साहित्य, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए डॉ. शशि पूनम हमीरपुर, कमलेश सूद - पालमपुर, सुरेश लता अवस्थी, पालमपुर, अनीता भारद्वाज, बैजनाथ, उषा कालिया, कांगड़ा, अरुणा व्यास पालमपुर, अनु ठाकुर, मंडी, पूजा सूद = डोगर, शिमला, विजय कुमारी सहगल बिलासपुर, अर्चना सिंह, कांगड़ा, कल्पना गांगटा, शिमला, मीना चंदेल = बिलासपुर, उपासना पुष्प, डलहौजी, ललिता कश्यप, बिलासपुर, रविंद्रा - कुमारी, पालमपुर, रुचिका परमार कांगड़ा, सुनीता कौल कांगड़ा, मंजू शर्मा बैजनाथ, डॉ प्रिया शर्मा कांगड़ा, डॉ श्वेता शर्मा कांगड़ा, सुमन बाला कांगड़ा, डॉ सत्येंद्र डोहरू कांगड़ा, डॉ स्नेह लता नेगी किन्नौर, अरुणा भारद्वाज धर्मशाला, कांति सूद धर्मशाला, - आशा शर्मा हमीरपुर, प्रो निरूपमा सिंह, सरोज परमार पालमपुर, मोनिका सिंह डलहौजी, रीना भारद्वाज शिमला, डॉ. सपना नेगी किनौर, उमा ठाकुर नदैक शिमला, संतोष शर्मा ऊना, संतोष कालरा सोलन, मनु विनीत शर्मा मंडी, मंजू सूर्यवंशी चंबा, डॉ कविता बिजलवान चंबा को सम्मानित किया गया।
महिला साहित्यकार और समाज सेवा सम्मान से किया अलंकृत
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Saturday, March 09, 2024
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राष्ट्रीय महिला दिवस-2024 के अवसर पर राष्ट्रीय कवि संगम, हिमाचल द्वारा साहित्यिक लेखन, समाज सेवा और कला संस्कृति के प्रसार-प्रचार में उत्कृष्ट योगदान के लिए हिमाचल प्रदेश की महिला साहित्यकारों और महिला समाज सेविकाओं को राज्य स्तरीय महिला साहित्यकार और समाज सेवा सम्मान से अलंकृत किया गया। यह कार्यक्रम सप्त सिंधु परिसर देहरा 2 हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में 9 मार्च 2024 को आयोजित हुआ। जिसमें मुख्य अतिथि डॉक्टर संजीत सिंह ठाकुर अधिष्ठाता समाज विज्ञान संकाय हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय और कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय कवि संगम हिमाचल अध्यक्ष डॉ संदीप शर्मा ने की। सम्मान समारोह में विशेष अतिथियों में शक्ति चंद राणा प्रभारी राष्ट्रीय कवि संगम, युद्धवीर टंडन उपाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम हिमाचल, विकास गुप्ता अध्यक्ष चंबा, प्रभात राणा संरक्षक चंबा, उदयवीर भारद्वाज संरक्षक कांगड़ा, रजनीश धवाला विशेष रूप से उपस्थित रहे।
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मंथन का प्रथम साहित्यिक समागम --- जगदीश बाली
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Sunday, December 23, 2018
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कुमारसैन में ’मंथन’ ने लिखी हिमालय साहित्य मंच व हिमवाणी के साथ शब्द सृजन की ऐतिहासिक इबारत
