कवि स्व.कोदूराम 'दलित' की पुण्यतिथि

छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम 'दलित' की पुण्यतिथि में तीन पीढि़याँ उपस्थित
जनकवि कोदूराम ''दलित'' के ज्‍येष्‍ठ पुत्र श्री अरुण कुमार निगम के द्वारा प्रेषित एक रपट :- 

छत्तीसगढ़ के जनकवि स्व.कोदूराम 'दलित' की पुण्यतिथि नवागढ़ में स्थित शासकीय स्व.कोदूराम 'दलित' महाविद्यालय में मनाई गई.यह महाविद्यालय काफी वर्षों से नवागढ़ में स्थित है.इस बात की जानकारी दलित जी के परिवार को भी नहीं थी. महाविद्यालय के प्राचार्य , नवागढ़ के नागरिकों तथा विद्यार्थियों को यह नहीं मालूम था कि स्व.कोदूराम 'दलित' कौन है और कहाँ के हैं. जिला चिकित्सालय,दुर्ग के जिला मलेरिया अधिकारी डा. विनायक मेश्राम ने एक दिन नवागढ़ का दौरा करते हुए दलित जी का नाम महाविद्यालय के प्रवेश द्वार पर देखा और उत्सुकतावश महाविद्यालय में जाकर प्राचार्य से मिले और बताया कि दलितजी हमारे बड़े पिताजी हैं. प्राचार्य श्री इतवारीलाल देवांगन बहुत खुश हुए और उन्होंने दलितजी के बारे में विस्तृत जानकारी चाही. डा.मेश्राम ने उनका मोबाईल नंबर लेकर उन्हें आश्वस्त किया कि वे दलित जी के ज्येष्ठ पुत्र अरुण निगम से शीघ्र ही संपर्क कराएँगे. इस प्रकार मुझे अपने पिताजी के नाम पर महाविद्यालय होने कि जानकारी मिली और मैंने तुरंत ही प्राचार्य से मोबाईल पर संपर्क किया. प्राचार्य ने बताया कि वे सोलह वर्षों से वहां पदस्थ है किन्तु दलितजी के बारे में अनभिज्ञ हैं. हम न तो ग्रामवासियों को और नही विद्यार्थियों को दलितजी के बारे में कुछ बता पाते हैं. मैंने निश्चय कर लिया कि २८ सितम्बर को बाबूजी कि पुण्यतिथि नवागढ़ के महाविद्यालय में ही मनाएंगे जिससे नवागढ़वासियों को बाबूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में पता चल सके. इस कार्यक्रम में हमने सपरिवार चलने का निश्चय किया. मैंने श्री दानेश्वर शर्मा जी से संपर्क कर इस सम्बन्ध में चर्चा की, उन्होंने खुश होकर स्वीकृति दे दी. आयोजन के सम्बन्ध में प्राचार्य श्री देवांगन से केवल मोबाईल पर ही चर्चा होती रही और उन्होंने स्वत: ही सारी व्यवस्था करनी शुरू कर दी.
२८ सितम्बर को हम सपरिवार श्री दानेश्वर शर्मा जी के साथ नवागढ़ पहुचे. हमारे साथ स्टेट बैंक रायपुर में कार्यरत व्यंगकार श्री उमाशंकर मिश्रा जी भी थे. शासकीय स्व.कोदूराम 'दलित' महाविद्यालय, नवागढ़ में काफी उत्सुकता और उत्साह का माहौल था. स्थानीय गणमान्य निवासी, विद्यार्थी, पत्रकार एवं महाविद्यालय के कर्मचारी उपस्थित थे. कार्यक्रम के प्रारम्भ में बाबूजी के फोटो का अनावरण किया गया. श्री दानेश्वर शर्मा ने दलितजी के व्यक्तित्व पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि कोदूराम जी दलित ने मुझे चौथी हिंदी में पढाया है. अपने संस्मरण में उन्होंने बताया कि दलितजी मेरे शालेय जीवन के दौरान मुझे रामलीला में लक्ष्मण का अभिनय करते हुए देख लिया था. दुसरे दिन उन्‍होंनें शाला में मुझे बेंच पर खड़े होकर अपने संवाद सुनाने को कहा. इस प्रकार वे छात्रों को हमेशा प्रेरित किया करते थे. वह समय आज़ादी के पहले का था. दलितजी कविताओं और राउत नाचा के दोहों के जरिये राष्ट्रीयता कि भावना जागृत करते थे. राउत नाचा में मैंने उनका यह दोहा पढ़ा था : 'गांधीजी के छेरी भैया दिन भर में-में नरियाय रे, ओकर दूध ला पीके भैया,बुढुवा जवान हो जाये रे." इसी प्रकार उनकी ये पंक्तियाँ देखें : ''सत्य-अहिंसा के राम -बाण , गांधीजी मारिस तान-तान.'', ''खटला खोजो मोर बर, ददा-बबा सब जाव, खेखर्री सही नही, बघनिन सही लाव.
