लघुकथा : बसन्त की आशा

 

काका रामशरण के पिताश्री अनपढ़ खेतिहर थे।उनकी इस अयोग्यता ने एक मिशाल गढ़ दी थी,उन्होंने अपने बेटे को गाँव का सबसे ज्यादा पढा -लिखा दिया।रामशरण के लिए माता-पिता ही भगवान थे। शादीशुदा रामशरण नौकरी की तलाश मे जब शहर पहुंचा तो उसका सिर चकरा गया।अपने भी अनजान और पराये लग रहे थे। बेरोजगारी का भूत डरा रहा था।शो रुम के कपड़ों के डिस्प्ले को देखता तो खड़ा होकर निहारता और मन ही मन सोचता काश मैं अपने मां बाप और बच्चे के लिए खरीद पाता। 

पंचवर्षीय बेरोजगारी के बाद उसने अपने पिता के हर सपने को सजाया,बच्चों की ऊंची तालिम के लिए खुद टूटता रहा परन्तु किसी को भनक नहीं लगने दिया ।

 

बेटी की डोली उठी बहू की डोली रामशरण के घर भी आई। बहू को परिवार मे मान-सम्मान और ऊंचा दर्जा मिला परन्तु यह सम्मान बहू के मां बाप को नहीं भाया उन्होंने ने बेटी को ससुरालजनों का विरोधी बना दिया ताकि उसके मां बाप अपने आधा दर्जन बच्चों का घर बसा सके ।

दिमाग से पैदल बेटी ने मां बाप का साथ दिया, पति का टार्चर खुद और उसके मां बाप ने किया। रामशरण का बेटा  ध्यानदत्त सास-ससुर और पत्नी के शरणागत  हो गया ताकि दहेज के जुर्म मे उसके मां- बाप,भाई-बहन को सलाखों के पीछे ना जाना । बहू और उसके मा -बाप की साजिश ने बूढ़े रामशरण और उनकी पत्नी को आंसू से रोटी गीला करने को मजबूर कर दिया ।

बूढ़े रामशरण बूढी सगुनी उम्मीद मे जी रहे थे कि उनकी खुरापाती बहू का मोहभंग एक दिन होगा। बहू लालची मां- बाप की चौखट का त्याग कर अपने गृहस्थ जीवन को खुशहाल बनायेगी। सास ससुर की पतझड़ सी जिन्दगी को बसन्त सरीखे सजायेगी  

लम्बी तपस्या के बाद बूढ़े रामशरण बूढी सगुनी विश्वास यकीन मे तो बदला,बसन्त की आशा अलंकृत हुई । बहू के मां -बाप समाज की नजरों मे बहुत नीचे तक गये थे परन्तु  रामशरण ने हाथ बढ़ा दिया था।

 

डां नन्दलाल भारती

 

लघुकथा :हिस्से का आसमान --- नन्द लाल भारती

 


पिताजी दुर्घटना के शिकार हो गए और चल बसे। मां भी यह सदमा ज्यादा दिनों तक नहीं ढो सकी । दिल धीरे-धीरे धडकना बंद करने लगा ।अन्तत: सांसे जहां की तहां थम गई।अब इकलौती बेटी पुष्पा भाईयों के अनुशासन और परवरिश में पल-पढ-बढ़ रही थी ।भाईयों ने कोई कोतहाई नहीं बरता । बहन के हिस्से के दर्द का रसपान भी किया। मांता-पिता की इच्छा के अनुसार शिक्षा और संस्कार  दिये ।

भाईयों ने बहन पुष्पा का ब्याह बड़े रज-गज से किया। दिखावे पर  पैसा पानी की तरह बहाया। कई गांवों मे ब्याह की चमक चर्चित हुई। वाहवाही भी बहुत मिली ।शादी के दिन की चकाचौंध पुष्पा को बेचैन कर रही थी आंखें भी बरस रही थी ।

दूल्हे राजा अच्छे मिले हैं, कम्पनी मे मैनेजर हैं, हर खुशी तो है,फिलहाल कोई कमी तो नहीं है पुष्पा की बड़ी भाभी बोली ।

मै बहुत खुश हूँ पर भाभी जो पैसा भाई लोग पानी की तरह बहा रहे है, इसका थोड़ा सा हिस्सा मेरे कैरिअर पर बहा दिये होते तो मैं अपने पैरों पर खड़ी होती। मैं भी पा लेती अपने हिस्से का आसमान ।

भाभी माथा चूमते  हुए बोली ऐसा तो सोचा ही नहीं ।

भाभी अब सोचना मुनिया के लिए ताकि मुनिया पा ले अपने हिस्से का आसमान पुष्पा बोली ।

डां नन्दलाल भारती

07/07/2021

 

मोटर साइकिल --- पंकज वर्मा

बड़े गुस्से से मैं घर से चला आया ..इतना गुस्सा था की गलती से पापा के ही जूते पहन के निकल गयामैं आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा …जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें है …..आज मैं पापा का पर्स भी उठा लाया था …. जिसे किसी को हाथ तक न लगाने देते थे…मुझे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी ….पता तो चले कितना माल छुपाया है …..माँ से भी …इसीलिए हाथ नहीं लगाने देते किसी को..जैसे ही मैं कच्चे रास्ते से सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है….मैंने जूता निकाल कर देखा …..मेरी एडी से थोडा सा खून रिस आया था …जूते की कोई कील निकली हुयी थी, दर्द तो हुआ पर गुस्सा बहुत था ..और मुझे जाना ही था घर छोड़कर …जैसे ही कुछ दूर चला ….मुझे पांवो में गिला गिला लगा, सड़क पर पानी बिखरा पड़ा था ….पाँव उठा के देखा तो जूते का तला टुटा था …..जैसे तेसे लंगडाकर बस स्टॉप पहुंचा, पता चला एक घंटे तक कोई बस नहीं थी …..मैंने सोचा क्यों न पर्स की तलाशी ली जाये ….मैंने पर्स खोला, एक पर्ची दिखाई दी, लिखा था..लैपटॉप के लिए 40 हजार उधार लिएपर लैपटॉप तो घर मैं मेरे पास है ?दूसरा एक मुड़ा हुआ पन्ना देखा, उसमे उनके ऑफिस की किसी हॉबी डे का लिखा थाउन्होंने हॉबी लिखी अच्छे जूते पहनना ……ओह….अच्छे जुते पहनना ???पर उनके जुते तो ………..!!!!माँ पिछले चार महीने से हर पहली को कहती है नए जुते ले लो …और वे हर बार कहते “अभी तो 6 महीने जूते और चलेंगे ..”मैं अब समझा कितने चलेंगे……तीसरी पर्ची ……….पुराना स्कूटर दीजिये एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये …पढ़ते ही दिमाग घूम गया…..पापा का स्कूटर ………….ओह्ह्ह्हमैं घर की और भागा……..अब पांवो में वो कील नही चुभ रही थी ….मैं घर पहुंचा …..न पापा थे न स्कूटर …………..ओह्ह्ह नहीमैं समझ गया कहाँ गए ….मैं दौड़ा …..औरएजेंसी पर पहुंचा……पापा वहीँ थे ……………मैंने उनको गले से लगा लिया, और आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया ..…..नहीं…पापा नहीं…….. मुझे नहीं चाहिए मोटर साइकिल…बस आप नए जुते ले लो और मुझे अब बड़ा आदमी बनना है..वो भी आपके तरीके से …।।“माँ” एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और दुख जमा कर सकते है…और“पापा” एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी हमारे सपने पूरे करने की कोशिश करते है……..मैं अपने पेरेंट्स से प्यार करता हुँ