साहित्यिक रूप से लगभग शांत पड़ी कुमारसैन की फ़िजाओं ने उस वक्त नई हवाओं की खुशबू का एहसास किया जब दुनिया के शोर-शराबे से दूर आइ टी आई के भव्य भवन के सुंदर सभागार में साहित्य मंच ’मंथन’ ने अपनी पहली साहित्य गोष्ठि का आयोजन कर क्षेत्र में शब्द सृजन की एक नई इबारत लिखी। 18 दिसंबर 2018 को 25 कवियों व 100 से अधिक सुधि ग्रामीण श्रोताओं की 250 से ज्यादा आंखें मशहूर लेखक एस आर हर्नोट व ’मंथन’ के हाथों मां सरस्वती के चरणों में साहित्य की लौ जलने की साक्षी बनीं। ’मालूम नहीं उन्हें बीज़ हैं लफ़्ज़ मेरे, नव सृजन का ऐलान करते हैं।’ मंच संचालक की प्रभावशाली आवाज में इन्हीं शब्दों के साथ कवि गोष्ठि का आगाज़ हुआ। मशहूर लेखक हरनौट जी की टीम, जो "हिमालय साहित्य संस्कृति मंच" व 'हिमवाणी संस्था' के साहित्यकारों से लवरेज़ है, ने ’मंथन’ के साथ मिल कर अपनी 'आम जन तक साहित्य 2018’ को यादगार विराम दिया और इस तरह ’मंथन’ का शानदार आगाज़ हुआ। कवियों की शालीनता और स्तर हर किसी के दिल में उतर गए जो एक साहित्यकार के आदर्श व्यक्तित्व की वानगी है। इस कार्यक्रम को सफ़ल बनाने में किसी ने दीवार चीनी तो किसी ने छत बिछाई अर्थात एक सांझे प्रयास के बाद इतना बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित किया जा सका।
सर्वप्रथम प्रतिभा मेहता ने अपनी गज़ल ’हंस के हर ज़ख्म पिए जाते हैं’ को तरन्नुम में प्रस्तुत कर एक बढ़िया शुरुआत की। युवा कवयित्री शिल्पा ने अपनी कविता ’बादल ने दी जीवन जीने कि प्रेरणा’ ने सबको प्रभावित किया। कुलदीप गर्ग तरुण के शेरों ने भी अंतर्मन को छुआ। इसी बीच कवियों के बीच होती हल्की-फ़ुल्की टिका टीप्पणियों व नौक-झौंक से सभागार ठहाकों से भी गूंजता रहा। पूजा शर्मा की कविता ’वर्षों बाद मिल गया पुराना दोस्त था मेरा’ व वंदना राणा की ’इधर भी हैं मज़बूरियां गीत क्या गाने लगा है शहर’ वर्तमान माहौल पर करारा कटाक्ष था। अपने चिर-परिचित हास्यपूर्ण आंदाज़ में नरेश देवग ने जहां नौजवानों को सुसंस्कृत व नशे से दूर रहने की सलाह दी, वहीं नव वर्ष पर उनकी कविता ने श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मज़बूर कर दिया। उन्होंने तरन्नुम में नेताओं पर भी तंज़ कसे। ’मंथन’ मंच के संयोजक हतिंदर शर्मा ने ’मां जीना सिखा दिया’ और ’निरुत्साहित नहीं निष्फ़ल हूं’ जैसी छोटी छोटी रुहानी कविताओं से सबके दिलों को छुआ। मंच प्रचारक व स्थानीय युवा कवि दीपक भारद्वाज ने ’जाड़े की धूप’ कविता से काफ़ी असर छोड़ा। ’पत्थर तोड़ती औरत’ कविता संग्रह के लेखक मनोज चौहान ने अपनी कविता से सबको आकर्षित किया। प्रसिद्ध कवि आत्मा रंजन की ’यूं आए नया साल’ सबको भा गई। मोनिका छटू की कविता ’दुख’ में चौसर का खेल काफ़ी गहराई लिए हुए लगा। ’मंथन’ के सलाहाकार अमृत कुमार शर्मा ने कविता ’मैं लिखूंगा किताब जब तब देखना’ के माध्यम से राजनीतिज्ञ व अफ़सरशाही पर व्यंग्य साधा। ’मंथन’ के सचेतक रौशन जसवाल की कविता ’मैं बच्चा बनना चाहता हूं’ भी बहुत सराही गई। गुपतेश्वर उपाध्याय के संक्षिप्त काव्यपाठ ने सब के मन को छू लिया। उमा ठाकुर ने पहाड़ी भाषा में अपने कविता पाठ से स्थानीय उत्सवों, रीति-रिवाजों व पकवानों से अवगत करवाया। रीतिका और ज्ञानी शर्मा ने पहाड़ी झूरियों से गोष्ठि को नया आयाम दिया। ’मंथन’ के सदस्य ताजी राम वनों की हरयाली पर कविता से सबको प्रभावित किया। युवा कवयित्री कल्पना गांगटा की कविताओं ने युवाओं को समाज के लिए कुछ करने का संदेश दिया। डॉ. स्वाती शर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से नारी की व्यथा को दर्शाया तथा युवा कवि राहुल बाली ने अपनी कविता ’हम अकेले थे’ से बहुत प्रभाव छोड़ा। लगभग साड़े चार घंटे