और राम लाल वर्मा राही ने इसका पहाड़ी बोली क्यौंथली में अनुवाद किया है। पुस्तक प्रेरक बोध कथाओं से परिपूर्ण है। पुस्तक
पठनीय और संग्रहणीय है।
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अरुण आदित्य के उपन्यास पर संजीव
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| अरुण आदित्य |
संजीव लिखते हैं-------अरुण आदित्य का ‘उत्तर वनवास’ न सिर्फ़ औपान्यसिक संगठन, बल्कि प्रयोग, भाषा और शैल्पिक तथा वैचारिक परिपक्वता के लिहाज़ से भी एक सुगठित रचना के रूप में सामने आया है। उत्तर भारतीय जन जीवन में गहरे तक पैठा राम चरित्र मानस ही आधार है इस उपन्यास का और यही उसकी जड़ता का कारण। जो भी सचेत व्यक्ति आता है भारत में बिना जाति से टकराये आगे नहीं बढ़ पाता और उत्तर भारत में बिना राम चरितमानस से टकराये...। बाबा रामचन्द्र दास का किसान आंदोलन इसे धनात्मक रूप में अपनाता है तो प्रख्यात बंगला कथाकार सतीनाथ भादुड़ी अपने महाकाव्यात्मक आख्यानात्मक उपन्यास ‘दोंड़ाय चरितमानस’ के एंटी मैटर के रूप में पस्तुत करते हैं। दोंड़ाय राम की तरही चक्रवर्ती राजा दशरथ के पुत्र नहीं, राम चरित मानस गा-गाकर भीख मांगने वाले एक भीखमंगे की अवैध संतान है जिसकी मां किसी के साथ भाग गई है। दोंड़ाय का अध्याय विभाजन भी मानस का विद्रूप है। अरुण भले ही ऐसा साहस नहीं दिखा पाये हों लेकिन पारम्परिक रामकथा को लीक से हटाकर आज की कथाभूमि तक ले आने का सत्साहस अवश्य करते हैं। उपजीव्य को चुनने के पीछे उत्तर भारत के प्रधान अंतर्विरोध का चयन उनकी लेखकीय निष्ठा को प्रतिष्ठित करता है।
गांव के आखिरी छोर मकान नम्बर 151 में रहने वाले मायाराम और मंगला का बेटा है उनका रामचन्द्र। उन्हें लगता है मकान में नहीं दफ़ा 151 में रहते हैं, पुलिस जब चाहे उन्हें दबोच लेगी। बबूल के कांटे, बांस की कोठ और बिलों विवर से झांकते विषधर.... और माता-पिता का डर . उन्हीं के बीच पल रहा है उनका नायक और तमाम अन्तःवाह्य, काल्पनिक-वास्तविक यात्राओं से उपजे मोहभंगों का शिकार है। ‘राजनीति’ यहां ‘रामनीति’ है और भय उपन्यास की केन्द्रीय धुरी....।
‘‘दरअसल हम एक डरे हुए समय में जी रहे हैं, डरी राजनीति, डरा हुआ धर्म, डरा हुआ समाज बहुत खतरनाक होते हैं। और सबसे ज़्यादा खतरनाक होती है डरी हुई पत्रकारिता। और यह हमारे देश् का दुर्भाग्य है कि हमें इन डरी हुई चीज़ों के बीच रहना पड़ रहा है।’’
वर्ण के लिहाज़ से राम सवर्ण हैं। मगर वर्ग के लिहाज़ से निम्नवर्ग के। और वर्ण हार जाता है वर्ग से। डर का कारण फूलकली और नूरजहां का सौन्दर्य है और रामचन्द्र की पात्रता(योग्यता) भी। सवर्ण रामचन्द्र को उन्हीं की जाति के छोटे कुंवर राहुल सिंह उत्पीड़ित करते रहते हैं। गांव से त्रस्त रामचन्द्र फैज़ाबाद आते हैं। वहां से सत्यानंद का भाषण, बाबरी मस्जिद विध्वंस और क्रम से घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएं रामचन्द्र के पुराने वनवास को नया अर्थ प्रदान करती हैं। वैसे यहां बोधिवृक्ष भी है। नदी के तट पर खड़ा अश्वत्थामा। अपनी निष्ठा से रामचन्द्र इस ‘राजनीति’, ‘रामनीति’ में भी प्रभावशाली बनते चले जाते हैं। और एक दिन गांव लौटते हैं तो जिस रामलोक की या स्वप्नलोक की परिकल्पना में उन्होंने इतने दिन गवाएं, यह देखकर उन्हें धक्का लगता है कि वह दुःस्वप्न में परिणत हो चुका है। राम के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी का चरित्र और कुछ पात्रों के चेहरे इतने पारदर्शी हैं कि सहज ही पहचाने जा सकते हैं। लेखक का संकेत भी स्पष्ट है। लेखक ने ‘बांयी ओर जा रही एक उबड़-खाबड़ पगडंडी’ लिखकर अपनी वामपक्षधरता स्पष्ट कर दी है। दलित पक्षधरता और सवर्णों पर दलित प्रेम पर भी वे कटाक्ष करने से नहीं चूकते --‘‘वे हरिजनों के दुःख-दर्द को महसूस करना चाहते थे लेकिन उन्हें लगता है कि उसके लिए रैदासी टोले में पैदा होना पड़ेगा जोकि उनके हाथ में नहीं है।’’ या
‘‘लोकनीति और मर्यादा तय करने वाले तो हम ही हैं-सबरी के बैर भी हमीं खाते हैं और एकलव्य का अंगूठा भी हमीं कटवाते हैं।’’ गांव आने पर रामचन्द्र पाते हैं कि सुविधावादी चेहरे गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं जो उत्तर प्रदेश की राजनीति पर शत-प्रतिशत सही बैठता है।
अरुण ने कहानी से नहीं, कविता से उपन्यास में पदार्पण किया है, लेकिन भाषा की विरल व्यंजनाओं को जिस तरह साधा है, जिस तरह फ्लैश बैक, स्वप्न, डायरी, कविता, बिम्बों और फंतासियों का बहुविध प्रयोग किया है, वह उनके अन्दर छुपी संभावनाओं को दर्शाता है। अलबत्ता अरुण भी सायास शैल्पिक और भाषिक रचाव के मोह से मुक्त नहीं हैं। धनात्मक पक्ष इसकी ताकत बनता है और ऋणात्मक पक्ष उनके फैलावों के हाथ बांधे रखता है। जैसे - उपन्यास की उठान वे जहां से करते हैं अर्थात् वर्ग बनाम वर्ण उनकी हकीकत का सामना किया जा सकता था लेकिन शैल्पिक संरचना जगह-जगह उनका रास्ता रोक लेती है। एक अंश देखिए -- ‘‘रामचन्द्र उसके पीछे इतनी तेज़ी से लपके कि नींद से बाहर निकल गए। नींद से बाहर आने के बाद भी सपने से बाहर आने में उन्हें काफी देर लगी।’’ विशिष्ट बनायेगा लेकिन जनता से जोड़ने में आड़े आयेगा।
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