अनपढ़ - रतन चंद 'रत्नेश'

अपनी कोठी में कुछ काम कराने के लिए बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने, जगह-जगह से पैबंद कुरते में था।
बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या नाम है तेरा?’’
‘‘जी बाबू.... सुखी राम।’’
बाबू रामदयाल मन-ही-मन मुस्कुराए, उसके नाम पर शायद।
रास्ते में एक जगह मस्जिद के सामने खड़े होकर सुखी राम माथा टेकने की मुद्रा में खड़ा हो गया।
बाबू रामदयाल को आश्चर्य हुआ और वे दूरदर्शनी डायलाग बोलने लगे --
‘‘क्यों बे, तू मुसलमान है क्या?’’
‘‘नहीं-नहीं बाबू... हम तो हिन्दू हैं।’’
‘‘तो फिर मस्जिद के सामने सर काहे नंवा रहा है?’’
सुखी राम सहजभाव से कहने लगा ---
‘‘हम तो अनपढ़-गंवार हैं बाबू जी। हमार खातिर का मस्जिद और का मंदिर, सब एक ही हैं। इनका भेद तो आप जैसे पढ़े-लिखे लोगन को ही ज्यादा पता है।’’

रातरानी का खिला हुआ चेहरा ---- कहानी -रतन चंद 'रत्नेश'

उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई छाती पर बैठा उसकी गर्दन धीरे—धीरे दबाए जा रहा है। आंख खुली तो सांस घुटती नज़र आई और फेफड़े हवा के लिए फड़ाफड़ा रहे थे। उस फड़फड़ाहट से सारा कमरा गूँज  रहा था। पर्याप्त हवा होते हुए भी उसके फेफड़े सांस लेने और छोड़ने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे और उसे अपनी गर्दन की शिराएँ फूलती और नसें फटती प्रतीत हो रही थीं। पीठ पर दाईं ओर एक असहनीय खींचाव का अनुभव पा रहा था वह । उसने अपनी विस्फारित आंखों से अंधेरे में ही इधर-उधर ‘इन्हेलर’ को टटोला पर उसे जहाँ होना चाहिए था, वह वहां नहीं था। उसने कमरे की बत्ती जला दी। इन्हेलर कहीं नहीं था। दिमाग पर जोर डाला। ख्याल आया कि वह उसके काले रंग की पैंट की जेब में है और उसने आज दोपहर बाद ही बस-स्टॉपेज पर बैठकर अपनी सांस में खींचा था।

छाती से अजीब-सी आवाज आ रही थी जो अब उसके लिए अजीब और अपरिचित नहीं रही थी। वह बिस्तर से उठा। कमर झुकाए उतारा और खूंटी पर टंगी पैंट को हाथ में दबाए पुनः बिस्तर पर लौट आया।

उसने पैंट की सारी जेबें टटोलीं, पर पर्स और चाबियों के गुच्छे के सिवा वहां कुछ न था। उसने फिर अपने दिमाग पर जोर डाला पर ख्याल नहीं आया कि बस-स्टॉपेज के बाद उसे इसकी जरूरत पड़ी हो। इन्हेलर के न मिलने के कारण कष्ट और अधिक बढ़ गया। यह सोचते ही घबराहट होने लगी कि कल सुबह कैमिस्ट की दुकान खुलने तक तो वह पस्त हो जाएगा। दवा तो थी पर उसे रात में इन्हेलर चाहिए, आराम से सोने के लिए । दवा लेने पर ऐसी अवस्था में कोई विशेष लाभ नहीं होता है।

उसे अपनी सांव उखड़ती-सी लगी। पीठ के पीछे का खिंचाव इतना बढ़ चुका था कि उसे लगा कि उसकी पीठ की हड्डी टूटकर झटके से बाहर आ जाएगी।

वह उसी पैंट को पहनकर घर से बाहर निकल आया। सारा वातावरण शान्त था। कहीं इधर-उधर से बीच-बीच में गाड़ियों की आवाजें आतीं और उनमें लगातार गूंज रही थी उसकी छाती की खरखराहट। वह कमर को थोड़ा झुकाए सांस लेने और छोड़ने का प्रयत्न करता बिल्डिंग के तीसरे माले से नीचे उतर आया और एक रिक्शा  लेकर सरकारी अस्पताल की ओर  चल पड़ा। वहां पहुंचकर जैसे-तैसे इमरजेंसी तक गया। डॉक्टर ने उसके चेहरे की ओर देखा, कयास लगाया और फिर पूछा, ‘‘क्या तकलीफ है?’’

‘‘सांस लेने में.....।’’

इसी बीच डॉक्टर ने ‘अमीनोफाइलिन.... इन्ट्राविनस... वेरी स्लोली’ एक पर्ची पर लिखकर उसे पकड़ा दिया। वह नर्स के कमरे में पहुंचा। ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने उसे पहचान लिया। वह हमेशा फूल-सी खिली दिखती है। इस समय रात के दूसरे प्रहर में भी दिख रही है। लिपस्टिक उसी तरह उसके अधरों पर सजी हुई है जिस तरह वह बाजार में साड़ी पहनकर सजी घूमती नजर आती है। वे एक दूसरे को जानते हैं। पहचान का माध्यम यही इंजेक्शन  है जो कुछ ही देर में वह उसकी धमनी में उतार देगी। वह कई बार यहां आकर अपनी धमनियों में इंजेक्शन  की सुई चुभवा चुका है। इत्तेफाक से यही नर्स उसे अधिक मिली है। संभवतः वह ही डॉक्टर से पर्ची बनवाकर उसे ढूंढने लगता है। वह बहुत धीरे-धीरे उसकी धमनी में इंजेक्शन  चुभाकर दवा बूंद-बूंद टपकाती है और शरीर व मन दोनों को ठंडक महसूस होती है। जब तक वह सुई निकालकर उसे लेटे रहने के लिए कहती है, तब तक उसका शरीर तनावमुक्त हो चुका होता है और से बड़ी प्यारी नींद आती है। वह नींद जो उससे जबरन छीन ली गई होती है। जब वह उसके करीब खड़े होकर धीरे-धीरे इंजेक्शन  दे रही होती है, उसे बड़ा अच्छा लगता है -- उसके सफेद कपड़े, उसका गोरा रंग और उसके लिपस्टिक-सने लाल होंठ। वह उसे इसलिए भी अच्छी लगती है कि उसे उसकी तकलीफ पर दुःख होता है। एक बार एक अन्य नर्स ने उसे इंजेक्शन  देना चाहा था तो उसकी धमनी से खून की धारा फूट पड़ी थी और उसकी सारी बांह खून से सन गई थी। पर वह नर्स जिसका वह नाम तक नहीं जानता, उसे कोई कष्ट नहीं होने देती। उसने मन ही मन उसका एक नाम भी रख लिया है -- उर्वशी।



उसे देखते ही वह मुस्कुरायी। रात की पारी में वह रातरानी-सी खिली और सुगन्ध बिखेरती नजर आती। उसका  जी चाहता कि उसकी सांस भी स्वाभाविक चलती रहे और वह उसे सुन्दरी को लेकर भीड़-भरे बाजार में घूमे, जहां शाम ढलते ही सजे-धजे और अत्याधुनिक फैशन के कपड़ों में लिपटे लोग मौज-मस्ती में घूमते हुए नजर आते हैं। इस बाज़ार में किसी को भी दूसरों को देखने की फुर्सत नहीं होती। सब यही देखते हैं कि कौन  उसे देख रहा है ? युवकों की आशिकाना  नजरें तो हर युवती और  हर महिला पर जा टिकती हैं, चाहे वह उत्तेजक वेश  में हो या फिर साधारण कपड़ों में। वह उर्वशी को भारतीय वेशभूषा में सजाकर  बाजार में घूमना चाहता है। हल्का मेक-अप, लम्बे बालों का जूड़ा, एक सुन्दर-सी साड़ी, बस। भारतीय  वेशभूषा में जो आकर्षण  है, वह आधुनिकता में कहां? वह उसे बाजार में लेकर घूमना चाहता है तब तक, जब तक लोग अपने घरों को लौटना न शुरू कर दें। वह उस फव्वारे के पास उसके साथ बैठकर क्वालिटी की आइसक्रीम खाना चाहता है, जहां कई लोग घेरे में बैठे होते हैं और जहां रात उतरे ही रंग-बिरंगे प्रकाश  में फव्वारा भी रंगीन हो उठता है। वह उर्वशी  के साथ पार्कों में घूमना चाहता है और उसकी आसमान में उड़ने की इच्छा भी हो आती है।

वह अस्पताल में बिस्तर पर अर्द्धनिद्रा में कब तक सोया रहा, उसे भान न हुआ। इस बीच अपने अवचेतन मन में उसने सुन्दरी उर्वशी  के संग बहुत सुखद क्षण बिताए।