तक चली इस गोष्ठि में मंच संचालन भी उत्कृष्ठ रहा। संचालक ने अपने शेर-गज़लों, क्षणिकाओं, हाज़िर जवाबी व ठिठोली से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। वास्तव में ’मंथन’ का ये पहला कार्यक्रम पहला होते हुए भी सबके दिल में उतर गया। भविष्य जब कुमरसैन के इतिहास के पन्नों को पलटेगा, इसके एक पन्ने पर ये भी लिखा होगा कि 18 दिसंबर 2018 को ’मंथन’ ने ’हिमालय साहित्य संस्कृति मंच’ व हिमवाणि मंच के साथ मिलकर साहित्य की लौ जला कर एक शब्द सृजन की इबारत लिखी थी। इस इबारत लिखने में आई टी आई के प्रधानाचार्य हितेश शर्मा, उनके स्टाफ व छात्रों के योगदान को ’मंथन’ हमेशा याद रखेगा।
साहित्यिक रूप से लगभग शांत पड़ी कुमारसैन की फ़िजाओं ने उस वक्त नई हवाओं की खुशबू का एहसास किया जब दुनिया के शोर-शराबे से दूर आइ टी आई के भव्य भवन के सुंदर सभागार में साहित्य मंच ’मंथन’ ने अपनी पहली साहित्य गोष्ठि का आयोजन कर क्षेत्र में शब्द सृजन की एक नई इबारत लिखी। 18 दिसंबर 2018 को 25 कवियों व 100 से अधिक सुधि ग्रामीण श्रोताओं की 250 से ज्यादा आंखें मशहूर लेखक एस आर हर्नोट व ’मंथन’ के हाथों मां सरस्वती के चरणों में साहित्य की लौ जलने की साक्षी बनीं। ’मालूम नहीं उन्हें बीज़ हैं लफ़्ज़ मेरे, नव सृजन का ऐलान करते हैं।’ मंच संचालक की प्रभावशाली आवाज में इन्हीं शब्दों के साथ कवि गोष्ठि का आगाज़ हुआ। मशहूर लेखक हरनौट जी की टीम, जो "हिमालय साहित्य संस्कृति मंच" व 'हिमवाणी संस्था' के साहित्यकारों से लवरेज़ है, ने ’मंथन’ के साथ मिल कर अपनी 'आम जन तक साहित्य 2018’ को यादगार विराम दिया और इस तरह ’मंथन’ का शानदार आगाज़ हुआ। कवियों की शालीनता और स्तर हर किसी के दिल में उतर गए जो एक साहित्यकार के आदर्श व्यक्तित्व की वानगी है। इस कार्यक्रम को सफ़ल बनाने में किसी ने दीवार चीनी तो किसी ने छत बिछाई अर्थात एक सांझे प्रयास के बाद इतना बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित किया जा सका।
सर्वप्रथम प्रतिभा मेहता ने अपनी गज़ल ’हंस के हर ज़ख्म पिए जाते हैं’ को तरन्नुम में प्रस्तुत कर एक बढ़िया शुरुआत की। युवा कवयित्री शिल्पा ने अपनी कविता ’बादल ने दी जीवन जीने कि प्रेरणा’ ने सबको प्रभावित किया। कुलदीप गर्ग तरुण के शेरों ने भी अंतर्मन को छुआ। इसी बीच कवियों के बीच होती हल्की-फ़ुल्की टिका टीप्पणियों व नौक-झौंक से सभागार ठहाकों से भी गूंजता रहा। पूजा शर्मा की कविता ’वर्षों बाद मिल गया पुराना दोस्त था मेरा’ व वंदना राणा की ’इधर भी हैं मज़बूरियां गीत क्या गाने लगा है शहर’ वर्तमान माहौल पर करारा कटाक्ष था। अपने चिर-परिचित हास्यपूर्ण आंदाज़ में नरेश देवग ने जहां नौजवानों को सुसंस्कृत व नशे से दूर रहने की सलाह दी, वहीं नव वर्ष पर उनकी कविता ने श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मज़बूर कर दिया। उन्होंने तरन्नुम में नेताओं पर भी तंज़ कसे। ’मंथन’ मंच के संयोजक हतिंदर शर्मा ने ’मां जीना सिखा दिया’ और ’निरुत्साहित नहीं निष्फ़ल हूं’ जैसी छोटी छोटी रुहानी कविताओं से सबके दिलों को छुआ। मंच प्रचारक व स्थानीय युवा कवि दीपक भारद्वाज ने ’जाड़े की धूप’ कविता से काफ़ी असर छोड़ा। ’पत्थर तोड़ती औरत’ कविता संग्रह के