अनपढ़ - रतन चंद 'रत्नेश'

अपनी कोठी में कुछ काम कराने के लिए बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने, जगह-जगह से पैबंद कुरते में था।
बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या नाम है तेरा?’’
‘‘जी बाबू.... सुखी राम।’’
बाबू रामदयाल मन-ही-मन मुस्कुराए, उसके नाम पर शायद।
रास्ते में एक जगह मस्जिद के सामने खड़े होकर सुखी राम माथा टेकने की मुद्रा में खड़ा हो गया।
बाबू रामदयाल को आश्चर्य हुआ और वे दूरदर्शनी डायलाग बोलने लगे --
‘‘क्यों बे, तू मुसलमान है क्या?’’
‘‘नहीं-नहीं बाबू... हम तो हिन्दू हैं।’’
‘‘तो फिर मस्जिद के सामने सर काहे नंवा रहा है?’’
सुखी राम सहजभाव से कहने लगा ---
‘‘हम तो अनपढ़-गंवार हैं बाबू जी। हमार खातिर का मस्जिद और का मंदिर, सब एक ही हैं। इनका भेद तो आप जैसे पढ़े-लिखे लोगन को ही ज्यादा पता है।’’

लघुकथा शोर -रजनीकांत

वे दिन भी कितने अलौकिक होते थे। जब हम बच्चे गाँव में धमाचौकड़ी मचाते। दो महीनों की छुट्टियों में सभी बच्चे इकट्ठे होते। आमों के पेड़ पर आम खूब लगते। रसदार आम। पीले पीले आम ,हरे हरे आम। उन दिनों आम भी खूब लगते।मकान के सभी कमरे आमों से भरे होते।सभी बच्चे बनायन डाले बाल्टियों में रखे आम चूसते। बच्चे तो सभी के सांझे होते हैं। बड़े बुजुर्गों का यही विचार था । किसी भी आम के पेड़ से आम ले आओ। कोई बंधन न होता। शाम को एक चबूतरे पर सभी इकट्ठे होते। आरती करते। भजन गाते। बड़े बुजुर्ग ,औरतें इसमें शामिल हो जाते। बेहड़ा भरा - भरा लगता। मुहल्लें में लगभग सभी लोगो ने पशु रखे हुए थे । खूब दही -दूध होता।जिस घर में घुस जाते दूध बड़ा गिलास स्वागत करता। चाय कहाँ थी? सभी लोग तब चाय के स्थान पर लस्सी पीया करते थे।
इतने सारे बच्चे। शोर से बुजुर्ग बूढ़े तंग आ जाते।
-ओये। परे जाकर खेलो। मूओ। काम करने दो। इतना शोर।
अब परिदृश्य बदल गया है । कई वर्षों बाद गाँव आया हूँ। सब कुछ वही है । हमारे पांच बेहड़ों में से केवल दो बेहड़ों में ही लोग रहते हैं। शेष सभी घरों में ताले लग गये हैं। कुल मिलाकर पांच जन हैं।उनकी आपस में भी नहीं बनती। एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं। सभी के बच्चे कमाई करने परदेस चले गये हैं। पीछे बूढ़े और बूढ़ियाँ रह गये हैं। जो अपने अंतिम दिन गिन रहे हैं। और संतानों को कोस रहे हैं।
-हमने अपने माँ बाप को कौन सा सुख दिया था जो अब हमें सुख का सांस मिलेगा। सुख तो अपने कर्मों का होता है। भाई। किसी के कदमों की आहट का इंतज़ार करते रहते हैं कि कोई आये और हमारे साथ बातें करे। यहाँ के लोग तो एक दूसरे के बैरी हैं। बच्चों के शोर सुनने को कान तरस जाते हैं। कहीं से कोई आये और गोदी में घुस जाये।हम उन्हें पुचकारें। उनसे तोतली तोतली बातें करें। क्या करें ?बस , पुराने दिनों को चेते(याद ) करते रहते हैं। ऐसे अपने जीवन के दिन काट रहे हैं ,मुन्नुआ। जब बच्चे पूरे मुहल्ले को सिर पर उठा लेंगे ? उसी पल का इंतज़ार कर रहे हैं। न जाने वह पल कब आएगा ?
हरिया ताऊ ने अपना दिल मेरे आगे खोल कर रख दिया है ।मैंने देखा उनकी आँखों में आंसू हैं।
-रजनीकांत

लघुकथा -काले चश्मे वाली ---- रजनीकांत'