वह धीरे-धीरे उठा। श्वास-प्रश्वास  सामान्य थी, पर छाती में अब तक एक बोझ-सा अनुभव हो रहा था। बिस्तर से उतरकर उसने पांव में रबर की चप्पल फंसायी और जाने को हुआ। उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी, जहां खून के दाग लगे हुए थे जो उसके नहीं किसी और के थे और सूखकर स्थायी जगह बना चुके थे।
इमरजेंसी वार्ड के अन्दर उसने चारों ओर निगाह दौड़ायी। उसे लेकर कुल चार मरीज उस वार्ड में थे। उनमें से दो दर्द समेत या दर्दरहित नींद में थे। उनके संग आए लोग भी ऊंघ  रहे थे। तीसरा मरीज अकेला था। अस्पताल के लाल कम्बल को उसने दूर फेंका हुआ था  और बायीं करवट लेटा अपना दायां चेहरा अपनी दायीं हथेली पर रखे एक टक उसे देखे जा रहा था। उसे उसका चेहरा बड़ा डरावना लगा। आँखें जैसे बाहर निकली आ रही थीं। वह कराहता जा रहा था। शायद वह भी उसकी तरह इस वक्त अकेला था, इसलिए उसे कष्ट  का अनुभव अधिक ही हो रहा था।
उसने एक बार फिर इत्मीनान से उन मरीजों और उनकी देख-रेख करनेवालों पर नजर डाली और धीरे-धीरे वार्ड से बाहर निकल आया। चारों ओर बीमार-सी शान्ति थी। बीच-बीच में कहीं दूर से किसी-किसी के रहकर खांसने की आवाज आ रही थी। वार्ड से निकलते ही उसकी निगाह पारदर्शी शीशे के बाहर सड़क पर फैली रोशनी और अंधेरे के मिश्रण में जा अटकी। एक पेड़ के नीचे अंधेरे में चार-पांच लोग सिमटे-गुमटे सो रहे थे। पास ही एक रिक्शावाला भी सवारियों की बैठने वाली सीट पर अधपसरा लेटा हुआ था।
उसने मन-ही-मन सोचा, क्या इस गहरी रात में थककर गहरी नींद में सोये उस रिक्शेवाले को जगाने की हिम्मत वह जुटा पाएगा?
उसके पांव ‘सिस्टर्स-रूम’ की ओर बढ़ गए। हल्के खांसते हुए वह अन्दर चला गया। उर्वशी  उस समय उसी तरह रातरानी-सी खिली एक स्वेटर बुन रही थी। वह कुछ घबड़ाया और फिर उदास हो गया। पता नहीं अपने पति के लिए बुन रही है या अपने जैसे किसी प्यारे बच्चे के लिए या कोई मंगेतर भी हो सकता है। उर्वशी ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और पूछा, ‘‘अब कैसा महसूस कर रहे हैं आप?’’
‘‘ठीक हूं।’’
उसी क्षण उसके मन में दूसरा ख्याल आया। नहीं-नहीं इसकी शादी अभी नहीं हुई है और उसका मंगेतर भी नहीं होगा। उससे कुछ बातें करना चाहता था वह। पूछना चाहता था कि क्या उसकी शादी हो चुकी है? दूसरी सिस्टर एक फाइल से इंजेक्शन  में दवा भर रही थी। वह सिर्फ इतना ही कह पाया--- ‘‘छाती में दबाव अनुभव हो रहा है।’’
‘‘कोई बात नहीं। सुबह आकर ओ.पी.डी. में दिखा लीजिएगा।’’
उसने मुस्कुराकर  उर्वशी को अलविदा का संकेत दिया और ‘थैंक यू’ कहकर कमरे से बाहर निकल आया।
अस्पताल से निकलकर जैसे ही वह खुली हवा में आगे बढ़ने लगा  कि उसे अपनी सांस फिर से कुछ-कुछ उखड़ती लगी। वह फिर से अस्पताल के अंदर चला गया। ठीक उसी तरह जैसे जेल से लम्बी सजा काटकर कैदी खुली हवा में आकर घबरा जाता है और फिर से जेल में जाने को इच्छुक हो उठता है।
वह इमरजेंसी वार्ड से बाहर सुनसान कॉरीडोर में आगे बढ़ता गया। कभी दायें मुड़ता तो कुछ आगे चलकर बायें। उसकी आंखें फिर से बोझिल होने लगीं। अन्त में वह अस्पताल के पूर्वी द्वार पर था, पर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। द्वार पर तीन-चार एम्बुलेंस, कुछ जीप और कारें खड़ी थीं। वह एक बेंच पर जाकर इत्मीनान से लेट गया। इस वक्त किसी को इन बेंचों की जरूरत नहीं है और न ही कोई उसे टोक सकता है। आखिर वह मुश्किल से सांस ले रहा है।
वह सिर के नीचे रबर की चप्पल दबाकर बायीं करवट लेट गया पर उसे कुछ असुविधा हुई। चप्पल निकालकर उसने सिर के पीछे रखा और फिर अपनी बांह मरोड़कर उसका सिरहाना बना लिया। उसे कुछ आराम मिला। सांस भी सामान्य थी। उसे थोड़ी ही देर में नींद आ गई.... एक गहरी नींद। अब वहां उर्वशी नहीं थी, एक शून्य था । शायद सपने भी हों। उसे कभी सपने याद नहीं रहते, न बुरे और न ही अच्छे। हां, कभी-कभी सपनों में उसकी नींद टूट जाती है और उसकी आंखों में आंसू होते। कोई बड़ी रेल-दुर्घटना या विमान का ध्वस्त होना। कई लोगों के एक साथ मरने पर उसे बहुत रोना आता है --हकीकत में भी।
सुबह जब अस्पताल के परिसर में छायादार पेड़ों से चिड़ियों की चहचहाने की आवाजें आने लगीं, तब उसकी नींद टूटी। इक्का-दुक्का वाहन भी अस्पताल में उंघते हुए आ रहे थे। वह उठा, आंखें मिचमिचायीं और पूर्व के प्रवेशद्वार से सड़क पर आ गया। बूढ़े और प्रौढ़ लोग कनटोप, मफलर और स्वेटर पहने सुबह की सैर को निकल रहे थे। उनमें से कुछ के हाथ में छड़ी, बेंत या छोटा डंडा था। कुछ के साथ झबरे कुत्ते भी थे।
उसके बगल से अखबारवाला हैंडल से लटके झोले और कैरियर में दबोचे ढेर सारे अखबारों के साथ सर्र से निकल गया। आजकल समाचार भी ऐसे ही होते हैं, तेजी से बगल से निकलते हुए-- उसने मन-ही- मन सोचा।
उसने सड़क के किनारे  बने एक बिना छत के स्टॉप पर आकर एक लगभग खाली बस ली और अपने घर चला आया। उसका चचेरा बड़ा भाई अभी तक लम्बी ताने लेटा हुआ था। दरवाजा उसी तरह भिड़ा हुआ था, जैसे वह रात दस बजे के करीब बन्द करके गया था। ऐसे सुस्त लोगों के घर हवा और धूप भी आने से कतराती है।
अपने साथ वह एक पाव रोटी और पॉलीथिन में बन्द दूध का पैकेट भी  लेता आया था। उसने गैस जलाकर पहले दूध को गर्म किया और फिर अलग से एक गिलास दूध में हल्की-सी चायपत्ती डालकर उसे उबाला। चाय मिले दूध को एक गिलास  में उड़ेलकर वह दो स्लाइस के साथ अपने बिस्तर पर आ गया। इस सुबह के नाश्ते  के बाद उसने  एक ब्रांकोडायलेटर ( श्वास की टिकिया ) ली और बिस्तर पर लेट गया।
अपने बिस्तर पर कितना सुख है? थोड़ी देर के लिए उर्वशी का हंसता—मुस्कुराता सुन्दर मुखड़ा उसकी आंखों के सामने गुज़रा ही था कि अखबारवाला आज का अखबार बन्द दरवाज़े के नीचे से सरका गया। वह अखबार उठाकर सुर्खियां पढ़ने लगा। मुखपृष्ठ पर ही नीचे की ओर शहर के एक पिता द्वारा  अपनी नाबालिग पुत्री के साथ बलात्कार की सनसनीखेज़ खबर थी। खबर कुछ अधिक सनसनीखेज़ इसलिए थी कि पिता एक उच्चाधिकारी था। उसने पन्ने पलटे और अभी तीसरे पृष्ठ पर नगर की अन्य खबरों पर आंखें दौड़ा ही रहा था कि भाई साहब पास वाले कमरे से अपनी चप्पल चटखाते हाजिर हो गए। अखबार के कमरे में सरक आने या उसकी फड़फड़ाहट से शायद उनकी नींद खुल गई थी। सुबह उठकर सबसे पहले चाय और बीड़ी के साथ अखबार देखना उनकी आदत है और यह आदत तब से बनी, जब से वह गांव से उनके पास आया है। उन्होंने आज तक कभी अखबार खरीदकर नहीं पढ़ा। अखबार पर पैसा बर्बाद करने से बेहतर वे बीड़ियों का बण्डल खरीदना समझते हैं। अखबार में भी सिर्फ सनसनीखेज़ खबरें पढ़ने का उन्हें शौक है और किसी सच्ची कहानियों के संवाददाता की तरह उसे मिर्च—मसाला लगाकर लोगों को सुनाते हैं।

उसने आत्मसमर्पण करते हुए उन्हें अखबार थमा दिया। वे उसे अपने कमरे में ले गए और वहीं से चाय का आर्डर दे डाला। उन्हें ये पता नहीं कि रात में उसकी तकलीफ बढ़ गई थी, पर यह पता है कि अब तक वह दूध ला चुका होगा। वह उठकर रसोई में चला गया। वहां चाय बनाते वह सोचने लगा कि यह आदमी जो बदकिस्मती से उसका चचेरा भाई है और उससे लगभग पन्द्रह साल बड़ा भी, कभी उसकी किसी प्रकार से मदद करने में विश्वास नहीं रखता। हां, जब कभी गांव जाता है तो उसके माता—पिता को चौड़ा होकर बता आता है कि उसने एक बड़े अलभ्य शहर में उनके बेटे को आश्रय दिया हुआ है, वरना शहर में किराए का मकान लेने में अच्छे—भले खाते—पीते लोगों के भी छक्के छूट जाते हैं। उधर माता—पिता कृतज्ञता से दबे जाते हैं, इधर वह सोचता रहता है कि कैसे संवेदनाशून्य और स्वा​र्थी आदमी के साथ रहने के लिए वह विवश है। भाई ने उसे नौकर बनाकर रख दिया है। सुबह चाय से लेकर रात के खाने तक सारा काम उसके जिम्मे है।

गांव के समीप ही जिले के कॉलेज से ग्रेजुएट होकर वह यहां नौकरी की तलाश में आ गया था। अभी तक कहीं कोई नौकरी नहीं मिली थी और भाई की नौकरी से अब वह तंग आ चुका था। कई बार इच्छा होती कि गांव लौट जाए, पर वहां भी करेगा क्या वह? खेतों का काम तो उससे होने से रहा। शुरू से ही अच्छी नौकरी के ख़्वाब में वह जीता आया था।

उसने अपने लिए चाय नहीं बनायी। थका—थका एक कप चाय बनाकर भाई साहब को दूसरे कमरे में थमा आया था। उसने कहा भी कि रात में सांस की तकलीफ होने के कारण वह ठीक तरह से सो नहीं पाया है और इस समय कुछ देर सोना चाहता है। वे उसी तरह संवेदनाशून्य रहे। अखबार से एक बार नज़रें उठाकर उसकी ओर देखा और औपचारिकता निभायी——

'अस्पताल में दिखा आना था।'

अस्पताल भी जाना है। उसे ख्याल आया। उर्वशी ने भी सलाह दी थी। पर इस समय वह कुछ देर अपने बिस्तर लेटेगा, भले ही नींद न आए।

तकरीबन साढ़े नौ बजे उठकर वह अस्पताल की ओर चल पड़ा। वह अपने—आपको बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था। कमरे से बाहर निकलते ही उसकी निगाह सामने वाले मकान पर पड़ी, जहां बालकनी पर खड़ी एक लड़की उसे अक्सर दिखाई देती है। लड़की उसे अच्छी लगती है। उसने अपने—आपको स्मार्ट और स्वस्थ दिखाने का अभिनय किया। पता नहीं, उस लड़की ने कभी उसे ध्यान से देखा भी या नहीं? कभी उसके बारे में सोचा भी या नहीं? उसने अपने चेहरे पर प्रसन्नता की चमक लाने की कोशिश की, इसलिए कि वह न जाने कितनी बार उसके बारे में सोच चुका है।

अस्पताल में इस वक्त बहुत भीड़ थी । चारों ओर एक गहमागहमी—सी मची हुई थी। उसकी इच्छा कतई नहीं हो रही थी कि वह भी इस भीड़ का हिस्सा बने पर मजबूरन उसे भी अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी थी। वह इत्मीनान से ओ.पी.डी. के बाहर एक बेंच पर अपने दोनों घुटने मोड़कर बैठ गया। इस तरह बैठने में उसे सुविधा महसूस हो रही थी।

यह अस्पताल है, इसलिए यहां बीमारियों, तरह—तरह के टेस्टों, डॉक्टरों, दु:ख—दर्द और चारों तरफ फैली हुई एक गंध की बात होती है। डॉक्टरों की लापरवाहियां, उनका अस्पताल में समय बिताने के लिए आना, सिफारिशी लोगों का ध्यान रखना, नर्सों से चक्कर ——इस तरह की ही बातें। बेंच पर उसकी बगल में बैठा व्यक्ति दूसरे से कह रहा था, 'यहां घंटों इन्तजार करने से से अच्छा है कि शाम को डॉक्टर साब के बंगले में ही दिखा लें। फीस लेंगे, यही न। दवा तो वैसे भी अस्पताल से कोई मिलती नहीं है।'

दूसरा चुप रहा।

यहां सभी कष्ट के मारे थे, अपनी—अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए। उसे अपना कष्ट कुछ कम लगा। इस तरह वहां बैठे—बैठे उसे नींद के झोंके आने लगे। उसे बड़ा सुकून मिल रहा था, यह सोचकर कि अभी भी उसके लिए आक्सीजन वायुमंडल में है।

बारी आने पर वह नींद के फ़ासले से लौटा और डॉक्टर के केबिन में पहुंच गया। उसने उन्हें रात की घटना बता दी। डॉक्टर ने अपना आला उसकी छाती से लगाया और फिर बिना कुछ पूछे पर्ची पर दवा लिखने लगा—— 'एस्थलीन फ़ोर एम.जी.,टी.डी.एस.,एमिनोफाइलिन टैब्...स्टीम इन्हेल...'