लेखक मनोज चौहान ने अपनी कविता से सबको आकर्षित किया। प्रसिद्ध कवि आत्मा रंजन की ’यूं आए नया साल’ सबको भा गई। मोनिका छटू की कविता ’दुख’ में चौसर का खेल काफ़ी गहराई लिए हुए लगा। ’मंथन’ के सलाहाकार अमृत कुमार शर्मा ने कविता ’मैं लिखूंगा किताब जब तब देखना’ के माध्यम से राजनीतिज्ञ व अफ़सरशाही पर व्यंग्य साधा। ’मंथन’ के सचेतक रौशन जसवाल की कविता ’मैं बच्चा बनना चाहता हूं’ भी बहुत सराही गई। गुपतेश्वर उपाध्याय के संक्षिप्त काव्यपाठ ने सब के मन को छू लिया। उमा ठाकुर ने पहाड़ी भाषा में अपने कविता पाठ से स्थानीय उत्सवों, रीति-रिवाजों व पकवानों से अवगत करवाया। रीतिका और ज्ञानी शर्मा ने पहाड़ी झूरियों से गोष्ठि को नया आयाम दिया। ’मंथन’ के सदस्य ताजी राम वनों की हरयाली पर कविता से सबको प्रभावित किया। युवा कवयित्री कल्पना गांगटा की कविताओं ने युवाओं को समाज के लिए कुछ करने का संदेश दिया। डॉ. स्वाती शर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से नारी की व्यथा को दर्शाया तथा युवा कवि राहुल बाली ने अपनी कविता ’हम अकेले थे’ से बहुत प्रभाव छोड़ा। लगभग साड़े चार घंटे तक चली इस गोष्ठि में मंच संचालन भी उत्कृष्ठ रहा। संचालक ने अपने शेर-गज़लों, क्षणिकाओं, हाज़िर जवाबी व ठिठोली से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। वास्तव में ’मंथन’ का ये पहला कार्यक्रम पहला होते हुए भी सबके दिल में उतर गया। भविष्य जब कुमरसैन के इतिहास के पन्नों को पलटेगा, इसके एक पन्ने पर ये भी लिखा होगा कि 18 दिसंबर 2018 को ’मंथन’ ने ’हिमालय साहित्य संस्कृति मंच’ व हिमवाणि मंच के साथ मिलकर साहित्य की लौ जला कर एक शब्द सृजन की इबारत लिखी थी। इस इबारत लिखने में आई टी आई के प्रधानाचार्य हितेश शर्मा, उनके स्टाफ व छात्रों के योगदान को ’मंथन’ हमेशा याद रखेगा।
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डॉ. कांता शर्मा का बुधवार सुबह देहांत
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Wednesday, December 16, 2015
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हिमाचल प्रदेश की चर्चित कवयित्री एवं साहित्यकार डॉ. कांता
शर्मा का बुधवार सुबह देहांत हो गया। मंडी जिला से संबंध रखने वाली कांता शर्मा
संवेदनशील कवयित्री, सांस्कृतिक शोधार्थी के अलावा एक अच्छी मंच संचालक भी थीं। उनके निधन से
साहित्यिक जगत में शोक की लहर है। वे कुछ समय से बीमार चल रही थीं। दो दिन पूर्व
उन्हें पीजीआई ले जाया गया था जहां बुधवार तड़के करीब साढ़े चार बजे उन्होंने
अंतिम सांस ली। उनके परिवार में उनके पति नागेंद्र शर्मा, बेटी
आकांक्षा और एक बेटा आयुष है।
29 दिसंबर 1966 को जन्मी कांता शर्मा जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान में बतौर प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत थीं। हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की कांता ने अपनी कविताओं और शोध कार्यों से हिमाचल के हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। छोटी उम्र में ही शादी के बंधन में बंध जाने के बावजूद कांता ने दसवीं के बाद बीए और हिंदी में एमए की शिक्षा पूरी की।