श्री दानेश्वर शर्मा ने बताया कि दलितजी बड़े विनोदी स्वभाव के थे. चर्चाओं और गोष्ठियों में उनकी चुटकियाँ हास्य प्रधान व्यंग्‍य तथा बेबाक उक्तियाँ सुनी जा सकती थी. इत्र के बड़े शौकीन थे. दलितजी खरे भी उतने ही थे. गलतियों को बर्दाश्त नही करते थे. नगरपालिका के शाला में अध्यापक होते हुए भी व्याकरण की गलती पर कालेज के प्रोफ़ेसर को भी फटकार देते थे. वैसे, वे सहृदय भी बहुत थे. एकबार ठण्ड के दिनों में मैं और दलितजी बिलासपुर के कवी सम्मलेन से लौट रहे थे. रात दो बजे के लगभग उनी कोट, मफलर, मोज़े पहने रहने के बावजूद भी मैं ठण्ड से कांप रहा था. मुझे कांपते देख कर दलितजी ने कहा- तुम्हे ठण्ड ज्यादा लग रही है, मेरी शाल ले लो. मैं हैरान हो गया. शिष्य के प्रति इस प्रकार पुत्रवत व्यवहार आज के हमारे जीवन में कल्पना से भी परे है. श्री शर्माजी ने ऐसे बहुत से संस्मरण सुनाये.
श्री दानेश्वर शर्मा के संस्मरणों के पश्चात् जनकवि कोदूराम 'दलित' क़ी ज्येष्ठ पुत्रवधू श्रीमती सपना निगम ने अपनी मधुर आवाज में कृष्ण क़ी रास लीला पर अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया. ''ई नंदलाला, अरे गोपाला, किशन कन्हैया, तय बंशीवाला.'' इस रचना में उन्होंने कृष्ण क़ी रासलीला में ब्रम्हा, विष्णु, महेश, गणेश आदि देवी-देवताओं के सपत्नीक रासलीला में शामिल होने क़ी अद्भुत कल्पना की. श्रोताओं ने रचना को काफी पसंद किया. श्रोतागण हँसते रहे और तालियाँ बजाते रहे. मैंने बाबूजी क़ी कुंडलियों का पाठ किया. ''भाई एक खदान के सब्बो पथरा आन, कोन्हो खुंदे जाय नित, कोन्हो पूजे जाय.'' अन्य रचना ''काटत जाये कतरनी, सूजी सीयत जाय, सहे अनादर कतरनी, सूजी आदर पाय ''.साथ बाबूजी की हिंदी तथा बालोपयोगी रचनाओं का भी पाठ किया. मेरे पश्च्यात उमाशंकर मिश्र ने भी दलितजी क़ी कुंडलियों का पाठ किया. ''मुड़ी हलाये टेटका, अपन टेटकी संग.'' अन्य रचना में ''अरे खटारा साईकिल निच्चट गए बुढाए.''
दूसरे दौर में दानेश्वर शर्मा ने अपनी सदाबहार रचना ''तपतकुरू भाई तपतकुरू '',  ''सुनतो दीदी पार्वती, के साग रांधे रहे '' (छंद) सुना कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया. नवागढ़ के निवासियों ने कहा कि पहले तो हम जानते नही थे क़ी कोदूराम ''दलित' कौन हैं. आज इस कार्यक्रम के आयोजन से हम उनकी महानता से परिचित हो गए हैं. हमें गर्व हो रहा है कि कोदूराम ''दलित' हमारे ही दुर्ग जिले के हैं. मेरी माँ श्रीमती सुशीला निगम ने इस आयोजन के लिए महाविद्यालय और नवागढ़वासियों का आभार प्रकट किया. मेरे छोटे भाई हेमंत निगम ने प्राचार्य श्री देवांगन का शाल श्रीफल से सम्मान किया. कार्यक्रम में मेरे छोटे भाई की धर्मपत्नी श्रीमती नंदा निगम, अपने बच्चों निति, कृति और दीप के साथ उपस्थित थी. मेरा छोटा पुत्र अभिषेक निगम और भांजी शुभा मस्तुरिया ने आयोजन को सफल बनाने में अपना उत्कृष्ट सहयोग दिया. इस प्रकार उक्त आयोजन में कोदूराम ''दलित'' कि तीन पीढि़याँ उपस्थित रहीं. कार्यक्रम की सफलता में ग्राम टिकरी के श्री प्रवीण लोन्हारे(वर्तमान में बेमेतरा में पदस्थ) की भूमिका अविस्मर्णीय रही. कार्यंक्रम की समाप्ति पर हमने बाबूजी की कविताओं का संग्रह ''बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय'' का वितरण सभी को किया.
अरुण कुमार निगम
एच.आई. जी.१/२४
आदित्य नगर,दुर्ग.
मोबाईल-9907174334