'यह दवा लेते रहना और एक हफ्ते बाद दिखा जाना। गर्म पानी की भाप दिन में दो—तीन बार ज़रूर लेना। जल्दी आराम होगा।'

वह थका—थका—सा डॉक्टर के केबिन से बाहर निकला। उसे अपनी प्यारी नींद के खोने का बड़ा दु:ख हो रहा था। उस कमी को पूरा करने के लिए अस्पताल के अहाते में बनी दवा की दुकान से पर्ची में लिखी दवा खरीदकर वह पास के पार्क में चला गया। दिन के बारह बजने वाले थे। सुबह पाव रोटी और चाय मिले दूध के बाद उसने कुछ नहीं खाया था। कुछ खाने की इच्छा भी नहीं हुई थी। घर वह जाना नहीं चाहता था क्योंकि वहां शारीरिक आराम तो मिलेगा नहीं, मानसिक आराम से भी हाथ धोना पड़ेगा। उसके भाई ने दो बजे की पारी में काम पर जाना था। सुबह वह उनसे झूठ बोल आया था कि अस्पताल में डॉक्टर को दिखाकर एक नौकरी के बारे में बात करने के लिए वह कहीं जाएगा।

पार्क के समीप एक छायादार पेड़ के नीचे बैठे चाय वाले के पास चाय के साथ एक मट्ठी ली और चाय के अंतिम घूंट के साथ डॉक्टर द्वारा बतायी गई दवा हलक से उतार ली। फिर वह पार्क के अन्दर जाकर कोने में एक आम के पेड़ के नीचे लेट गया। उसे उम्मीद थी कि यहां उसे अच्छी नींद आएगी और वह अपनी भटकी नींद की कमी को यहां पूरा कर लेगा। पर उसे नींद नहीं आयी। कई बार कोशिश की पर नाकाम रहा। दरअसल सिर्फ अपने बिस्तर से ही उसकी जान—पहचान है जो उसे अंक में भर लेता है। मां की गोद का एहसास उसे नहीं है पर अपने बिस्तर में वह ऐसा ही कुछ एहसास पाता है।डालियों को हवा में झूलते और चिड़ियों की आवाज़ाही को देखते —देखते उसने पार्क में कुछ वक्त गुज़ारा। वहां उस समय स्कूल—कॉलेज के पढ़ाकू लड़के ही थे। वह वहां से उठा और घर की ओर लौट पड़ा। उसे भूख लग आयी थी। घर पर पहुंचकर बाहर लटके ताले को उसने चाभी से खोला। अन्दर जाकर वह सीधे रसोई तक पहुंचा और इधर—उधर झांका। शायद भाई साब खाना बनाकर उसके लिए भी छोड़ गए हों, पर वहां कुछ नहीं था ——एक डिब्बे में रात की दो बासी रोटियां पड़ी थीं।

रतन चंद 'रत्नेश', म0 नं0 1859, सेक्टर 7—सी, चंडीगढ़—160019 मोबाइल— 09417573357

कंकाल (रतन चंद 'रत्नेश' द्वारा अनूदित गुरुदेव टैगोर की कहानी)