इसके बाद एमफिल और डॉ. धर्मवीर भारती के उपन्यासों पर पीएचडी तक का सफर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के साथ पूरा किया। इसमें उनके पति नागेंद्र शर्मा का योगदान सराहनीय रहा। डॉ. कांता शर्मा के दो कविता संग्रह और दो शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। वे हिंदी के अलावा पहाड़ी भाषा में भी कविताएं लिखती थी। उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थी। इसके अलावा दिल्ली दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहा है। पांडुलिपियों के सर्वेक्षण में भी उनका कार्य सराहनीय रहा है। वे साहित्य की कई संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं।
हिमाचल के साहित्यकारों और साहित्यिक संगठनों ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त किया है। हिमाचल प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष दीनू कश्यप और जनवादी लेखक संघ के सचिव प्रो. सुंदर लोहिया ने कहा कि कांता शर्मा संभावनाशील कवयित्री थी। मशहूर कहानीकार एसआर हरनोट ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह विश्वास ही नहीं होता है कि कांता शर्मा हमारे बीच नहीं रही।
29 दिसंबर 1966 को जन्मी कांता शर्मा जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान में बतौर प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत थीं। हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की कांता ने अपनी कविताओं और शोध कार्यों से हिमाचल के हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। छोटी उम्र में ही शादी के बंधन में बंध जाने के बावजूद कांता ने दसवीं के बाद बीए और हिंदी में एमए की शिक्षा पूरी की।
इसके बाद एमफिल और डॉ. धर्मवीर भारती के उपन्यासों पर पीएचडी तक का सफर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के साथ पूरा किया। इसमें उनके पति नागेंद्र शर्मा का योगदान सराहनीय रहा। डॉ. कांता शर्मा के दो कविता संग्रह और दो शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। वे हिंदी के अलावा पहाड़ी भाषा में भी कविताएं लिखती थी। उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थी। इसके अलावा दिल्ली दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहा है। पांडुलिपियों के सर्वेक्षण में भी उनका कार्य सराहनीय रहा है। वे साहित्य की कई संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं।
हिमाचल के साहित्यकारों और साहित्यिक संगठनों ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त किया है। हिमाचल प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष दीनू कश्यप और जनवादी लेखक संघ के सचिव प्रो. सुंदर लोहिया ने कहा कि कांता शर्मा संभावनाशील कवयित्री थी। मशहूर कहानीकार एसआर हरनोट ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह विश्वास ही नहीं होता है कि कांता शर्मा हमारे बीच नहीं रही।
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यूं भी कोई चुपचाप जाना होता है ? ---- SR Harnot
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Sunday, December 06, 2015
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यूं भी कोई चुपचाप जाना होता है ?