साभार  Sanjeeva Tiwari

रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक दुर्लभ हाइकू



टैगोर का 150वां जयंती-वर्ष:
कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी जापान-यात्रा (1916) के दौरान एक हाइकू लिखा था जो सन्ï 1989 तक अज्ञात रहा। 1989 में नागोआ शहर के वासी हायाकोजी हायाशी ने टोकियो स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को यह हाइकू और वहां उतारे गए छायाचित्र व एक चांदी-मोती की माला सौंपी थी। वे सभी अब कोलकाता के राष्ट्रीय संग्रहालय में संजोकर रखे हुए हैं। कवि के 126वें जन्मदिवस के अवसर पर पहली बार इन स्मृति-चिन्हों को प्रदर्शित किया गया था। अंग्रेजी में लिखी पांच पंक्तियों की इस हस्तलिखित लघु-कविता के नीचे उन्होंने अपना नाम भी लिखा है। अनुमान है कि यह 31 जुलाई, 1916 को लिखा गया क्योंकि प्राप्त हाइकू में यह तिथि पूर्णत: स्पष्टï नज़र नहीं आती। सुनहरे कागज पर ये पंक्तियां अंग्रेजी में इस तरह लिखी हुई हैं—

'Give me thy whole water

in joy

sings the waterfall

though little of it is

sufficient for the thirsty'

--Rabindranath Tagore

नागोआ निवासी हायाकोजी हायाशी ने तसवीरों और इस हायकू के साथ एक चांदी व मोती की माला भी सौंपी थी जो कवि ने किसी को उपहारस्वरूप दी थी। साथ ही हायाशी ने एक पत्र भी दिया था जिसमें जापानी में इस हायकू का भावार्थ निहित था। जापानी भाषा की मर्मज्ञ डा. पूर्वी गंगोपाध्याय ने उसका अनुवाद यूं किया है—’जिस तरह बिना रुके लगातार झरने की जलधारा बहती रहती है, उसी तरह बिना रुके सभी कार्य करते जाना मानव-जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