वह अक्सर मुझे कॉलेज जाते हुए बस स्टैंड पर बस की प्रतीक्षा करती हुई मिलती।मैंने नोट किया उसकी आँखों पर प्राय: काला चश्मा चढ़ा होता। बह सूट से मैच करते हुए जूते पहनती। हाथ में उसी से मैच करता पर्स पकड़े होती। मैं ही क्यों ,कोई भी उसकी ओर आकर्षित हो जाता । यह शायद पहला प्रथम दृष्टया प्रेम था। हो सकता है कि एक तरफा प्रेम रहा हो।उसकी भाव भंगिमाएं बड़ी आकर्षित होती। क्यों मैं उसकी ओर खींचता चला गया। मुझे इसका आभास तक नहीं हुआ। मैं भी पांच फुट का गठीला युवक था। यूँ कह लो यौवन कि कश्ती में सवार था। उसे मैं अक्सर बस स्टैंड पर प्रतीक्षा करते हुए पाता।एक दिन वह मेरे साथ वाली सीट पर आकर बैठ गई। बात मैंने ही शुरू की
-मैडम कहाँ तक जाएँगी आप ?
-जी सुभानपुर। जैसे किसी ने मेरे कानों में शहद घोल दिया था।
-अरे मैं भी तो सुभानपुर ही जा रहा हूँ। मैंने दो टिकटें ले ली!तभी से जान पहचान हुई। और मैत्री का संबंध स्थापित हो गया। उसने मुझे बताया कि वह महिला महा -विद्यालय में कला स्नातक कर रही है। अक्सर हम दोनों मिलने लगे। प्रेम परवान चढ़ता गया। प्रेम का छोटा सा पौधा अब एक वृक्ष का .रूप ले चुका था।प्रेम पत्रों ,छापे छल्लों का आदान -प्रदान होने लगा। हम बाहर रेस्तरां में मिलने लगे। काले चश्मे का रहस्य अभी भी बना हुआ था। उसने मुझे बताया कि उसके पिताश्री आर्मी में ऊँचे पद पर हैं। और वे जाति बंधन को नहीं मानते। बिलकुल खुले दिल के हैं। मेरा स्नात --कोत्तर का अंतिम वर्ष था।पढ़ने में किसी से कम न था। मैंने एक दिन उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। वह कई दिनों से इसे टालती आ रही थी। मैं भी कहाँ मानने वाला था। उसे भी मैंने अल्टीमेटम दे दिया। इस महीने की15 तारीख तक अगर तुम्हारा जवाब नहीं आया। तो मैं तुमसे कभी भी नहीं पूछूंगा। 15 तारीख भी निकल गई। अब वह पिछले दो हफ्तों से गायब थी। मैं उसकी प्रतीक्षा में घंटो बस स्टैंड पर खड़ा रहता।उसका कहीं अता - पता न था। तब उस समय यह मोबाइल कहाँ थे? कोई संपर्क का साधन तक न था। एक दिन मैं विचारनिमग्न बस स्टेण्ड पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। एक छोटा सा लड़का मुझे एक रुक्का नुमा एक पत्र पकड़ा गया। मैंने पत्र खोला पढ़ने लगा -
रतन जी। पता नहीं आप मुझे क्यों अच्छे लगने लगे। आप से मैं मन ही मन प्रेम करने लगी । मुझे आप अन्य युवकों से हटके ,एक दम अलग लगे। मेरी हिम्मत नही पड़ी कि मैं अपने पिता जी को आपके प्रस्ताव के बारे में बता पाती ।पता नहीं क्यों में ऐसा नही कर पाई। मैं एक सच्ची पक्की इंसान हूँ। किसी को मैं अँधेरे में रखना नहीं चाहती हूँ ! आपको मैं बता दूं कि मेरी बाईं आँख पत्थर की है। मैंने बहुत प्रयत्न किया कि आपको यह राज़ बता दूं। पर न जाने क्यों , मैं यह साहस जुटा नहीं पाई।मुझे आपने अपने हृदय में जगह दी।आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आपको कोई सुंदर कन्या मिल जायेगी। कोई अछा रिश्ता देखकर आप शादी कर लेना। मुझे एक बुरा सपना समझ कर भुला देना। आपसे यही प्रार्थना है बस। मुझ पर जैसे बज्रपात हुआ था।आँखों के आगे अँधेरा छा गया था। मुझे पता चला वह शहर को छोड़ कर कहीं और चल दी थी। इस घटना के इतने वर्षों बाद , पता नहीं क्यों वही काले चश्मे वाली अब भी वह गाहे -बगाहे मेरे मानसपटल पर दस्तक अवश्य देती रहती है।ऐसे सच्चे पक्के इंसान आजकल मिल पाएंगे ?जेहन में प्रश्न उठता अवश्य है।

संस्कार #लघुकथा /सतीशराज पुष्करणा

गली की नुक्कड़ पर दो आदमी खड़े गरमा-गरम बहस कर रहे थे । दोनों एक दूसरे को जान से मार देने पर उतारू थे । 
उसने छोटे भाई से संबोधित संबोधित होते हुए कहा- " क्यो बे, भूल गया तू ? जब तेरे बड़े भाई ने तुझे मार कर सड़क पर फेंक दिया था, तो मैंने ही अपना ख़ून देकर तेरी जान बचायी थी । और आज तू उसी के लिए मुझे....।"
" क्यों नहीं ! हम दोनों भाइयों का ख़ून एक है और जो ख़ून तूने दिया था - वह यही बोल रहा है ।"
- सतीशराज पुष्करणा

संगीन अपराध- अरूण डोगरा रीतू





गरीब थी ,बेचारी रोज शहर में दिहाड़ी कमाने जाती, शाम ढलते ही वापस घर आ जाती थी । एक दिन उसकी बस छूट गई । बस अड्डे पर अकेली खडी थी । तभी एक दम तेज गति से एक कार रूकी,एक दादा टाईप लड़का उसके पास आया, बोला कहां जाना है, जी रामनगर !चलो कार मे छोड़ दें । जी नहीं लेकिन उस बदमाश ने भी उसे जबरदस्ती कार में बिठा लिया और मंत्री के फार्म हाउस पर ले गया । वहां पर मंत्री के बेटे और उसके चार अन्य साथियों ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया । लड़की ने थाने में मंत्री के बेटे के विरूद्व रिर्पोट दर्ज करवा दी । सुबह समाचार पत्रों में मंत्री के लड़के द्वारा सामूहिक बलात्कार की खबर सुर्खियों में छप गई । पुलिस ने तुरन्त मंत्री के लाडले को गिरफतार कर लिया और थाने ले गई । तभी थाने में फोन की घंटी बजी, थानेदार ने फोन का रिसीवर उठाया तो मंत्री जी का फोन था,थानेदार अपनी खैरियत चाहते हो तो अभी मेरे बेटे को छोड़ दो वरना ! थानेदार जी सर अभी छोड देता हूं ! थानेदार ने मंत्री के लाडले को छोड़ दिया क्योंकि संगीन अपराध पर राजनीति हावी हो चुकी थी।