हैलो मॉम, मैं हरनोट बोल रहा हूं।
मैं उस 18 वर्ष की 84 वर्षीय युवा लड़की से रोज बात किया करता था। वे हम सभी की माॅम थी, क्योंकि उन्हें कभी
भी 'आण्टी' बोलना पसन्द नहीं था। 4 दिसम्बर, 2015 को मैं शिमला आकाशवाणी उनके साथ गया था। पिछले कई दिनों से उनकी कहानियों की किताब 'जिंदानी' की कहानियां प्रसारित हो रही थीं जिसकी रिकार्डिंग वे अपनी आवाज में करवा रही थीं। अब उनका प्रसारण समाप्त हो रहा था, इसलिए मुझे उनकी कहानियों पर बात करने के लिए आकाशवाणी से सपना जी ने बुलाया था। हम जब साढ़े ग्यारह बजे स्टुडियो पहुंचे तो तत्तकाल रिकार्डिंग के लिए बुलाया गया लेकिन इसी पल कोई दूसरी रिकार्डिं होनी थी, इसलिए आधे धण्टें मैं और माॅम खूब बातें करते रहें, इसी बीच उनके अपने मोबाइल से कई चित्र भी खींच लिए------विडंबना देखिए, मेरे पास वही चंद तस्वीरें आज शेष रह गईं और वे चुपचाप चली गईं। वैसे उनके चले जाने की उम्र भी थीं, लेकिन जिस तरह वे गईं, विश्वास नहीं होता। एक साल पहले सोए सोए उनके पती सतीश जी चुपचाप निकल गए, और वैसे ही सरोज जी भी, लेकिन जिस तरह यह सब हुआ वह दिल दहलाने वाला था।
5 दिसम्बर को उन्होंने गिरीश और शीला से खूब बातें फोन पर कीं लेकिन मैं घर पर नहीं था और उस दिन कोई बात उनसे नहीं हुई। मैं सुन्नी में था और जब आज सुबह 5 बजे दिल्ली से अशोक ने फोन पर बताया तो मैं दंग रह गया। अशोक उनका मुंह बोलता बेटा है जो दिल्ली और शिमला में उनका पूरा ध्यान रखता है। सरोज जी के दोनों बेटे विदेशों में हैं और बेटी शायद हैदराबाद में। वे शिमला में अकेली रहती थीं। 5 की रात यानि 3 बजे के करीब शायद वे बाथरूम जाने के लिए उंठीं थीं। वे सर्दी से बचने के लिए हीटर लगाए रखती थीं और लगता है उठते हुए रजाई या चादर का किनारा हीटर पर पड़ गया। जब वे वापिस आने लगी होंगी तब तक उनका स्टी रूम जहां वे अब सोया करतीं, धुंए से भर गया था। आग ने पूरा साम्राज्य जमा लिया था उस कमरे में। वे वाकर के सहारे चलतीं थीं, सोचा होगा, बाथरूम में बचाव हो जाएगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ और उनका दम घुट गया। उनके पड़ोसी ने जब धुएं और अाग की लपटें खिड़की से बाहर आते देखीं तो उनके एक पड़ोसी बातिश उनके घर आए लेकिन दरवाजा भीतर से बंद था, पुलिस और फायर ब्रिगेड बुलाई गई। भीतर वह 18 वर्ष की लड़की बाथरूम के साथ अचेत पड़ी थी, स्नोडन अस्पताल ले जाया गया लेकिन वह पहले ही चली गई थीं। अशेाक शिमला पहुंच गया है। उनका बेटा विदेश से शायद कल रात पहुंचेगा। बेटी कल यानि 7 की सुबह पहुंच जाएगी और उनका दाहसंस्कार मंगलवार को किया जाना है, आप यदि इस पोस्ट को पढ़ें तो अशोक से 09811418182 या भाई बातिश से 09418647046 से सम्पर्क कर लें और उनकी अंतिम यात्रा में अवश्य शामिल होने का प्रयास करें, पता नहीं मुझे यह अवसर मिलता है या नहीं, मैं शिमला से बाहर हूं।
हमारी संस्था हिमालय साहित्य मंच ने उन्हें वर्ष 2013 के 'आजीवन उपलब्धि सम्मान' से नवाजा था। पिछले दिनों