जब मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली तो मेरे पिताजी ने वैद्य बनाने के उद्देश्य से मेरे लिए एक प्रसिद्घ और योग्य गुरु को नियुक्त  किया। मेरे नये गुरु न केवल देशी जड़ी-बूटी में महारत थे, बल्कि वे आधुनिक  चिकित्सा पद्घति भी जानते थे। मनुष्य के शरीर की संरचना समझाने के लिए उन्होंने एक मनुष्य का ढांचा अर्थात् नर-कंकाल मंगवा लिया, जो उसी कमरे में रखा गया, जहां मैं पढ़ता था। हर व्यक्ति  जानता है कि हड्डियों के पिंजर से कम आयु वाले बच्चे डरेंगे, खासकर जब वे अकेले होंगे। सच तो यह है कि मुझे भी डर लगता था और शुरू-शुरू में मैं कभी उस कमरे में अकेला नहीं जाता था। अगर कभी जाना भी पड़ जाता तो उसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखता था। एक और विद्यार्थी भी मेरा सहपाठी था। जो बहुत निडर था। वह कभी उस पिंजर से नहीं डरता था बल्कि कहा करता था कि इसकी औकात ही क्या है जो किसी जीवित व्यक्ति  को हानि पहुंचा सके। अभी हड्डियां हैं, कुछ दिनों बाद मिट्टी में बदल जाएंंगी। पर मैं इस विषय में उससे कभी सहमत न हो सकता और हमेशा यही कहता रहा कि माना कि आत्मा इन हड्डियों से विलग हो चुकी है, फिर भी जब तक इसका अस्तित्व रहता है, वह समय-असमय पर आकर अपने पुराने मकान को देख जाया करती है। दरअसल मेरा यह विचार अनोखा या असम्भव प्रतीत होता था और कभी किसी ने यह नहीं देखा होगा कि आत्मा फिर अपनी हड्डियों में वापस आई हो। पर यह एक अमर घटना है कि मेरा विचार सत्य था और सत्य निकला।
कुछ दिनों पहले की घटना है कि एक रात घर की आवश्यकताओं के चलते मुझे उस कमरे में सोना पड़ा। मेरे लिए यह नई बात थी। अत: नींद नहीं आई और मैं बहुत देर तक करवटें बदलता रहा। यहां तक कि पास के गिरजाघर ने बारह का घंटा भी बजा दिया। जो लैम्प मेरे कमरे में प्रकाश दे रहा था, वह मद्घम होकर धीरे-धीरे बुझ गया। उस समय मैंने उस प्रकाश के बारे में सोचा कि क्षण-भर पहले वह यहां था पर अब हमेशा के लिए अंधेरे में तब्दील हो गया है। संसार में मानव-जीवन की भी यही दशा है। जो कभी दिन और कभी रात के अनन्त में जा समाता है।
धीरे-धीरे मेरे विचार अस्थि-पिंजर की ओर परिवर्तित होने लगे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि भगवान जाने ये हड्डियां अपने जीवन में क्या कुछ न होंगी। सहसा मुझे ऐसा लगा मानो कोई अनोखी चीज मेरे पलंग के चारों ओर अन्धेरे में घूम रही है। फिर लम्बी सांसों की आवाजें, जैसे कोई दुखी व्यक्ति  सांस ले रहा हो। मुझे किसी के पांवों की आहट भी सुनाई दी। मैंने सोचा यह मेरा भ्रम है और बुरे सपनों के कारण काल्पनिक आवाजें आ रही हैं। पर पांव की आहट फिर सुनाई दी। इस पर मैंने अपना भ्रम दूर करने के लिए ऊंंचे स्वर में पूछा, ”कौन है?”
यह सुनकर वह अपरिचित व्यक्ति मेरे पास आया और बोला, ”मैं हूं! अपने पिंजर को देखने आई हूं।”
मुझे लगा कि मेरा कोई परिचित मुझसे मजाक कर रहा है। अत: मैंने कहा, ”यह भी कोई समय है पिंजर देखने का। असल में तुम चाहते क्या हो।”
स्वर सुनाई दिया, ”इस असमय से मुझे क्या मतलब? मेरी चीज है, मैं जिस समय चाहूं इसे देख सकती हूं। क्या तुम्हें नहीं दिखाई देता कि ये मेरी पसलियां हैं और जिनमें वर्षों मेरा हृदय रहा है। मैं पूरे छब्बीस वर्ष इस घोंसले में बन्द रही, जिसको अब तुम पिंजर कहते हो। यदि मैं अपने पुराने घर को देखने चली आई तो इसमें तुम्हें क्या आपत्ति है।”
मैं डर गया और उस आत्मा को टालना चाहा, ”अच्छा ठीक है, तुम जाकर अपना पिंजर देख लो, मुझे नींद आ रही है। मैं सोने लगा हूं।” मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह जैसे ही यहां से हटेगी, मैं भागकर बाहर चला जाऊंगा। पर वह टलने वाली नहीं थी, कहने लगी, ”क्या तुम यहां अकेले सोते हो? अच्छा आओ कुछ बातें करें।”
उसका आग्रह मेरे लिए व्यर्थ की विपत्ति से कम न था। मृत्यु की रूपरेखा मेरी आंखों के सामने घूमने लगी। फिर भी विवश होकर मैंने कहा, ”ठीक है, बैठ जाओ और कोई मनोरंजक बात सुनाओ।”
आवाज आई, ”तो सुनो। पच्चीस वर्ष पहले मैं भी तुम्हारी तरह मनुष्य थी और मनुष्यों में बैठ कर बातें किया करती थी, लेकिन अब सूने श्मशान में इधर-उधर घूमती रहती हूं। आज मेरी इच्छा हुई कि फिर से एक लम्बे अंतराल के बाद किसी  मनुष्य से बात करूं। मुझे प्रसन्नता हुई कि तुम मेरी बातें सुनने के लिए राजी हो गए। क्यों? तुम सचमुच मुझे सुनना चाहते हो या नहीं।”
यह कहकर वह आगे सरकी और मुझे लगा कि कोई व्यक्ति मेरे पायताने आ बैठा है। फिर इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, उसने अपनी कथा सुनानी आरम्भ कर दी।
”महाशय, जब मैं मनुष्य के रूप में थी तो सिर्फ एक व्यक्ति  से डरती थी और मेरे लिए मानो यमराज था। वह था मेरा पति। जिस प्रकार कोई मछली को कांटे में फंसाकर पानी से बाहर ले आता है, ठीक उसी तरह वह व्यक्ति  मुझे मेरे माता-पिता के घर से ले आया था और मुझे वहां जाने से रोकता था। अच्छा हुआ कि उसका पत्ता जल्दी ही साफ हो गया यानी कि विवाह के दूसरे महीने ही वह संसार से चल बसा। लोगों की तरह मैंने वैष्णव रीति से उसका क्रियाकर्म तो किया, पर मन से बहुत प्रसन्न थी कि उससे पीछा छूटा। अब मुझे अपने माता-पिता से मिलने की आज्ञा मिल जाया करेगी और मैं अपनी उन पुरानी सहेलियों से मिल सकूंगी जिनके संग खेला करती थी। पर अभी मुझे मायके जाने की आज्ञा मिलने ही वाली थी कि मेरे ससुर घर आए और मेरा चेहरा ध्यान से देखने के बाद बुदबुदाने लगे, ”मुझे इसके हाथ और पांव के चिन्ह देखने से लगता है कि यह लड़की डायन है।”
अपने ससुर के वे शब्द मुझे अब तक याद हैं। वे मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उसके कुछ दिनों बाद मुझे अपने पिता के यहां जाने की आज्ञा मिली। पिता के घर जाने पर जो खुशी मुझे मिली, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। मैं वहां आनंदपूर्वक अपने यौवन के दिन बिताने लगी। मैंने उन दिनों कई बार लोगों से अपने बारे में कहते सुना कि मैं बहुत सुन्दर हूं, पर तुम कहो तुम्हारी क्या राय है?”
मैंने कहा, ”मैंने तुम्हें जीवित देखा नहीं, मैं कैसे अपनी राय दे सकता हूं। जो कुछ तुमने कहा ठीक ही होगा।”
वह बोली, ”मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरी आंखें देखने वालों पर बिजलियां गिराती थीं। खेद है कि तुम मेरी वास्तविक मुस्कान का अनुमान इन हड्डियों के खुले मुखड़े से नहीं लगा सकते। इन हड्डियों के चारों ओर जो सौन्दर्य बिखरा था, अब उसका नामोनिशान नहीं।  मेरे जीवन के उन पलोंं में कोई योग्य-से-योग्य डाक्टर भी कल्पना नहीं कर सकता था कि मेरी हड्डियां मानव-शरीर की रूप-रेखा दर्शाने के काम आएंगी। मुझे वे दिन याद हैं जब मैं चला करती थी तो प्रकाश की किरणें मेरे एक-एक बाल से निकलकर प्रत्येक दिशा में फैल जाती थीं। मैं अपनी बांहों को घण्टों निहारा करती थी। आह, ये वे बांहें थीं, जिसे भी दिखाईं, वही आसक्त होकर रह गया। सम्भवत: सुभद्रा को भी ऐसी बांहें नसीब न हुई होंगी। मेरी कोमल और पतली उंगलियां कमल नाल को भी मात देती थीं। खेद है कि मेरे इस नग्न-ढांचे ने तुम्हें मेरी सुन्दरता को लेकर बिल्कुल झूठी राय निर्धारित करने का अवसर दिया। तुम मुझे यौवन के क्षणों में देखते तो तुम्हारी आंखों से नींद उड़ जाती और इस आयुर्वेदिक ज्ञान की ललक मस्तिष्क से अशुद्घ शब्द की भांति समाप्त हो जाती।
उसने कहानी अबाध रूप से जारी रखी, ”मेरे भाई ने निर्णय लिया कि वह विवाह नहीं करेगा। इस तरह घर में मैं ही एकमात्र महिला थी। जब शाम को मैं अपने बगीचे में छायादार वृक्षों के नीचे बैठती तो तारे मुझे घूरा करते और मेरे पास से गुजरती शीतल हवा तो मेरे साथ अठखेलियां करने लगतीं। मैं अपनी सुन्दरता पर इतराती और अक्सर सोचा करती थी कि जिस धरती पर मेरे पांव पड़ते हंै, अगर उसमें अनुभव करने की शक्ति  होती तो प्रसन्नता से फूली न समाती। कभी ऐसा लगता जैसे संसार के सारे प्रेमी युवक घास के रूप में मेरे पैरों पर पड़े हैं। अब ये समस्त विचार मुझे दुखी करते हैं कि आह! क्या था और क्या हो गया।
”मेरे भाई का एक मित्र सतीश कुमार था जिसने मेडिकल कालेज से डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की थी। वह हमारा भी घरेलू डाक्टर था। वैसे उसने मुझेे नहीं देखा था पर मैंने उसे एक दिन देख ही लिया और मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं कि उसकी सुन्दरता ने मुझे बेहद प्रभावित किया। मेरा भाई अजीब किस्म का व्यक्ति  था। वह कभी घर के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता और न ही कोई हस्तक्षेप करता। उसे  मौन और एकान्त प्रिय था जिसका परिणाम यह हुआ कि संसार से विरक्त होकर वह एकान्तप्रिय बन गया और साधु-महात्माओं सा जीवन बिताने लगा।”
”हां तो वह युवक सतीश कुमार हमारे यहां अक्सर आता। वही एक ऐसा था, अपने घर के पुरुषों के अलावा जिसे मुझे देखने का संयोग प्राप्त हुआ था। जब मैं बगीचे में अकेली होती और फूलों से लदे हुए वृक्ष के नीचे महारानी की तरह बैठी रहती, मेरे मन में सतीश कुमार का ख्याल कुछ अधिक ही आने लगता।  पर तुम किस सोच में डूब गए। तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है?”
मैंने ठंडी सांसें लेते हुए कहा, ”मैं यह सोच रहा हूं कि कितना अच्छा होता कि मैं ही सतीश कुमार होता।”
वह हंसकर बोली, ”अच्छा, पहले मेरी कहानी सुन लो फिर प्रेमालाप कर लेना। एक दिन वर्षा हो रही थी। मुझे कुछ बुखार था। उस समय डाक्टर यानी कि मेरे प्रिय सतीश मुझे देखने आए। यह पहला अवसर था जब हम दोनों ने एक-दूसरे को आमने-सामने देखा और देखते ही डाक्टर मूर्ति की तरह जड़ हो गए। तब मेरे भाई की मौजूदगी ने उन्हें होश संभालने के लिए बाध्य कर दिया। वे मेरी ओर इशारा करके बोले, ”मैं इनकी नब्ज देखना चाहता हूं।” मैंने धीरे-से अपना हाथ दुशाले से बाहर निकाला। डाक्टर ने मेरी नब्ज पर हाथ रखा। मैंने कभी नहीं देखा है कि कोई डाक्टर  साधारण ज्वर के निरीक्षण में इतना सोच-विचार करता हो। उनके हाथ की उंगलियां कांप रही थीं। बड़ी मुश्किल से उन्होंने मेरे ज्वर को अनुभव किया, पर मेरा ज्वर टटोलते-टटोलते वे स्वयं ही बीमार हो गए। क्यों, तुम इस बात को मानते हो या नहीं?”
मैंने डरते-डरते कहा, ”हां, बिल्कुल मानता हूं। मनुष्य में बदलाव आना स्वाभाविक है।”
उसने आगे कहा, ”कुछ दिनों बाद मुझे भान हुआ कि मेरे मन में डाक्टर के अलावा और किसी युवक का विचार तक नहीं आया। शाम के समय हर रोज बसन्ती रंग की साड़ी पहनकर बालों में कंघी, गले में फूलों का हार डाले, बगीचे में जाकर घंटों स्वयं को आइने में निहारती। क्यों, क्या दर्पण देखना बुरा है?”
मैंने घबराकर कहा, ”नहीं तो।”
उसने कहानी का सिलसिला जारी रखते हुए कहा, ”आइना  देखकर मैं ऐसा अनुभव करती जैसे मेरे दो रूप हों यानी कि मैं स्वयं ही सतीश कुमार बन जाती और स्वयं ही अपने प्रतिबिम्ब को प्रेमिका समझकर उस पर तन-मन न्यौछावर करती। यह मेरा बहुत ही प्रिय मनोरंजन था और मैं घण्टों बीता देती। कई बार ऐसा हुआ कि दोपहर को बिस्तर पर लेटकर जरा-सी झपकी लेती तो सपने में सतीश कुमार आ जाते और मेरे हाथ को चूम लेते। बस, अब मैं कहानी समाप्त करती हूं, तुम्हें तो नींद आ रही है।”
मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी। अत: मैंने नम्रतापूर्वक कहा, ”नहीं, तुम कहती जाओ, मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।”
वह राजी हो गई, ” ठीक है, सुनो! कुछ ही दिनों में ही सतीश कुमार का कारोबार बहुत बढ़ गया और उसने हमारे मकान के नीचे के हिस्से में अपनी डिस्पेन्सरी खोल ली। जब उसे रोगियों से अवकाश मिलता तो मैं उसके पास जा बैठती और हंसी-मजाक में तरह-तरह की दवाइयों का नाम पूछती रहती। इस प्रकार मुझे ऐसी दवाओं के बारे में भी जानकारी मिल गई जो घातक होती हैं। मैं उससे जो कुछ पूछती, वह बड़े प्रेम और नम्रता से बताया करता। इस तरह एक लम्बा समय बीत गया और मैंने अनुभव किया कि डाक्टर साहब होशोहवाश खोये से रहते है और जब कभी मैं उसके सामने जाती हूं तो उसके चेहरे पर मुर्दनी-सी छा जाती है। पर ऐसा क्यों होता है? इसका कोई कारण मैं जान न सकी। एक दिन डाक्टर ने मेरे भाई से गाड़ी मांगी। मैं पास बैठी थी। मैंने भाई से पूछा, ”डाक्टर साहब रात में इस समय कहां जा रहे हैं?” उसने कहा, ”बर्बाद होने।”
मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अत: उससे अनुरोध किया कि मुझे बताए कि वे कहां जा रहे हंै? भाई ने कहा, ”वह विवाह करने जा रहा है।” यह सुनकर मुझ पर पहाड़ टूट पड़ा, पर मैंने अपने-आपको संभाला और भाई से फिर पूछा, ”क्या वह सचमुच विवाह करने जा रहे हंै या तुम मुझसे मजाक कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया, ”सच यही है कि आज वह दुल्हन लेकर आएगा।”
”मैं बता नहीं सकती कि इस बात ने मुझे कितना कष्ट पहुंचाया। मैंने अपने आप से यह प्रश्न बार-बार पूछा कि डाक्टर ने मुझसे यह बात क्यों छिपाकर रखी। क्या मैं उन्हें रोकती कि विवाह मत करो? इन पुरुषों की बात का कोई विश्वास नहीं।
”दोपहर को वे रोगियों को देखकर डिस्पेन्सरी में आए तो मैंने उनसे पूछा, ”डाक्टर साहब! क्या यह सच है कि आज आपका विवाह है?” यह कहकर मैं बहुत हंसी और डाक्टर यह देखकर कि मैं इस बात को हंसी में उड़ा रही हूं, न केवल लज्जित हुए  बल्कि कुछ चिन्तित भी दिखे। फिर मैंने सहसा पूछा, ”डाक्टर साहब, क्या आप विवाह के बाद भी लोगों की नब्ज देखा करेंगे? आप तो डाक्टर हैं और अन्य डाक्टरों की अपेक्षा प्रसिद्घ भी। आप शरीर के सारे अंगों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं पर मुझे खेद है कि एक डाक्टर होकर भी किसी के हृदय के बारे में नहीं जान पाते हैं कि वह किस दशा में है जबकि हृदय भी शरीर का एक अंग है।”
मेरे शब्द डाक्टर को तीर की भांति लगे, पर वे मौन रहे।
”लग्न का मुहूर्त देर रात गए निश्चित हुआ था और बारात देर से जानी थी। अत: डाक्टर और मेरा भाई रोज की तरह शराब पीने बैठ गए और इस शगल में उन्हें बहुत देर हो गई।
ग्यारह बजने को थे कि मैं उनके पास गई और कहा, ”डाक्टर साहब, ग्यारह बजने वाले हैं। आपको विवाह के लिए तैयार होना चाहिए।” वे कुछ हद तक सचेत हो गए और बोले, ”अभी होता हूं।”
वे फिर से मेरे भाई के साथ बातों में तल्लीन हो गए और मैंने अवसर पाकर जहर की पुडिय़ा, जो मैंने दोपहर को डाक्टर की अनुपस्थिति में उनकी अलमारी से निकाली थी, उनके सामने रखे शराब के गिलास में डाल दी। कुछ ही देर में डाक्टर ने अपना गिलास खाली किया और दूल्हा बनने के लिए चले गए। मेरा भाई भी उनके साथ चला गया।”
”मैं अपने दो मंजिले कमरे में गई और नई बनारसी साड़ी पहनी। फिर मांग में सिंदूर भरकर सुहागन के वेश में बगीचे में चली गई जहां प्रतिदिन शाम को बैठा करती थी। उस समय चांदनी छिटकी हुई थी। हवा में सिहरन थी और चमेली की सुगन्ध ने बगीचे को महका दिया था। मैंने पुडिय़ा में बची जहरीली दवा निकाली और उसे मुंह में डाल लिया। थोड़ी देर में मेरा सिर चकराने लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। चांदनी मद्घम पड़ गई। धरती-आकाश, पेड़-पौधे और अब मेरा घर जहां मैं अपनी उम्र बिता रही थी,  सब धीरे-धीरे लुप्त होते हुए चले गए और मुझे मीठी नींद आ गई।”
”डेढ़ साल के बाद सुख के सपने से चौंकी तो मैंने क्या देखा कि तीन विद्यार्थी मेरी हड्डियों से डाक्टरी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और एक अध्यापक मेरी छाती की ओर बेंत से इशारा करके लड़कों को विभिन्न हड्डियों के नाम बताते हुए कर रहे हैं, ”यहां हृदय रहता है, जो विवाह और दु:ख के समय धड़कता है और यह वह स्थान है जहां युवावस्था में फूल खिलते हैं।” अच्छा अब मेरी कहानी समाप्त होती है। मैं विदा लेती हूं, तुम भी सो जाओ।”
बांग्ला से अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’