या अल्लाह, इन्सानों को किसी मुफ़्लिस का जिगर दे


JAGDISH BALI 
गुज़िश्ता चंद रोज किसी रिश्तेदार की शादी में शरीक होने जाना हुआ ! एक रात गुज़ारने के वास्ते किसी के घर जाना हुआ ! उस श्क्स का तारीक सा मकान था, परिवार खासा बडा है, बामुशिक्ल गुज़ारा होता होगा ! जब सवेरे चलने को हुए तो उस शक्स की बिवी ने मेरी बेगम के बडे से बेग में एक पोटली डाल दी ! हम जिस गाडी में सफ़र कर रहे थे, उस घर की बूढी दादी हमारे साथ हमें छोडने आयी ! जरा सा सफ़र तय करने के बाद दादी मां ने कहा : थोडा रुको, मैं अभी आती हूं !" कुछ मिन्टों बाद वो आयी, हाथ में पतली-२ लकडियों का एक छोटा सा गट्ठा भी था और कहने लगी : " बेटा ये गिलोई है, कई बिमारियों से निज़ात दिलाएगी !" फ़िर हमें खुदाहाफ़िज़ कह कर वो अपने घर लौट गयी ! सफ़र में सोचता रहा पोटली में क्या होगा ! घर पहूंचे, बैग कंधे से उतारा और पोटली टटोली ! राजमहा की दाल थी, दो-तीन वक्त का जुगाड ज़रूर था ! मैं चुप चाप अपने आपको देख रहा था और आंखों से अश्क रवां थे ! हम सब कुछ होते हुए भी वो चीज़ देते हैं जिन्हें हम फ़ालतू कहते हैं और इस मुफ़लिसी में भी वो वो चीज़ दे गया जिसके लिए उस्ने ताउम्र जदोजहद की है ! हम किसी को कपडा भी तब देने की सोचते हैं जब वो हमारे पहनने के काबिल नहीं रहता ! अमूनन अदीब लोग जिन्दगी में जमा-वाहिद, फ़यदा नुकसान की बहुत सोचते हैं लेकिन गरीब की ज़िन्दगी में मोहब्बत और दिल का मकाम बहुत ऊंचा होता है ! वो सीधा जीना जनते हैं और जहां तक शायद अमीर लोगों के दिल का रास्ता नहीं जाता ! सामान तो हम दुकान से खरीद सकते हैं पर मोहब्ब्त और परोपकार तिजारत नहीं जो दुकानों में मिल जाए ! उस राजमहा की दाल में जो प्रेम का स्वाद है वो खरीदी दाल में कहां क्योंकि वो तो तोल-मोल कर ली गयी है ! उस गिलोई में जो दवा है उसका सामी किसी हकीम के पास कहां ! मेरी नम आंखें शायद उस गरीब इन्सान का एहसान न चुका सके पर मैं ये दुआ जरूर करता हूं- या अल्लाह, इन्सानों को किसी मुफ़्लिस का जिगर दे क्योंकि वहां तेरा ठिकाना है ! 

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लघुकथा: भैस बड़ी (रतन चंद 'रत्नेश')

पहाड़ में गांव। गांव में एक किनारे पर बसा गरीब घर। घर में दो विधवाएं - सास और बहू। आगे बहू के तीन बच्चे और थोड़ा-सा खेत। आय का साधन -- विधवा पेंशन और गोड (गोशाला) में बंधी भैसों के दूध की बिक्री। सौभाग्य से इन दिनों दोनों भैसों में दूध था। बच्चों के लिए थोड़ा-सा दूध बचाकर बाकी सारा पास के ही एक दुकान में भेज दिया जाता और इस प्रकार किसी तरह परिवार का गुजर-बसर हो रहा था।
गरीबी में आटा भी अक्सर गीला होता ही रहता है। एक दिन अचानक दोनों भैसें एक साथ बीमार पड़ गईं और दुर्भाग्य दबे पांव ऐसे आया कि उसी दिन घर का एक बच्चा भी रोगग्रस्त हो गया।
तत्क्षण झाड़-फूंक करने वाले गांव के चेले को बुलाया गया। चेला समझदार था। उसे ज्ञान था कि गांव के मुहाने पर खुले देसी ठेके के दारू ने उसके पुश्तैनी मंत्र-सिद्धि को बेअसर कर दिया है। जंत्र और धूणी-धागे का अब कोई असर नहीं होता। मंत्रोच्चारण करते समय भी षब्द अटक-भटक जाते हैं। अब न पशुओं के ओपरे पर उसका वश चलता है, न बच्चों की आधि-व्याधि पर। पर फिर भी गांव के गरीबों का वही सबसे पहला उद्धारक था। उसके प्रति आस्था बची हुई थी। भैसों पर उसने बुदबुदाते हुए हाथ फेरा। लगे हाथों ज्वर-पीड़ित बच्चे पर भी मोर-पंखों का मुठ चलवा दिया गया।
  ‘‘ओपरे का इलाज तो मैंने कर दिया है पर डंगर-डाक्टर को भी दिखा लेणा चाहिदा। इस बरसात में पीने का पानी गंदा हो जाने के कारण माणू (मनुष्य) ही नहीं, माल-मवेशी भी बीमार पड़ रहे हैं।’’ कहकर चेले ने मंत्रसिद्ध आटे का बटा हुआ पेड़ा (लोई) दोनों भैसों के मुंह में धकेला और अपना कोहाड़ू (कुल्हाड़ी) उठाकर चलता बना।
दोनों विधवाओं के चेहरे पर परेशानी की रेखाएं उभर आयीं। घर में एक बच्चा भी ताप से तप रहा था। लिहाजा एक मानव-चिकित्सक और एक पशु-चिकित्सक दोनों की बराबर आवश्यकता  आन पड़ी थी, पर दोनों के इलाज के लिए पैसे........ ?
यों तो पंचायत में एक पशु-चिकित्सालय भी था जो सारा दिन खुला रहता  पर वहां डाक्टर नामके उस सरकारी कर्मचारी के कभी कभार ही दर्शन  होते। छः गांवों में से पता नहीं किस गांव में वह गुम हुआ रहता। अतः गांव से आधा किलोमीटर दूर सड़क के किनारेवाले प्राइवेट डंगर-डाक्टर की ही पूछ थी। कुछ लोग कहते कि सरकारी पशु-चिकित्सालय से गायब रहने की एवज में उस सरकारी कर्मचारी को इस प्राइवेट डंगर-डाक्टर से कुछ बंधी-बंधाई मिलती है। पता नहीं, यह झूठ था या सच?
सास न बहू को देखा और बहू ने सास को और आंखों ही आंखों में अंतिम निर्णय हो गया। गोड की बीह पर चिंतामग्न बैठी सास उठकर प्राइवेट डंगर-डाक्टर को बुलाने चल पड़ी।