हम से बिछड़े रामदयाल नीरज जी को भी उन्हीं के साथ यह सम्मान दिया गया था। आज वे दोनों ही नहीं है, बस उनकी यादें शेष रह गई हैं। मंच का प्रयास है कि शीघ्र ही उनको हम मिलजुल कर याद करेंगे, आपका सहयोग रहा तो।
मेरे पास उनकी ये चंद तस्वीरें हैं और आंखों में आंसू हैं-----इन्हें ही यहां आपके लिए छोड़ रहा हूं, आगे कुछ कहने का साहस नहीं है-------क्या ऐसे भी कोई जाता है ? आज उनके अनेक काम शेष हैं, जिंदा हैं और जिंदा रहेंगे, हमेशा के लिए।
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मधुकर भारती नहीं रहे
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Saturday, May 02, 2015
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विख्यात कवि-आलोचक व सर्जक पत्रिका के संपादक मधुकर भारती का शनिवार को आकस्मिक निधन हो गया। जैसे ही उनके निधन का समाचार मिला, प्रदेश के लेखकों में शोक की लहर दौड़ गई। अपने विनम्र स्वभाव के लिए युवाओं व वरिष्ठ लेखकों के बीच लोकप्रिय मधुक भारती की लेखन यात्रा चार दशक तक विस्तार लिए हुए है।
शिमला के ठियोग के रहने वाले मधुकर भारती उच्च अधिकारी के तौर पर सेवानिवृत हुए थे। डिवीजनल एकाउंट्स ऑफिसर के रूप में सेवा देने वाले मधुकर ऑल इंडिया एकाउंटस ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव रहे। उनका कविता संग्रह 'शरद कामिनी' बेहद चर्चित रहा। वे सर्जक पत्रिका का संपादन करते थे। मधुकर भारती के निधन पर देश भर के लेखकों की संवेदनाएं आ रही हैं। मधुकर भारती ने ठियोग जैसे छोटे कस्बे में रहते हुए अनेक सफल गोष्ठियां आयोजित की। उन गोष्ठियों में देश भर के चर्चित लेखक शामिल हुए। मधुकर भारती गद्य लेखन में सिद्धहस्त थे। उनके लिखे लेख कई संकलनों में शामिल रहे। उनकी कविताओं के प्रशंसकों में पहल के संपादक ज्ञानरंजन सहित देश के अन्य चोटी के कवि शामिल हैं। मधुकर भारती के निधन पर कथाकार एसआर हरनोट, वरिष्ठ कवि तेजराम शर्मा, वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत, लेखक सुंदर लोहिया, केशव, कुलराजीव पंत, बद्री सिंह भाटिया, आत्मा रंजन, सुरेश सेन निशांत, प्रत्यूष गुलेरी, सरोज वशिष्ठ , रौशन विक्षिप्त सहित विभिन्न लेखक संगठनों ने गहरा दुख जताया है। मधुकर भारती के परिवार में उनकी पत्नी, बेटा व बेटियां हैं।
साभार्
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साहित्यिक विचार मंच द्वारा गोष्ठी का आयोजन
Posted by :रौशन जसवाल विक्षिप्त
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Tuesday, September 17, 2013
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साहित्यिक विचार मंच द्वारा उत्तम रेस्टोरेन्ट, सैक्टर-46 में बारहवीं साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता मंच के संस्थापक अध्यक्ष पंजाबी साहित्यकार एन एस रतन ने की। गोष्ठी का संचालन मंच के सचिव प्रसिद्ध ग़ज़लकार अमरजीत ‘अमर’ ने किया। ग़ज़लकार बलबीर ‘तन्हा’ ने दो ग़ज़लों द्वारा गोष्ठी का शुभारम्भ किया।
“दिल की हसरत जवान होती है,
जैसे-जैसे ये उम्र ढलती है”