चित्रांकन : संदीप जोशी

लघुकथा: भैस बड़ी (रतन चंद 'रत्नेश')

पहाड़ में गांव। गांव में एक किनारे पर बसा गरीब घर। घर में दो विधवाएं - सास और बहू। आगे बहू के तीन बच्चे और थोड़ा-सा खेत। आय का साधन -- विधवा पेंशन और गोड (गोशाला) में बंधी भैसों के दूध की बिक्री। सौभाग्य से इन दिनों दोनों भैसों में दूध था। बच्चों के लिए थोड़ा-सा दूध बचाकर बाकी सारा पास के ही एक दुकान में भेज दिया जाता और इस प्रकार किसी तरह परिवार का गुजर-बसर हो रहा था।
गरीबी में आटा भी अक्सर गीला होता ही रहता है। एक दिन अचानक दोनों भैसें एक साथ बीमार पड़ गईं और दुर्भाग्य दबे पांव ऐसे आया कि उसी दिन घर का एक बच्चा भी रोगग्रस्त हो गया।
तत्क्षण झाड़-फूंक करने वाले गांव के चेले को बुलाया गया। चेला समझदार था। उसे ज्ञान था कि गांव के मुहाने पर खुले देसी ठेके के दारू ने उसके पुश्तैनी मंत्र-सिद्धि को बेअसर कर दिया है। जंत्र और धूणी-धागे का अब कोई असर नहीं होता। मंत्रोच्चारण करते समय भी षब्द अटक-भटक जाते हैं। अब न पशुओं के ओपरे पर उसका वश चलता है, न बच्चों की आधि-व्याधि पर। पर फिर भी गांव के गरीबों का वही सबसे पहला उद्धारक था। उसके प्रति आस्था बची हुई थी। भैसों पर उसने बुदबुदाते हुए हाथ फेरा। लगे हाथों ज्वर-पीड़ित बच्चे पर भी मोर-पंखों का मुठ चलवा दिया गया।
  ‘‘ओपरे का इलाज तो मैंने कर दिया है पर डंगर-डाक्टर को भी दिखा लेणा चाहिदा। इस बरसात में पीने का पानी गंदा हो जाने के कारण माणू (मनुष्य) ही नहीं, माल-मवेशी भी बीमार पड़ रहे हैं।’’ कहकर चेले ने मंत्रसिद्ध आटे का बटा हुआ पेड़ा (लोई) दोनों भैसों के मुंह में धकेला और अपना कोहाड़ू (कुल्हाड़ी) उठाकर चलता बना।
दोनों विधवाओं के चेहरे पर परेशानी की रेखाएं उभर आयीं। घर में एक बच्चा भी ताप से तप रहा था। लिहाजा एक मानव-चिकित्सक और एक पशु-चिकित्सक दोनों की बराबर आवश्यकता  आन पड़ी थी, पर दोनों के इलाज के लिए पैसे........ ?
यों तो पंचायत में एक पशु-चिकित्सालय भी था जो सारा दिन खुला रहता  पर वहां डाक्टर नामके उस सरकारी कर्मचारी के कभी कभार ही दर्शन  होते। छः गांवों में से पता नहीं किस गांव में वह गुम हुआ रहता। अतः गांव से आधा किलोमीटर दूर सड़क के किनारेवाले प्राइवेट डंगर-डाक्टर की ही पूछ थी। कुछ लोग कहते कि सरकारी पशु-चिकित्सालय से गायब रहने की एवज में उस सरकारी कर्मचारी को इस प्राइवेट डंगर-डाक्टर से कुछ बंधी-बंधाई मिलती है। पता नहीं, यह झूठ था या सच?
सास न बहू को देखा और बहू ने सास को और आंखों ही आंखों में अंतिम निर्णय हो गया। गोड की बीह पर चिंतामग्न बैठी सास उठकर प्राइवेट डंगर-डाक्टर को बुलाने चल पड़ी।


अरुण आदित्य के उपन्यास पर संजीव


अरुण आदित्य
'अन्यथा' के ताजा अंक में वरिष्ठ कथाकार संजीव ने नयी पीढ़ी के पांच उपन्यासों पर टिप्पणी की है जो पठनीय है. चूंकि हमने अरुण आदित्य से 'उत्तर वनवास' के अंश तब सुने थे जब वे उस पर काम कर रहे थे. लेखन विशिष्टता के कारण उपन्यास प्रभावित ही नहीं, बल्कि बहुत-कुछ सोचने पर विवश करता है. पिछले दिनों पुष्पराज की 'नंदीग्राम की डायरी' पढते समय इस उपन्यास के कई अंश मस्तिष्क में कौंधे.......... रतन चंद 'रत्नेश'

संजीव लिखते हैं-------अरुण आदित्य का ‘उत्तर वनवास’ न सिर्फ़ औपान्यसिक संगठन, बल्कि प्रयोग, भाषा  और शैल्पिक तथा वैचारिक परिपक्वता के लिहाज़ से भी एक सुगठित रचना के रूप में सामने आया है। उत्तर भारतीय जन जीवन में गहरे तक पैठा राम चरित्र मानस ही आधार है इस उपन्यास का और यही उसकी जड़ता का कारण। जो भी सचेत व्यक्ति आता है भारत में बिना जाति से टकराये आगे नहीं बढ़ पाता और उत्तर भारत में बिना राम चरितमानस से टकराये...। बाबा रामचन्द्र दास का किसान आंदोलन इसे धनात्मक रूप में  अपनाता है तो प्रख्यात बंगला कथाकार सतीनाथ भादुड़ी अपने महाकाव्यात्मक आख्यानात्मक उपन्यास ‘दोंड़ाय चरितमानस’ के एंटी मैटर के रूप में पस्तुत करते हैं। दोंड़ाय राम की तरही चक्रवर्ती राजा दशरथ के पुत्र नहीं, राम चरित मानस गा-गाकर भीख मांगने वाले एक भीखमंगे की अवैध संतान है जिसकी मां किसी के साथ भाग गई है। दोंड़ाय का अध्याय विभाजन भी मानस का विद्रूप है। अरुण भले ही ऐसा साहस नहीं दिखा पाये हों लेकिन पारम्परिक रामकथा को लीक से हटाकर आज की कथाभूमि तक ले आने का सत्साहस अवश्य करते हैं। उपजीव्य को चुनने के पीछे उत्तर भारत के प्रधान अंतर्विरोध का चयन उनकी लेखकीय निष्ठा को प्रतिष्ठित  करता है।
गांव के आखिरी छोर मकान नम्बर 151 में रहने वाले मायाराम और मंगला का बेटा है उनका रामचन्द्र। उन्हें लगता है मकान में नहीं दफ़ा 151 में रहते हैं, पुलिस जब चाहे उन्हें दबोच लेगी। बबूल के कांटे, बांस की कोठ और बिलों विवर से झांकते विषधर.... और माता-पिता का डर . उन्हीं के बीच पल रहा है उनका नायक और तमाम अन्तःवाह्य, काल्पनिक-वास्तविक यात्राओं से उपजे मोहभंगों का शिकार है। ‘राजनीति’ यहां ‘रामनीति’ है और भय उपन्यास की केन्द्रीय धुरी....।
‘‘दरअसल हम एक डरे हुए समय में जी रहे हैं, डरी राजनीति, डरा हुआ धर्म, डरा हुआ समाज बहुत खतरनाक होते हैं। और सबसे ज़्यादा खतरनाक होती है डरी हुई पत्रकारिता। और यह हमारे देश् का दुर्भाग्य है कि हमें इन डरी हुई चीज़ों के बीच रहना पड़ रहा है।’’
वर्ण  के लिहाज़ से राम सवर्ण हैं। मगर वर्ग के लिहाज़ से निम्नवर्ग के। और वर्ण हार जाता है वर्ग से। डर का कारण फूलकली और नूरजहां का सौन्दर्य है और रामचन्द्र की पात्रता(योग्यता) भी। सवर्ण रामचन्द्र को उन्हीं की जाति के छोटे कुंवर राहुल सिंह उत्पीड़ित करते रहते हैं। गांव से त्रस्त रामचन्द्र फैज़ाबाद आते हैं। वहां से सत्यानंद का भाषण, बाबरी मस्जिद विध्वंस और क्रम से घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएं रामचन्द्र के पुराने वनवास को नया अर्थ प्रदान करती हैं। वैसे यहां बोधिवृक्ष भी है। नदी के तट पर खड़ा अश्वत्थामा। अपनी निष्ठा से रामचन्द्र इस ‘राजनीति’, ‘रामनीति’ में भी प्रभावशाली बनते चले जाते हैं। और एक दिन गांव लौटते हैं तो जिस  रामलोक की या स्वप्नलोक की परिकल्पना में उन्होंने इतने दिन गवाएं, यह देखकर उन्हें धक्का लगता है कि वह दुःस्वप्न में परिणत हो चुका है। राम के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी का चरित्र और कुछ पात्रों के चेहरे इतने पारदर्शी  हैं कि सहज ही पहचाने जा सकते हैं। लेखक का संकेत भी स्पष्ट है। लेखक ने ‘बांयी ओर जा रही एक उबड़-खाबड़ पगडंडी’ लिखकर अपनी वामपक्षधरता स्पष्ट कर दी है। दलित पक्षधरता और सवर्णों पर दलित प्रेम पर भी वे कटाक्ष करने से नहीं चूकते --‘‘वे हरिजनों के दुःख-दर्द को महसूस करना चाहते थे लेकिन उन्हें लगता है कि उसके लिए रैदासी टोले में पैदा होना पड़ेगा जोकि उनके हाथ में नहीं है।’’ या
‘‘लोकनीति और मर्यादा तय करने वाले तो हम ही हैं-सबरी के बैर भी हमीं खाते हैं और एकलव्य का अंगूठा भी हमीं कटवाते हैं।’’ गांव आने पर रामचन्द्र पाते हैं कि सुविधावादी चेहरे गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं जो उत्तर प्रदेश  की राजनीति पर शत-प्रतिशत सही बैठता है।
अरुण ने कहानी से नहीं, कविता से उपन्यास में पदार्पण किया है, लेकिन भाषा की विरल व्यंजनाओं को जिस तरह साधा है, जिस तरह फ्लैश  बैक, स्वप्न, डायरी, कविता, बिम्बों और फंतासियों का बहुविध प्रयोग किया है, वह उनके अन्दर छुपी संभावनाओं को दर्शाता  है। अलबत्ता अरुण भी सायास शैल्पिक और भाषिक  रचाव के मोह से मुक्त नहीं हैं। धनात्मक पक्ष इसकी ताकत बनता है और ऋणात्मक पक्ष उनके फैलावों के हाथ बांधे रखता है। जैसे - उपन्यास की उठान वे जहां से करते हैं अर्थात् वर्ग बनाम वर्ण उनकी हकीकत का सामना किया जा सकता था लेकिन शैल्पिक संरचना जगह-जगह उनका रास्ता रोक लेती है। एक अंश  देखिए -- ‘‘रामचन्द्र उसके पीछे इतनी तेज़ी से लपके कि नींद से बाहर निकल गए। नींद से बाहर आने के बाद भी सपने से बाहर आने में उन्हें काफी देर लगी।’’ विशिष्ट  बनायेगा लेकिन जनता से जोड़ने में आड़े आयेगा।