भ्रष्टाचारियों का ड्रेस-कोड : रतन चंद ‘रत्नेश’




वैसे तो रिश्वत  लेना और देना हमेशा चर्चा का विषय  रहता है। एक कांड की चर्चा कुछ दिनों तक होती है, उसके बाद कोई नया कांड सामने आ जाता है तो उसकी चर्चा आरंभ हो जाती है। पुराना कांड हासिये पर चला जाता है। यों भी इनसान के दिमाग का आकार इतना छोटा है कि उसमें सभी कांडों को झेलने की ताकत नहीं होती, इसलिए पुराने कांडों को डिलीट यानी कि हटाते रहना पड़ता है। पिछले दिनों सिटी ब्यूटीफुल में भी एक रिश्ववत कांड सुखियों में था जो अब धीरे-धीरे धूमिल होने लगा है। यों तो मुझ जैसे साधारण लोगों को रिश्ववत कांड से कुछ लेना-देना नहीं होता लेकिन यह जानकर तब बड़ा दुःख होता है जब पांच-दस हजार रूपए की रिश्ववत लेते हुए कोई पकड़ा जाता है। बड़ी शर्म महसूस होती है। लोग छोटी-मोटी रकम रिश्वतस्वरूप लेते हैं और उससे भी शर्मनाक बात यह होती है कि वे पकड़े जाते हैं। मेरा यह मानना है कि जो सैकड़ों-हजारों में रिश्वत लेते हैं, वे या तो अनाड़ी होते हैं या फिर अज्ञानी। उन्हें कम से कम इतना ज्ञान होना चाहिए कि आज के दौर में कितना
रिश्वत लेना वाजिब है। उन कमअक्लों को यह भी पता नहीं होता कि जो शख्स पांच हजार की रिश्वत दे रहा है, वह उन्हें मूर्ख समझ रहा है। भला आज के जमाने में रिश्वत में हजारों का क्या काम? इससे बेहतर यह है कि आप रिश्वत देने वाले को पकड़वा दें और अपना सर गर्व से ऊंचा करें। आखिरकार रिश्ववत लेने में भी अपनी औकात बनाए रखना समझदारी की निशानी है।
भ्रष्टाचार के मामले में हम पचास से भी अधिक देशों से आगे हैं। कम से कम एक मिसाल तो कायम की ही जा सकती है कि यहां लाख से नीचे लेन-देन नहीं होता। जो लाख से नीचे रिश्वत लेते धरे जाते हैं, उनके लिए ड्रेस-कोड  तो अवश्य होना चाहिए ताकि आइंदा से कोई कम रिश्वत लेने की हिमाकत न करे। ड्रेस-कोड  का अर्थ स्पष्ट करना यहां उचित रहेगा। इस मामले में फिलहाल शीर्षस्थ भ्रष्ट देश इंडोनेशिया में विचार-विमर्श चल रहा है। वहां के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का मानना है कि भ्रष्टाचार मामले के आरोपियों के लिए यदि ड्रेसकोड निर्धारित कर दिया जाय तो शायद वे कुछ शर्म  महसूस करें। एक विशेष  रंग के कपड़े पहने व्यक्ति को देखते ही लोग जान जाएगें कि वह भ्रष्टाचारी है। इससे दूसरे लोगों को भ्रष्टाचार से दूर रहने का सबक मिलेगा। वहां की आम जनता ने यह सुझाव भी दे डाला है कि ड्रेस-कोड  का रंग चटख लाल या गुलाबी रखा जाय। हमारे देश में भ्रष्टाचार के लिए इन रंगों का ड्रेस-कोड चुना गया तो इसका उल्टा असर हो सकता है। भ्रष्टाचारी कहीं अपने आप को फिल्मी सितारे न समझने लगें और शर्म महसूस करे के वजाय कुछ ज्यादा ही गौरान्वित महससू करने न लग जाएं। यहां के लिए काला रंग ही शायद बेहतर रहेगा क्योंकि ऐसे लोगों का मुंह काला करने की हमारे यहां प्राचीन परम्परा है। इंडोनेशिया करप्शन -वाच की राय है कि ड्रेस-कोड के पीछे आरोपी का नाम, केस संख्या आदि का भी उल्लेख हो। हमारे यहां राज्य का नाम लिखना भी जरूरी है क्योंकि कई बार राज्यों में भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त होड़ देखने को मिलती है। कई लोगों की मानसिकता ही यही रहती है कि हम किसी मामले में पीछे न रहें, चाहे वह भ्रष्टाचार ही क्यों न हो। इंडोनेशिया  में भ्रष्टाचार-निरोधक इकाई के उपप्रमुख एम.जेसिन के अनुसार विशेष पोशाक पहनाकर किसी कैदी को जेल में डाला जाए ताकि वह अलग दिखे तथा अन्य कैदी यह जान सकें कि उसे भ्रष्टाचार के अपराध में सजा मिली है। इस मामने में भी हमारे यहां दिक्कत है। भ्रष्टाचारी को पहचान-चिह्न मिलते ही कई लोग उसे गॉडफादर बनाने के लिए व्यग्र हो उठते हैं। पुलिस भी उनकी सेवा में ऐसे जुट जाती है मानो वही उनका बेड़ा पार करेगा।
पुनश्चः मौजूदा भ्रष्टाचारी-निरोधक जो घमासान चल रहा है, उसमें इस पर भी विचार किया जाए.