राजेश ‘पंकज’ ने अपनी कविता “चौदह सितंबर” में राष्ट्रभाषा हिन्दी की अनदेखी पर यूं कटाक्ष किया:
“मां, तेरी जिव्हा को
अजायब घर में रखा जाएगा”।
विजय कपूर ने हिन्दी कहानी “कहां तक फ़ैल गई रेत” तथा हिन्दी लघुकविताओं “ढेर”, “बर्फ़ से”, “वो पहेलियां” का पाठ किया। उपस्थित साहित्यकारों ने कहानी पर अपनी राय देते हुए लेखक को बधाई दी।
डा कैलाश आहलुवालिया ने कविताएं “याद आए रास्ते” तथा “तार पिछ्ले कल बंद हुई” सुना कर खूब तालियां बटोरी।

मदन शर्मा ‘राकेश’ ने कविता “आत्म-समर्पण” तथा हिन्दी कहानी “सहमी संकुचाई जिन्दगी” का पाठ किया। कहानी में जांबाज पुलिसकर्मी के निजी जीवन की स्थितियों का बखूबी चित्रण किया गया। घायल सिपाही की संकल्प शक्ति को सभी ने सराहा।
अमरजीत ‘अमर’ ने अपनी हिन्दी ग़ज़लों से माहौल को रंगीन बना दिया।
“आज वो उसकी पहुंच से दूर सारे हो गए,
जिन फ़रिश्तों का मुकद्दर आदमी लिखता रहा”
“हमारे वास्ते अम्बर नहीं है,
मगर इस बात का अब डर नहीं है”
सुभाश भास्कर ने मदन शर्मा ‘राकेश’ की चर्चित कहानी “मुस्कान का दर्द” का पंजाबी रूपान्तर पेश किया जिसे बहुत सराहना मिली।
गोष्ठी के अध्यक्ष पंजाबी कवि एन एस रतन ने गुरु गोबिन्द सिंह जी की रचना “दशम ग्रन्थ” के अनेक अनजाने पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह ग्रन्थ गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना से भी पहले सन 1696 में रचा था जो कि अब आंशिक रूप में उपलब्ध है। इस की भाषा मुख्यत: ब्रजभाषा तथा हिन्दी है तथा इस में कुछ रचनाएं फ़ारसी तथा पंजाबी में भी हैं। इस ग्रन्थ में 200 से अधिक छन्दरूपों के 15000 से ज्यादा छ्न्द शामिल हैं। अन्त में उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में सभी उपस्थित कवियों व साहित्यकारों को बधाई दी और उन का धन्यवाद किया तथा उत्तम रेस्टोरेन्ट, सैक्टर-46 के सरदार बलविन्दर सिंह जी का विशेष आभार व्यक्त किया।
गायक किशोर कुमार का 81वां जन्मदिन
Posted by :नीलम शर्मा 'अंशु'
ON
Wednesday, August 04, 2010
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आज 4 अगस्त किशोर कुमार साहब के 81 वें जन्म दिन के अवसर पर टालीगंज स्थित उनकी नवीन मूर्ति का अनावरण किया गया। उसी स्थान पर विगत कुछ वर्ष पूर्व उनकी मूर्ति लगाई गई थी, जो काले पत्थर से निर्मित थी। अब उस आईलैंड का नवीनीकरण किया गया है। मूर्ति की ऊँचाई बढ़ाई गई है। आईलैंड का घेरा भी
ऊँचा किया गया है तथा घेरे में ग्रिल से निर्मित हिन्दी और बांग्ला में उनके गीतों की पंक्तियां भी जोड़ी गई हैं। आज सुबह गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में आईलैंड का उद्घाटन तथा मूर्ति का अनावरण किया गया। इस बार की मूर्ति सुनहरे रंग की है। मूर्ति के ऊपर रंग-बिरंगी छतरी लगी है। आईलैंड के इर्द-गिर्द रंगीन बत्तियां भी लगाई गईं हैं। मूर्ति के पीछे दो बड़े-बड़े शंख रखे गए हैं। लाल रंग का एक मंगल घट भी स्थापित है
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