भ्रष्टाचारियों का ड्रेस-कोड : रतन चंद ‘रत्नेश’




वैसे तो रिश्वत  लेना और देना हमेशा चर्चा का विषय  रहता है। एक कांड की चर्चा कुछ दिनों तक होती है, उसके बाद कोई नया कांड सामने आ जाता है तो उसकी चर्चा आरंभ हो जाती है। पुराना कांड हासिये पर चला जाता है। यों भी इनसान के दिमाग का आकार इतना छोटा है कि उसमें सभी कांडों को झेलने की ताकत नहीं होती, इसलिए पुराने कांडों को डिलीट यानी कि हटाते रहना पड़ता है। पिछले दिनों सिटी ब्यूटीफुल में भी एक रिश्ववत कांड सुखियों में था जो अब धीरे-धीरे धूमिल होने लगा है। यों तो मुझ जैसे साधारण लोगों को रिश्ववत कांड से कुछ लेना-देना नहीं होता लेकिन यह जानकर तब बड़ा दुःख होता है जब पांच-दस हजार रूपए की रिश्ववत लेते हुए कोई पकड़ा जाता है। बड़ी शर्म महसूस होती है। लोग छोटी-मोटी रकम रिश्वतस्वरूप लेते हैं और उससे भी शर्मनाक बात यह होती है कि वे पकड़े जाते हैं। मेरा यह मानना है कि जो सैकड़ों-हजारों में रिश्वत लेते हैं, वे या तो अनाड़ी होते हैं या फिर अज्ञानी। उन्हें कम से कम इतना ज्ञान होना चाहिए कि आज के दौर में कितना
रिश्वत लेना वाजिब है। उन कमअक्लों को यह भी पता नहीं होता कि जो शख्स पांच हजार की रिश्वत दे रहा है, वह उन्हें मूर्ख समझ रहा है। भला आज के जमाने में रिश्वत में हजारों का क्या काम? इससे बेहतर यह है कि आप रिश्वत देने वाले को पकड़वा दें और अपना सर गर्व से ऊंचा करें। आखिरकार रिश्ववत लेने में भी अपनी औकात बनाए रखना समझदारी की निशानी है।
भ्रष्टाचार के मामले में हम पचास से भी अधिक देशों से आगे हैं। कम से कम एक मिसाल तो कायम की ही जा सकती है कि यहां लाख से नीचे लेन-देन नहीं होता। जो लाख से नीचे रिश्वत लेते धरे जाते हैं, उनके लिए ड्रेस-कोड  तो अवश्य होना चाहिए ताकि आइंदा से कोई कम रिश्वत लेने की हिमाकत न करे। ड्रेस-कोड  का अर्थ स्पष्ट करना यहां उचित रहेगा। इस मामले में फिलहाल शीर्षस्थ भ्रष्ट देश इंडोनेशिया में विचार-विमर्श चल रहा है। वहां के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का मानना है कि भ्रष्टाचार मामले के आरोपियों के लिए यदि ड्रेसकोड निर्धारित कर दिया जाय तो शायद वे कुछ शर्म  महसूस करें। एक विशेष  रंग के कपड़े पहने व्यक्ति को देखते ही लोग जान जाएगें कि वह भ्रष्टाचारी है। इससे दूसरे लोगों को भ्रष्टाचार से दूर रहने का सबक मिलेगा। वहां की आम जनता ने यह सुझाव भी दे डाला है कि ड्रेस-कोड  का रंग चटख लाल या गुलाबी रखा जाय। हमारे देश में भ्रष्टाचार के लिए इन रंगों का ड्रेस-कोड चुना गया तो इसका उल्टा असर हो सकता है। भ्रष्टाचारी कहीं अपने आप को फिल्मी सितारे न समझने लगें और शर्म महसूस करे के वजाय कुछ ज्यादा ही गौरान्वित महससू करने न लग जाएं। यहां के लिए काला रंग ही शायद बेहतर रहेगा क्योंकि ऐसे लोगों का मुंह काला करने की हमारे यहां प्राचीन परम्परा है। इंडोनेशिया करप्शन -वाच की राय है कि ड्रेस-कोड के पीछे आरोपी का नाम, केस संख्या आदि का भी उल्लेख हो। हमारे यहां राज्य का नाम लिखना भी जरूरी है क्योंकि कई बार राज्यों में भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त होड़ देखने को मिलती है। कई लोगों की मानसिकता ही यही रहती है कि हम किसी मामले में पीछे न रहें, चाहे वह भ्रष्टाचार ही क्यों न हो। इंडोनेशिया  में भ्रष्टाचार-निरोधक इकाई के उपप्रमुख एम.जेसिन के अनुसार विशेष पोशाक पहनाकर किसी कैदी को जेल में डाला जाए ताकि वह अलग दिखे तथा अन्य कैदी यह जान सकें कि उसे भ्रष्टाचार के अपराध में सजा मिली है। इस मामने में भी हमारे यहां दिक्कत है। भ्रष्टाचारी को पहचान-चिह्न मिलते ही कई लोग उसे गॉडफादर बनाने के लिए व्यग्र हो उठते हैं। पुलिस भी उनकी सेवा में ऐसे जुट जाती है मानो वही उनका बेड़ा पार करेगा।
पुनश्चः मौजूदा भ्रष्टाचारी-निरोधक जो घमासान चल रहा है, उसमें इस पर भी विचार किया जाए.

रूसी युवतियों ने किया कविता पाठ



प्रो0 वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता की अध्यक्षता में हुई ‘अभिव्यक्ति’ की मासिक गोष्ठी  में इस बार रूस से आई दो युवतियों अन्या और शाशा ने पुश्किन की रोमांटिक कविताओं का पाठ किया जिसका अनुवाद डा0 पंकज मालवीय ने साथ-साथ सुनाया। डा0 मालवीय ने ल्यूदमिला उलित्सकाया की एक कहानी का अनुवाद ‘अंतिम सप्ताह’ भी पढ़कर सुनाया जो रूस की मौजूदा सामाजिक त्रासदी को इंगित करती है। कथाकार रतन चंद ‘रत्नेश’ ने अपनी नई कहानी ‘आपकी सुरक्षा में’ का पाठ किया। पंजाबी साहित्यकार एन. एस. रतन ने कहानी की प्रशंसा   करते हुए कहा कि व्यंग्यात्मक रूप से लिखी गई यह कहानी शहर की असुरक्षा की कई परतें खोलती है। डा0 एन. के. ओबराय, डा0 इन्दु बाली, डा0 प्रसून प्रसाद, ओमप्रकाश  सोंधी और अन्य साहित्यकारों ने भी इस पर चर्चा की। डा0 प्रसून प्रसाद ने अपनी तीन नई कविताएं पढ़ी जबकि महेंद्र और आर. पी. सिंह ने गज़लों का पाठ किया। कैलाश आहलूवालिया ने अपनी कनाडा प्रवास के यात्रा-संस्मरण पढ़कर सुनाया। उभरते हुए कहानीकार मनोज तिवारी की कहानी ‘स्वप्निल गुलदाउदी’ भी बहुत पसंद की गई जो एक गरीब परिवार की मनोव्यथा दर्शाती  है।

नए साल की... (रतन चंद 'रत्नेश')

मेरी शुभकामनाएं..........
रात देर से सोये हम
आलोकित शहर की साज-सज्जा में
रात के जब बारह बजे थे
ठंड में दबी कोयले की आंच
कुनमुनाई थी जरा-जरा
नामचीन सड़क के चौराहे के आस-पास।
उघड़ी हुई मैली स्वेटर में दुबके 
अधनंगे बच्चों की नींद में
पटाखों और होटल के शोर  ने खलल डाला
बुड़बुड़ाए थे बुढ़ाते लोग
अधकचरी सोच और संस्कृति पर।
रात देर से सोये हम
उपहारों के पैकेट पर लिखते रहे
दिशाहीन भटक रहे नाम
लिस्ट बनाई
इंसोमेनियाग्रस्त और डिप्रेस्ड लोगों की
ताकि थोड़ी-सी नींद दे सकें उन्हें
नये साल के उपहार में।
रात देर से सोये हम
हर वर्ष  की तरह इस वर्ष  भी
असमय ही मरे थे असंख्य
खुर्दबीनी गलतियों से लोग
तरह-तरह के वायरसों से आक्रांत
मन और शरीरों के लिए
प्रार्थना करते रहे देर रात तक
रात देर से सोये हम।
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रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक दुर्लभ हाइकू



टैगोर का 150वां जयंती-वर्ष:
कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी जापान-यात्रा (1916) के दौरान एक हाइकू लिखा था जो सन्ï 1989 तक अज्ञात रहा। 1989 में नागोआ शहर के वासी हायाकोजी हायाशी ने टोकियो स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को यह हाइकू और वहां उतारे गए छायाचित्र व एक चांदी-मोती की माला सौंपी थी। वे सभी अब कोलकाता के राष्ट्रीय संग्रहालय में संजोकर रखे हुए हैं। कवि के 126वें जन्मदिवस के अवसर पर पहली बार इन स्मृति-चिन्हों को प्रदर्शित किया गया था। अंग्रेजी में लिखी पांच पंक्तियों की इस हस्तलिखित लघु-कविता के नीचे उन्होंने अपना नाम भी लिखा है। अनुमान है कि यह 31 जुलाई, 1916 को लिखा गया क्योंकि प्राप्त हाइकू में यह तिथि पूर्णत: स्पष्टï नज़र नहीं आती। सुनहरे कागज पर ये पंक्तियां अंग्रेजी में इस तरह लिखी हुई हैं—

'Give me thy whole water

in joy

sings the waterfall

though little of it is

sufficient for the thirsty'

--Rabindranath Tagore

नागोआ निवासी हायाकोजी हायाशी ने तसवीरों और इस हायकू के साथ एक चांदी व मोती की माला भी सौंपी थी जो कवि ने किसी को उपहारस्वरूप दी थी। साथ ही हायाशी ने एक पत्र भी दिया था जिसमें जापानी में इस हायकू का भावार्थ निहित था। जापानी भाषा की मर्मज्ञ डा. पूर्वी गंगोपाध्याय ने उसका अनुवाद यूं किया है—’जिस तरह बिना रुके लगातार झरने की जलधारा बहती रहती है, उसी तरह बिना रुके सभी कार्य करते जाना मानव-जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