रतन चंद 'रत्नेश' की लघुकथा --दो टके की नौकरी

बाबू हरकिशन लाल झंडे-बैनरों से सजी-धजी अपनी कार से उतरे। वे अभी-अभी चुनाव-प्रचार से लौटे हैं। अंततः बड़ी मेहनत-मशक्कत के बाद वे इस बार पार्टी का टिकट हासिल करने में कामयाब हो पाए हैं।
अपने आलीशान बंगले में प्रवेश करते ही वे चिल्लाये---
‘‘कहाँ है रामकिशन? जल्दी से भेजो उसे मेरे पास।’’
ढूँढकर उनके युवा बेटे को हाजिर किया गया।
‘‘कहाँ रहते हैं जनाब, दिखते ही नहीं इन दिनों ?’’ उन्होंने बेटे से पूछा।
‘‘पिताजी, फाइनल की परीक्षा सर पर है, उसी में जुटा हूँ । साथ ही इस बार आई.ए.एस. में बैठने की तैयारी भी कर रहा हूँ।’’
बेटे की बात सुनकार बाबू हरकिशन लाल भन्नाए---
‘‘लो सुनो इसकी बात। चुनाव सामने है और इसे पढ़ाई की पड़ी है। ये नहीं कि बाप का हाथ बँटाए। घर में घुसा किताबें चाट रहा है कमबख्त। कोई समझाए इसे।......... अरे भई मेरे चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से जुट जा। मैं जीत गया तो तुझे दो टके की नौकरी के लिए इस तरह किताबों में मगज खपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी...... समझे।’’

रतन चंद 'रत्नेश' की बाल-कविता :गुड़िया रानी

गुड़िया रानी, गुड़िया रानी

बोलो क्यों करती नादानी


घरवालों को बिन बतलाए

बाहर तुम चली जाती हो

मम्मी को होती परेशानी

बोलो क्यों करती नादानी



कभी किसी घर छिप जाती हो

कभी राह भटक जाती हो

ऐसी भी आखिर क्या मनमानी

बोलो क्यों करती नादानी

घर पर बैठ खिलौने खेलो

चकले पर रोटी तुम बेलो

दादी अम्मा से सुनो कहानी

बोलो क्यों करती नादानी

लघुकथा - बेबसी


अंतत: दोनों भाइयों ने बस में पांच सीटें  बुक कराई! सबसे पीछे की । दो अपने लिए और तीन मां ·के लिए। मां बहुत बीमार थी। वह लेट कर ही वापस गांव  जा सकती थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और साथ ही यह भी कहा कि  घर पर ही जितनी सेवा हो सकती है, करो।

बड़ा भाई दिल्ली में ही काम करता था। उसके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, मां के इलाज में खप गई। पैसे होते, तो वह मां को किसी टेक्सी में ले जाता।

दोनों बेटों के बीच मां आंखे मूंदे सो रही थी। बस ने आधे से अधिक फासला तय कर लिया था। तीन सीटों की  टिकट लेने के कारण खड़े रहने को  विवश किसी यात्री से तकरार भी नहीं हुई। कंडक्टर भी उनके  ही इलाके का था। उसी ने सलाह दी थी कि इसी तरह बीमार मां गांव पहुंच सकती है, वरना रास्ते में सवारियां हील-हुज्जत करेगी।

अचानक मां की  देह में  जुंबिश हुई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। पिछली सीट पर बैठे दोनो भाइयों ने  एक दूसरे की ओर कातर निगाह से  देखा। बड़े भाई ने अपने होठों पर उंगली रखकर छोटे को  चुप रहने का इशारा किया। छोटे भाई की आंखों में  आंसू तैरने  लगे । उसका जी कर रहा था कि मां की मौत पर दहाड़ मार-मार कर रोए, पर परिस्थिति   को समझ कर  वह घुटा-घुटा आंसू बहाता रहा और थोड़ी देर में चुप हो गया।

क्लासिकल

लघुकथा -- लुटेरे


लुटेरे
 
हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे। आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।
सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब, कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस, किसी मौके की तलाश में थे।
मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा, 'जितना पी सकते हो, पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको। ’
मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा, 'क्या है? भागो यहां से। ’ वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए, पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा, 'विशाल, बोतल फेंको और भागो। ’
हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना-झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।             साभार : अमर उजाला                                     

कहानी- वह चली गई तो..

घर के तीनों कमरे में बारी-बारी से जाकर वे फिर से अपने पढने की मेज-कुर्सी पर लौट आए। उनके चेहरे पर झल्लाहट साफ नजर आ रही थी। छत पर पंखा मद्धम गति से घूम रहा था। उन्होंने अपनी गर्दन उठाकर एक उचटती निगाह उस पर डाली और मेज पर औंधी रखी किताब को पलटकर फिर से उसमें मन लगाने का प्रयास करने लगे, पर उनका ध्यान लिखे हुए शब्दों पर नहीं टिका। कमरे में एक घुटन भरी उमस व्याप्त थी जो अक्सर ऐसे बरसाती दिनों में हो जाया करती है जब पारा अपने उच्चतम अंक को छूकर थका-थका सा ढलकने लगता है। अपनी नम बनियान को पेट से ऊपर सरकाते हुए वे बडबडाए, न जाने क्यों मेरी चीजों को इधर-उधर कर देती हैं?

वे फिर से उठे और झुककर पहले अपनी मेज और कुर्सी से नीचे झांका। अक्सर ऐसा ही होता है। चीज उनके समीप होती है और वे झल्लाते हुए यहां-वहां ढूंढते फिरते हैं, मृग की कस्तूरी की तरह। इसी कारण अक्सर उन्हें अपनी पत्नी से यह हिमाचली लोकोक्ति सुननी पडती है, कन्ना पर जूंगडा, घरा जो हक्कां।

न जाने कब से वे यह लोकोक्ति सुनते आ रहे हैं लेकिन पहले पत्नी तब सुनाती थी जब वह उनका इधर-उधर रखा सामान ढूंढकर दे दिया करती थी। ऐसा भी नहीं कि वे हमेशा अपनी कोई चीज इधर-उधर रखकर भूल जाते हैं। कई बार घर को करीने से सजाने के एवज में उनकी चीजें इधर-उधर हो जाती हैं। पहले बेटी जब परायी नहीं हुई थी तो कमरों को हमेशा सजा-संवारकर रखती थी। उन्हें अच्छा भी लगता था, परंतु वह उनकी आई हुई चिट्ठियों, पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी सहेजकर टेबल के नीचे या ऊपर रख देती। वह पठन-पाठन की सामग्रियां सहेजकर रखी नहीं गई कि उनकी आंखों से हफ्ते-महीने के लिए ओझल हो जातीं। वे बेटी से सीधे कुछ नहीं कहते लेकिन अपनी पत्नी को सुना जाते- तुम लोग मेरी चीजों को वहीं रहने दिया करो, जहां पडी रहती हैं। आँखों से ओझल होते ही ये मेरे मन से भी ओझल हो जाती हैं।