विश्वभारती और राष्ट्रीय संग्रहालय के सौजन्य से बांग्ला पत्रिका ‘देश' के शारदीय विशेषांक 2006 में श्याालकांति चक्रवर्ती लिखते हैं—’गुरुदेव टैगोर की प्रथम जापान-यात्रा 3 मई, 1916 को आरंभ हुई थी। इस यात्रा के दौरान अमेरिका जाकर वे पुन: जापान लौटे थे और 13 मार्च, 1917 को उनकी स्वदेश वापसी हुई थी। कवि ने इस यात्रा का वर्णन अपने कई लेखों, पत्रों और संस्मरणों में किया है। इस यात्रा में मुकुल दे, सीएफ एन्ड्रूज और विलियम पियर्सन उनके  सहयोगी थे। इन लोगों ने भी अपने जापान-प्रवास पर संस्मरण लिखे हैं। प्राप्त तसवीर और हाइकू का सृजन जापान के प्रसिद्ध बंदरगाह शहर योकोहामा और वहां के कलाप्रेमी तोमितारो हारा (1869-1939) के बंगले पर हुआ था। 22 मई को टैगोर अपने साथियों के साथ जापान के कोवे बंदरगाह पहुंचे थे। वहां से नारा, कियो तो, टोकियो अंत में वे 28 जुलाई को योकोहामा में रेशम के एक प्रसिद्ध व्यापारी तोमितारो हारा के विशाल फार्महाउस में पहुंचे। हालांकि इसी बीच पियर्सन और मुकुल चंद्र दे के साथ टैगोर 2 सितंबर को अंतत: योकोहामा से रवाना हुए थे। अत: जुलाई के अंत से लेकर सितंबर के शुरू तक प्राय: दो महीने उन्होंने हारा का आतिथ्य स्वीकार किया। भारतीय दूतावास को कविगुरु से जुड़े इन स्मृति-चिह्नïों को सौंपते हुए हायाकोजी हायाशी यह बताना नहीं भूले कि ये तसवीरें, हायकू आदि उन्हें हारा के योकोहामा स्थित घर से उपलब्ध हुए हैं।

योकोहामा-प्रवास के दिनों के बारे में गुरुदेव और मुकुल दे ने जो कुछ लिखा है उससे यह जाहिर होता है कि हारा कला के रसिया थे। आमार कथा (मेरी कहानी) में मुकुल दे लिखते हैं—’योकोहामा में हम वहां के एक धनाढ्य व्यापारी तोमितारा हारा के घर पर ठहरे थे। ये जापानी साहब इतने बड़े कलाप्रेमी होंगे, विश्वास न था। कला पर वे गहन विचार-विमर्श किया करते। उन्होंने मुझे एक पेंटिंग बनाकर दी थी, मैंने भी उनका एक स्केच बनाया।’

संस्मरणों से ज्ञात होता है कि हारा के लिए अतिथि देवो भव होते थे। यही कारण है कि विश्वभ्रमण के दौरान गुरुदेव टैगोर इनके यहां सबसे अधिक दिनों तक ठहरे। हारा टैगोर से आठ वर्ष छोटे थे। उनका जन्म जापान के गिफु प्रिफेक्चर में हुआ था। प्राचीन चीनी साहित्य और इतिहास में उनकी रुचि थी। विवाह के बाद उन्होंने अपने ससुर के रेशम व्यवसाय को अपनाया। टैगोर के जापान सफर के दो वर्ष पूर्व वहां के शिल्प-व्यवसाय में जो भीषण मंदी आयी थी, हारा अपनी कार्यकुशलता और बौद्धिकता से शीघ्र ही उससे उबर गए थे। जापान के कई कलाकारों को वे ताउम्र आर्थिक सहायता पहुंचाते रहे।

सौंपे गए अप्रकाशित तीन छायाचित्र हारा के अतिथि-गृह में ही लिए गए थे। गुरुदेव का श्वेत-श्याम चित्र 13.2&9.3 सें.मी. का है। चित्र के नीचे टैगोर ने अपना नाम तथा अगस्त 31, 1916 लिखा है। यह तसवीर सुनहरे जापानी कागज पर चिपकी हुई थी। कवि ने जहां अपना नाम लिखा था, उसके नीचे फोटोग्राफर केआर माची और योकोहामा अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में उद्धृत है। तोमितारो के घर पर गुरुदेव की देखभाल के लिए एक सोलह वर्षीया तरुणी ओकिओसान नियुक्त थी जिसे कवि अपनी बेटी की तरह मानते थे। वह टैगोर की श्रद्धालु थी और पूरे मनोयोग से उनकी सेवा करती थी। वह मुकुल दे को नियमित रूप से जापानी भाषा सिखलाती थी और स्वयं उनसे बांग्ला सीखती थी।

रतन चंद 'रत्नेश' की लघुकथा --दो टके की नौकरी

बाबू हरकिशन लाल झंडे-बैनरों से सजी-धजी अपनी कार से उतरे। वे अभी-अभी चुनाव-प्रचार से लौटे हैं। अंततः बड़ी मेहनत-मशक्कत के बाद वे इस बार पार्टी का टिकट हासिल करने में कामयाब हो पाए हैं।
अपने आलीशान बंगले में प्रवेश करते ही वे चिल्लाये---
‘‘कहाँ है रामकिशन? जल्दी से भेजो उसे मेरे पास।’’
ढूँढकर उनके युवा बेटे को हाजिर किया गया।
‘‘कहाँ रहते हैं जनाब, दिखते ही नहीं इन दिनों ?’’ उन्होंने बेटे से पूछा।
‘‘पिताजी, फाइनल की परीक्षा सर पर है, उसी में जुटा हूँ । साथ ही इस बार आई.ए.एस. में बैठने की तैयारी भी कर रहा हूँ।’’
बेटे की बात सुनकार बाबू हरकिशन लाल भन्नाए---
‘‘लो सुनो इसकी बात। चुनाव सामने है और इसे पढ़ाई की पड़ी है। ये नहीं कि बाप का हाथ बँटाए। घर में घुसा किताबें चाट रहा है कमबख्त। कोई समझाए इसे।......... अरे भई मेरे चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से जुट जा। मैं जीत गया तो तुझे दो टके की नौकरी के लिए इस तरह किताबों में मगज खपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी...... समझे।’’

रतन चंद 'रत्नेश' की बाल-कविता :गुड़िया रानी

गुड़िया रानी, गुड़िया रानी

बोलो क्यों करती नादानी


घरवालों को बिन बतलाए

बाहर तुम चली जाती हो

मम्मी को होती परेशानी

बोलो क्यों करती नादानी



कभी किसी घर छिप जाती हो

कभी राह भटक जाती हो

ऐसी भी आखिर क्या मनमानी

बोलो क्यों करती नादानी

घर पर बैठ खिलौने खेलो

चकले पर रोटी तुम बेलो

दादी अम्मा से सुनो कहानी

बोलो क्यों करती नादानी

रतन चंद 'रत्नेश' : मेरी डायरी से.........(1)

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ब्लॉग: रतन चंद 'रत्नेश'
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लघुकथा - बेबसी


अंतत: दोनों भाइयों ने बस में पांच सीटें  बुक कराई! सबसे पीछे की । दो अपने लिए और तीन मां ·के लिए। मां बहुत बीमार थी। वह लेट कर ही वापस गांव  जा सकती थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और साथ ही यह भी कहा कि  घर पर ही जितनी सेवा हो सकती है, करो।

बड़ा भाई दिल्ली में ही काम करता था। उसके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, मां के इलाज में खप गई। पैसे होते, तो वह मां को किसी टेक्सी में ले जाता।

दोनों बेटों के बीच मां आंखे मूंदे सो रही थी। बस ने आधे से अधिक फासला तय कर लिया था। तीन सीटों की  टिकट लेने के कारण खड़े रहने को  विवश किसी यात्री से तकरार भी नहीं हुई। कंडक्टर भी उनके  ही इलाके का था। उसी ने सलाह दी थी कि इसी तरह बीमार मां गांव पहुंच सकती है, वरना रास्ते में सवारियां हील-हुज्जत करेगी।

अचानक मां की  देह में  जुंबिश हुई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। पिछली सीट पर बैठे दोनो भाइयों ने  एक दूसरे की ओर कातर निगाह से  देखा। बड़े भाई ने अपने होठों पर उंगली रखकर छोटे को  चुप रहने का इशारा किया। छोटे भाई की आंखों में  आंसू तैरने  लगे । उसका जी कर रहा था कि मां की मौत पर दहाड़ मार-मार कर रोए, पर परिस्थिति   को समझ कर  वह घुटा-घुटा आंसू बहाता रहा और थोड़ी देर में चुप हो गया।

क्लासिकल

लिखे हुए शब्द

लिखे हुए शब्दों का
 कोई अर्थ नहीं
अगर वे
सिगरेट की
आखरी कश की तरह
जमीन पर फेंककर
पांव से कुचल दिए जायें।
लिखे हुए शब्दों की ताकत
ऐसी हो कि बुझता हुआ दीया
फिर से सुलग जाय
अन्याय सहते
 किसी व्यक्ति के साथ
न्याय हो जाय
या जी जाय फिर से
कोई मरता हुआ आदमी।
मैं उन शब्दों को
सहेजना जरूरी समझता हूं
जो चमकते रहते हैं
तारों की तरह
अनंतकाल तक,
जिसके माध्यम से
सुन्दरता को
 बचाए रखने की
हर पल
कोशिश की जाती है।

(चित्र : सूरज जसवाल )

लघुकथा -- लुटेरे


लुटेरे
 
हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनिया से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे। आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।
सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब, कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस, किसी मौके की तलाश में थे।
मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा, 'जितना पी सकते हो, पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको। ’
मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा, 'क्या है? भागो यहां से। ’ वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए, पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा, 'विशाल, बोतल फेंको और भागो। ’
हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना-झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।             साभार : अमर उजाला                                     

कहानी- वह चली गई तो..

घर के तीनों कमरे में बारी-बारी से जाकर वे फिर से अपने पढने की मेज-कुर्सी पर लौट आए। उनके चेहरे पर झल्लाहट साफ नजर आ रही थी। छत पर पंखा मद्धम गति से घूम रहा था। उन्होंने अपनी गर्दन उठाकर एक उचटती निगाह उस पर डाली और मेज पर औंधी रखी किताब को पलटकर फिर से उसमें मन लगाने का प्रयास करने लगे, पर उनका ध्यान लिखे हुए शब्दों पर नहीं टिका। कमरे में एक घुटन भरी उमस व्याप्त थी जो अक्सर ऐसे बरसाती दिनों में हो जाया करती है जब पारा अपने उच्चतम अंक को छूकर थका-थका सा ढलकने लगता है। अपनी नम बनियान को पेट से ऊपर सरकाते हुए वे बडबडाए, न जाने क्यों मेरी चीजों को इधर-उधर कर देती हैं?