पत्नी पलटकर कटुवचन कह देती, और घर को कबाडघर बना रहने दें।

वे आँख बचाकर कहते, पढने-लिखने वालों के घर ऐसे ही होते हैं।

किसी का घर ऐसा नहीं होता। सभी अपनी चीजों को करीने से सजाकर रखते हैं। आपकी तरह नहीं कि जहां बैठे वहीं किताबें, अखबार और पत्रिकाएं बिखेर दीं।

वे शुरू-शुरू में तर्क-वितर्क करते पर ज्यों-ज्यों उम्र में परिपक्वता आती गई, उन्होंने कहना छोड दिया फिर भी आदत पूरी तरह नहीं छूटी। घर में उनका चीजों को बिखेरना और पत्नी व बेटी का सहेजना एक नित्यकर्म की तरह चलता रहा। हाँ, बेटी के ब्याहने के बाद उनकी अस्त-व्यस्त जिंदगी में कमोबेश सुधार हुआ है।

चैन नहीं पडा तो वे उठकर धीरे-धीरे सभी कमरों तक गए। सब जगह अच्छी तरह देखा। अलमारी, बेड, टीवी-ट्राली के नीचे, पर उन्हें अपनी हवाई चप्पल कहीं भी दिखाई नहीं दी। वे चप्पल पहनकर थोडी देर घर के सामने खुली हवा में चहलकदमी करना चाहते थे। कल सुबह से बरखा नहीं हुई थी पर आसमान बादलों से ढका रहा। पत्नी रात के भोजन के बाद पडोस की एक महिला के साथ मुहल्ले की सडकों पर टहलने चली गई थी। बेटा एक मित्र की बर्थ-डे पार्टी मनाने किसी होटल में गया हुआ था। ऐसे क्षणों में जब वे घर में अकेले होते हैं, निश्चिन्त होकर अपने पढने-लिखने की मेज पर चले जाते हैं।

वे नंगे पांव बाहर बरामदे तक आ गए। स्ट्रीट-लाइट आज भी गुल थी। पिछले कुछ दिनों से इस वक्त गली में बिल्कुल अंधेरा पसर जाता है। वैसे इस मुहल्ले में चोरी-चमारी या लूटपाट का कोई डर नहीं रहता। सरकारी मकानों की कालोनी है। मकान भी सारे बाबा आदम के जमाने के हैं। कई दीवारें इस कदर उघडी हुई हैं जैसे किसी गरीब औरत का पहरावा। उखडे हुए प्लास्टर, मौसमों की मार से बदरंग बाहरी दीवारें और बूढे-बूढे से जर्जर घर। खिडकियों के कपाट ढीले, चिटखनियां असमर्थ। फिर भी भय, आशंकाएं व असुरक्षा खिडकियों तक आतीं और कुछ सूंघकर वहां से लौट जातीं। अत: यहां सब अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। साल में एकाध बार कभी किसी घर में चोरी हो भी जाती है तो चोरों के पल्ले कुछ खास नहीं पडता।

थोडी देर बरामदे में खडे रहने के बाद वे निराश होकर अंदर चले गए। घर में और भी चप्पलें हैं, पर उनसे बेखबर वे अपनी उसी चप्पल को ढूंढते फिर रहे हैं जो उनकी खास अपनी हैं। नंगे पांव ही कमरों में इधर-उधर डोलते हुए वे बेड-रूम की तरफ चले गए। पढने का सिलसिला कब का टूट चुका था। उन्होंने टीवी ऑन कर रिलैक्स होना उचित समझा। एक चप्पल की वजह से उनका ब्लड-प्रेशर बढ सकता है, इनका उन्हें इल्म था और इससे बचने के टोटके भी। टीवी पर देश की अर्थ-व्यवस्था को लेकर दो विद्वान विचार-विमर्श कर रहे थे। उन्होंने दूसरा चैनल घुमाया। वहां फैशन परेड जारी था। वे बेड पर अधलेटे इत्मीनान से एक के बाद एक चैनल बदलने लगे। चैनल बदलने के साथ-साथ वे सहज भी होते चले गए।

इसी बीच बाहर पत्नी का स्वर सुनाई दिया है। वह किसी से बातें करते हुए घर में प्रवेश कर रही थी। अंदर आने पर खुलासा हुआ कि वही पडोसन साथ है जिसके संग वह टहलने गई थी।

उसने पडोसन को ड्राइंग-रूम में बिठाया और खुद बेड-रूम में आ गई। पत्नी पर नजर पडते ही उन्होंने पूछा, भला मेरी चप्पल कहां है, मिल ही नहीं रही है? यहीं होंगी कहीं। पत्नी ने सहज भाव से कहा और एक कैरीबैग उठाकर ड्राइंगरूम में चली गई। पडोसन को सूट दिखाने जिसे वह आज ही दिन में खरीदकर लायी थी। उनकी इच्छा हुई कि वहीं जाकर कहे, तुम्हें यह सूट दिखाना जरूरी लग रहा है या मेरी चप्पल ढूंढना?

मगर वे चुप रहे और टीवी के एक चैनल पर समाचार सुनने लगे। थोडी देर में उनकी आँखें बोझिल होने लगीं। उन्होंने लेटे-लेटे रिमोट से टीवी बंद किया और दूसरे ही पल गहरी नींद में चले गए।

सुबह आंख खुलने पर देखा कि पत्नी रसोई में चाय बना रही है। उन्होंने टीवी के मेन-स्विच पर निगाह डाली। रात उनसे बंद करने से रह गया था। स्विच ऑफ था। बिस्तर से उतरते ही उन्होंने पूछा, मेरी चप्पल मिली क्या? रात भी तुमने पूछा पर तुम्हें फुर्सत थी ही कहां?

आप भी कमाल करते हैं। दूसरी चप्पल ले लेते। कहते हुए पत्नी ने आकर अपनी चप्पल उनके सामने उतार दीं।

वे बिस्तर से उतरे लेकिन पत्नी द्वारा उतारी चप्पल को पांव में नहीं पहना और नंगे पांव सीधे बाथरूम की ओर चल दिए। वहां बाहर ही उनकी चप्पल पडी हुई थी। फिर ख्याल आया कि कल शाम को ही वे उन्हें वहां उतार गए थे। फिर भी अपनी पत्नी के प्रति अप्रसन्न रहे। मलाल यह था कि वह इन दिनों उनके प्रति लापरवाह होती जा रही है। उनकी आवश्यकताओं को गंभीरता से नहीं लेती। पहले कितना ख्याल रखती थी उनका! मन में ताजी कचोट यह थी कि रात पति की जरूरत को नजरअंदाज कर पडोसन को सूट दिखाना उसे कहीं जरूरी लगा था।

बाथरूम से निकलकर तौलिये की तलाश में वे अपनी मेज तक गए। उनका तौलिया वहां कुर्सी के हत्थे से झूल रहा था। रात मेज पर बेतरतीब रखी उनकी किताबें, कलम और चश्मे को सहेजा जा चुका था। वे बाहर लॉन में आ गए जहां कुर्सी बिछाए पत्नी चाय की ट्रे के साथ उनका इंतजार कर रही थी। उन्होंने अभी-अभी आया अखबार उठाया और कुर्सी पर आ बैठे। पत्नी ने चाय का प्याला उनकी ओर बढाया।

चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने अखबार का एक हिस्सा पत्नी के सम्मुख कर दिया। बिना चश्मे के शब्द उनकी आंखों को धुंधला रहे थे। अखबार के मोटे-मोटे शीर्षकों से नजरें हटाकर उन्होंने पत्नी की ओर बडी आत्मीयता से देखा जो सिर झुकाए शहर की खबरें पढने में तल्लीन थी। वे मन-ही-मन सोचने लगे।

आखिर कब तक हम दोनों एक डाल पर बैठे रहेंगे। किसी एक को तो, कभी-न-कभी, पहले वहां से उडना ही पडेगा। यदि उन्हें ईश्वर ने पहले बुला लिया तो पत्नी को अपनी बची हुई जिंदगी गुजारने में उतनी दिक्कत नहीं होगी। उन्हें संतुष्टि हुई।- लेकिन मुझसे पहले वह चली गई तो...?


(जागरण में प्रकाशित)

लघुकथा- समस्या




गाँव में जाने पर सारी दिनचर्या बदल जाती है। समय से बँधे रहने के सिलसिले में भी पूर्णविराम–सा लग जाता है। न कोई आपाधापी और न कोई तनाव। यहाँ तक कि दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है, यह जानने की भी चिन्ता नही सताती। न ही समाचारपत्रों को नियम से देखने का चाव रहता है और न ही रेडियो–टीवी से चिपककर बैठने का।
वैसे भी गाँव के समीप बस–अड्डे पर छितराई हुई दुकानों में समाचारपत्र बहुत देर से पहुँचते हैं। तब तक हम जैसे लोगों का पढ़ने का मज़ा ही जाता रहता है जिन्हें अलस्सुबह समाचारपत्र बाँचने की आदत हो।
एक दिन मैं यों ही पूरन की दुकान पर बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था कि आने वाली बस से दलीपा राम जी उतरे। वे हमारे गाँव के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं। मुझे इल्म था कि इन दिनों वे अपनी पुत्री के लिए किसी योग्य–वर की तलाश में हैं। वे मुझे भी अपनी बिरादरी का कोई लड़का शहर में देखने के लिए कह चुके थे।
उन्हें देखते ही मैंने पूछा, ‘‘मास्टर जी, कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं ?’’
‘‘
बस पास ही के एक गाँव में गया था।’’
मैं उठकर उनके समीप जा पहुँचा।
‘‘
कोई लड़का मिला ?’’ मैंने पूछा।
‘‘
उसी सिलसिले में तो गया था।’’
’‘
फिर ... बात बनी कोई ?’’
‘‘
वैसे तो सब ठीक है पर.....’’
‘‘
क्या दहेज–वहेज का कोई अड़ंगा ?’’
‘‘
नहीं–नहीं.. ऐसा कुछ नहीं है। लड़का भी ठीक है, सरकारी नौकरी पर है, घर–बार भी प्राय: ठीक ही है...’’
‘‘
तो फिर कौन–सी समस्या आड़े आ रही है, मास्टर जी?’’
‘‘
बस, लड़के को नौकरी में ऊपरी कमाई कोई नहीं है। आपको तो पता ही है कि आजकल सरकारी नौकरी में ऊपरी कमाई न हो तो.......।’’ 


लघुकथा- दर्द




अभी–अभी इंटरव्यू देकर वह एक दफ्तर से निकला था। इंटरव्यू तो इस बार भी अच्छा हुआ था पर....?
इसके पूर्व भी उसके कई इंटरव्यू अच्छे हुए थे पर नौकरी अभी तक हासिल नहीं कर पाया था।
थका–थका–सा वह बस–स्टैंड की ओर बढ़ रहा था। भूख भी जोरों की लग आयी थी। सोचा, घर शीघ्र पहुँचकर वह भोजन कर लेगा। माँ भी प्रतीक्षा कर रही होगी। लोगों के कपड़े सी–सीकर थक जाती है बेचारी।
उसकी जेब में दस रुपए थे। सात रुपए बस का किराया ही लग जाना था। पैदल चले तो बहुत देर से पहुंचेगा। भूखी माँ हारकर फिर काम में जुट जाएगी।
उसका पेट भूख से बिलबिलाने रहा था। एक केला ही खा लूँ, सोचकर वह एक केले वाले की ओर बढ़ा।
तभी एक छोटा–सा लड़का ‘साहब पॉलिश करा लो’ कहता हुआ उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसे क्षण भर कि लिए लगा कि वह सचमुच साहब हो गया है। एक नौकरीशुदा साहब।
उसने अपने पुराने पड़ गए जूतों पर एक निगाह डाली और सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं करानी है भई पॅलिश।’’
‘‘
करा लो न बाबू जी।’’ वह लड़का गिड़गिड़ाने लगा। उसका स्वर दयनीय हो उठा था।
उसे महसूस हुआ जैसे उसके अन्दर से कोई कह रहा हो––
‘‘
हमारे घर की दशा अच्छी नहीं है साहब। मुझे नौकरी पर रख लीजिए।’’
उसकी आँखें नम हो आयीं। उसने एक निगाह घड़ी पर डाली और पॉलिश के लिए अपने जूते उस लड़के की ओर बढा दिए ।