वे फिर से उठे और झुककर पहले अपनी मेज और कुर्सी से नीचे झांका। अक्सर ऐसा ही होता है। चीज उनके समीप होती है और वे झल्लाते हुए यहां-वहां ढूंढते फिरते हैं, मृग की कस्तूरी की तरह। इसी कारण अक्सर उन्हें अपनी पत्नी से यह हिमाचली लोकोक्ति सुननी पडती है, कन्ना पर जूंगडा, घरा जो हक्कां।

न जाने कब से वे यह लोकोक्ति सुनते आ रहे हैं लेकिन पहले पत्नी तब सुनाती थी जब वह उनका इधर-उधर रखा सामान ढूंढकर दे दिया करती थी। ऐसा भी नहीं कि वे हमेशा अपनी कोई चीज इधर-उधर रखकर भूल जाते हैं। कई बार घर को करीने से सजाने के एवज में उनकी चीजें इधर-उधर हो जाती हैं। पहले बेटी जब परायी नहीं हुई थी तो कमरों को हमेशा सजा-संवारकर रखती थी। उन्हें अच्छा भी लगता था, परंतु वह उनकी आई हुई चिट्ठियों, पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी सहेजकर टेबल के नीचे या ऊपर रख देती। वह पठन-पाठन की सामग्रियां सहेजकर रखी नहीं गई कि उनकी आंखों से हफ्ते-महीने के लिए ओझल हो जातीं। वे बेटी से सीधे कुछ नहीं कहते लेकिन अपनी पत्नी को सुना जाते- तुम लोग मेरी चीजों को वहीं रहने दिया करो, जहां पडी रहती हैं। आँखों से ओझल होते ही ये मेरे मन से भी ओझल हो जाती हैं।

पत्नी पलटकर कटुवचन कह देती, और घर को कबाडघर बना रहने दें।

वे आँख बचाकर कहते, पढने-लिखने वालों के घर ऐसे ही होते हैं।

किसी का घर ऐसा नहीं होता। सभी अपनी चीजों को करीने से सजाकर रखते हैं। आपकी तरह नहीं कि जहां बैठे वहीं किताबें, अखबार और पत्रिकाएं बिखेर दीं।

वे शुरू-शुरू में तर्क-वितर्क करते पर ज्यों-ज्यों उम्र में परिपक्वता आती गई, उन्होंने कहना छोड दिया फिर भी आदत पूरी तरह नहीं छूटी। घर में उनका चीजों को बिखेरना और पत्नी व बेटी का सहेजना एक नित्यकर्म की तरह चलता रहा। हाँ, बेटी के ब्याहने के बाद उनकी अस्त-व्यस्त जिंदगी में कमोबेश सुधार हुआ है।

चैन नहीं पडा तो वे उठकर धीरे-धीरे सभी कमरों तक गए। सब जगह अच्छी तरह देखा। अलमारी, बेड, टीवी-ट्राली के नीचे, पर उन्हें अपनी हवाई चप्पल कहीं भी दिखाई नहीं दी। वे चप्पल पहनकर थोडी देर घर के सामने खुली हवा में चहलकदमी करना चाहते थे। कल सुबह से बरखा नहीं हुई थी पर आसमान बादलों से ढका रहा। पत्नी रात के भोजन के बाद पडोस की एक महिला के साथ मुहल्ले की सडकों पर टहलने चली गई थी। बेटा एक मित्र की बर्थ-डे पार्टी मनाने किसी होटल में गया हुआ था। ऐसे क्षणों में जब वे घर में अकेले होते हैं, निश्चिन्त होकर अपने पढने-लिखने की मेज पर चले जाते हैं।

वे नंगे पांव बाहर बरामदे तक आ गए। स्ट्रीट-लाइट आज भी गुल थी। पिछले कुछ दिनों से इस वक्त गली में बिल्कुल अंधेरा पसर जाता है। वैसे इस मुहल्ले में चोरी-चमारी या लूटपाट का कोई डर नहीं रहता। सरकारी मकानों की कालोनी है। मकान भी सारे बाबा आदम के जमाने के हैं। कई दीवारें इस कदर उघडी हुई हैं जैसे किसी गरीब औरत का पहरावा। उखडे हुए प्लास्टर, मौसमों की मार से बदरंग बाहरी दीवारें और बूढे-बूढे से जर्जर घर। खिडकियों के कपाट ढीले, चिटखनियां असमर्थ। फिर भी भय, आशंकाएं व असुरक्षा खिडकियों तक आतीं और कुछ सूंघकर वहां से लौट जातीं। अत: यहां सब अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। साल में एकाध बार कभी किसी घर में चोरी हो भी जाती है तो चोरों के पल्ले कुछ खास नहीं पडता।

थोडी देर बरामदे में खडे रहने के बाद वे निराश होकर अंदर चले गए। घर में और भी चप्पलें हैं, पर उनसे बेखबर वे अपनी उसी चप्पल को ढूंढते फिर रहे हैं जो उनकी खास अपनी हैं। नंगे पांव ही कमरों में इधर-उधर डोलते हुए वे बेड-रूम की तरफ चले गए। पढने का सिलसिला कब का टूट चुका था। उन्होंने टीवी ऑन कर रिलैक्स होना उचित समझा। एक चप्पल की वजह से उनका ब्लड-प्रेशर बढ सकता है, इनका उन्हें इल्म था और इससे बचने के टोटके भी। टीवी पर देश की अर्थ-व्यवस्था को लेकर दो विद्वान विचार-विमर्श कर रहे थे। उन्होंने दूसरा चैनल घुमाया। वहां फैशन परेड जारी था। वे बेड पर अधलेटे इत्मीनान से एक के बाद एक चैनल बदलने लगे। चैनल बदलने के साथ-साथ वे सहज भी होते चले गए।

इसी बीच बाहर पत्नी का स्वर सुनाई दिया है। वह किसी से बातें करते हुए घर में प्रवेश कर रही थी। अंदर आने पर खुलासा हुआ कि वही पडोसन साथ है जिसके संग वह टहलने गई थी।

उसने पडोसन को ड्राइंग-रूम में बिठाया और खुद बेड-रूम में आ गई। पत्नी पर नजर पडते ही उन्होंने पूछा, भला मेरी चप्पल कहां है, मिल ही नहीं रही है? यहीं होंगी कहीं। पत्नी ने सहज भाव से कहा और एक कैरीबैग उठाकर ड्राइंगरूम में चली गई। पडोसन को सूट दिखाने जिसे वह आज ही दिन में खरीदकर लायी थी। उनकी इच्छा हुई कि वहीं जाकर कहे, तुम्हें यह सूट दिखाना जरूरी लग रहा है या मेरी चप्पल ढूंढना?

मगर वे चुप रहे और टीवी के एक चैनल पर समाचार सुनने लगे। थोडी देर में उनकी आँखें बोझिल होने लगीं। उन्होंने लेटे-लेटे रिमोट से टीवी बंद किया और दूसरे ही पल गहरी नींद में चले गए।

सुबह आंख खुलने पर देखा कि पत्नी रसोई में चाय बना रही है। उन्होंने टीवी के मेन-स्विच पर निगाह डाली। रात उनसे बंद करने से रह गया था। स्विच ऑफ था। बिस्तर से उतरते ही उन्होंने पूछा, मेरी चप्पल मिली क्या? रात भी तुमने पूछा पर तुम्हें फुर्सत थी ही कहां?

आप भी कमाल करते हैं। दूसरी चप्पल ले लेते। कहते हुए पत्नी ने आकर अपनी चप्पल उनके सामने उतार दीं।

वे बिस्तर से उतरे लेकिन पत्नी द्वारा उतारी चप्पल को पांव में नहीं पहना और नंगे पांव सीधे बाथरूम की ओर चल दिए। वहां बाहर ही उनकी चप्पल पडी हुई थी। फिर ख्याल आया कि कल शाम को ही वे उन्हें वहां उतार गए थे। फिर भी अपनी पत्नी के प्रति अप्रसन्न रहे। मलाल यह था कि वह इन दिनों उनके प्रति लापरवाह होती जा रही है। उनकी आवश्यकताओं को गंभीरता से नहीं लेती। पहले कितना ख्याल रखती थी उनका! मन में ताजी कचोट यह थी कि रात पति की जरूरत को नजरअंदाज कर पडोसन को सूट दिखाना उसे कहीं जरूरी लगा था।

बाथरूम से निकलकर तौलिये की तलाश में वे अपनी मेज तक गए। उनका तौलिया वहां कुर्सी के हत्थे से झूल रहा था। रात मेज पर बेतरतीब रखी उनकी किताबें, कलम और चश्मे को सहेजा जा चुका था। वे बाहर लॉन में आ गए जहां कुर्सी बिछाए पत्नी चाय की ट्रे के साथ उनका इंतजार कर रही थी। उन्होंने अभी-अभी आया अखबार उठाया और कुर्सी पर आ बैठे। पत्नी ने चाय का प्याला उनकी ओर बढाया।

चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने अखबार का एक हिस्सा पत्नी के सम्मुख कर दिया। बिना चश्मे के शब्द उनकी आंखों को धुंधला रहे थे। अखबार के मोटे-मोटे शीर्षकों से नजरें हटाकर उन्होंने पत्नी की ओर बडी आत्मीयता से देखा जो सिर झुकाए शहर की खबरें पढने में तल्लीन थी। वे मन-ही-मन सोचने लगे।

आखिर कब तक हम दोनों एक डाल पर बैठे रहेंगे। किसी एक को तो, कभी-न-कभी, पहले वहां से उडना ही पडेगा। यदि उन्हें ईश्वर ने पहले बुला लिया तो पत्नी को अपनी बची हुई जिंदगी गुजारने में उतनी दिक्कत नहीं होगी। उन्हें संतुष्टि हुई।- लेकिन मुझसे पहले वह चली गई तो...?


(जागरण में प्रकाशित)

शिशु-गीत

मेले से लेकर आइ
मुन्नी एक गुड़िया
रात होते ही जो
बन जाती थी बुढ़िया।

हमने पूछा मुन्नी से
बुढ़िया कैसे बनती गुड़िया
कहने लगी खिलाती इसको
मैं जादू की पुड़िया।

लघुकथा- समस्या




गाँव में जाने पर सारी दिनचर्या बदल जाती है। समय से बँधे रहने के सिलसिले में भी पूर्णविराम–सा लग जाता है। न कोई आपाधापी और न कोई तनाव। यहाँ तक कि दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है, यह जानने की भी चिन्ता नही सताती। न ही समाचारपत्रों को नियम से देखने का चाव रहता है और न ही रेडियो–टीवी से चिपककर बैठने का।
वैसे भी गाँव के समीप बस–अड्डे पर छितराई हुई दुकानों में समाचारपत्र बहुत देर से पहुँचते हैं। तब तक हम जैसे लोगों का पढ़ने का मज़ा ही जाता रहता है जिन्हें अलस्सुबह समाचारपत्र बाँचने की आदत हो।
एक दिन मैं यों ही पूरन की दुकान पर बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था कि आने वाली बस से दलीपा राम जी उतरे। वे हमारे गाँव के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं। मुझे इल्म था कि इन दिनों वे अपनी पुत्री के लिए किसी योग्य–वर की तलाश में हैं। वे मुझे भी अपनी बिरादरी का कोई लड़का शहर में देखने के लिए कह चुके थे।
उन्हें देखते ही मैंने पूछा, ‘‘मास्टर जी, कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं ?’’
‘‘
बस पास ही के एक गाँव में गया था।’’
मैं उठकर उनके समीप जा पहुँचा।
‘‘
कोई लड़का मिला ?’’ मैंने पूछा।
‘‘
उसी सिलसिले में तो गया था।’’
’‘
फिर ... बात बनी कोई ?’’
‘‘
वैसे तो सब ठीक है पर.....’’
‘‘
क्या दहेज–वहेज का कोई अड़ंगा ?’’
‘‘
नहीं–नहीं.. ऐसा कुछ नहीं है। लड़का भी ठीक है, सरकारी नौकरी पर है, घर–बार भी प्राय: ठीक ही है...’’
‘‘
तो फिर कौन–सी समस्या आड़े आ रही है, मास्टर जी?’’
‘‘
बस, लड़के को नौकरी में ऊपरी कमाई कोई नहीं है। आपको तो पता ही है कि आजकल सरकारी नौकरी में ऊपरी कमाई न हो तो.......।’’