विश्वभारती और राष्ट्रीय संग्रहालय के सौजन्य से बांग्ला पत्रिका ‘देश' के शारदीय विशेषांक 2006 में श्याालकांति चक्रवर्ती लिखते हैं—’गुरुदेव टैगोर की प्रथम जापान-यात्रा 3 मई, 1916 को आरंभ हुई थी। इस यात्रा के दौरान अमेरिका जाकर वे पुन: जापान लौटे थे और 13 मार्च, 1917 को उनकी स्वदेश वापसी हुई थी। कवि ने इस यात्रा का वर्णन अपने कई लेखों, पत्रों और संस्मरणों में किया है। इस यात्रा में मुकुल दे, सीएफ एन्ड्रूज और विलियम पियर्सन उनके  सहयोगी थे। इन लोगों ने भी अपने जापान-प्रवास पर संस्मरण लिखे हैं। प्राप्त तसवीर और हाइकू का सृजन जापान के प्रसिद्ध बंदरगाह शहर योकोहामा और वहां के कलाप्रेमी तोमितारो हारा (1869-1939) के बंगले पर हुआ था। 22 मई को टैगोर अपने साथियों के साथ जापान के कोवे बंदरगाह पहुंचे थे। वहां से नारा, कियो तो, टोकियो अंत में वे 28 जुलाई को योकोहामा में रेशम के एक प्रसिद्ध व्यापारी तोमितारो हारा के विशाल फार्महाउस में पहुंचे। हालांकि इसी बीच पियर्सन और मुकुल चंद्र दे के साथ टैगोर 2 सितंबर को अंतत: योकोहामा से रवाना हुए थे। अत: जुलाई के अंत से लेकर सितंबर के शुरू तक प्राय: दो महीने उन्होंने हारा का आतिथ्य स्वीकार किया। भारतीय दूतावास को कविगुरु से जुड़े इन स्मृति-चिह्नïों को सौंपते हुए हायाकोजी हायाशी यह बताना नहीं भूले कि ये तसवीरें, हायकू आदि उन्हें हारा के योकोहामा स्थित घर से उपलब्ध हुए हैं।

योकोहामा-प्रवास के दिनों के बारे में गुरुदेव और मुकुल दे ने जो कुछ लिखा है उससे यह जाहिर होता है कि हारा कला के रसिया थे। आमार कथा (मेरी कहानी) में मुकुल दे लिखते हैं—’योकोहामा में हम वहां के एक धनाढ्य व्यापारी तोमितारा हारा के घर पर ठहरे थे। ये जापानी साहब इतने बड़े कलाप्रेमी होंगे, विश्वास न था। कला पर वे गहन विचार-विमर्श किया करते। उन्होंने मुझे एक पेंटिंग बनाकर दी थी, मैंने भी उनका एक स्केच बनाया।’

संस्मरणों से ज्ञात होता है कि हारा के लिए अतिथि देवो भव होते थे। यही कारण है कि विश्वभ्रमण के दौरान गुरुदेव टैगोर इनके यहां सबसे अधिक दिनों तक ठहरे। हारा टैगोर से आठ वर्ष छोटे थे। उनका जन्म जापान के गिफु प्रिफेक्चर में हुआ था। प्राचीन चीनी साहित्य और इतिहास में उनकी रुचि थी। विवाह के बाद उन्होंने अपने ससुर के रेशम व्यवसाय को अपनाया। टैगोर के जापान सफर के दो वर्ष पूर्व वहां के शिल्प-व्यवसाय में जो भीषण मंदी आयी थी, हारा अपनी कार्यकुशलता और बौद्धिकता से शीघ्र ही उससे उबर गए थे। जापान के कई कलाकारों को वे ताउम्र आर्थिक सहायता पहुंचाते रहे।

सौंपे गए अप्रकाशित तीन छायाचित्र हारा के अतिथि-गृह में ही लिए गए थे। गुरुदेव का श्वेत-श्याम चित्र 13.2&9.3 सें.मी. का है। चित्र के नीचे टैगोर ने अपना नाम तथा अगस्त 31, 1916 लिखा है। यह तसवीर सुनहरे जापानी कागज पर चिपकी हुई थी। कवि ने जहां अपना नाम लिखा था, उसके नीचे फोटोग्राफर केआर माची और योकोहामा अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में उद्धृत है। तोमितारो के घर पर गुरुदेव की देखभाल के लिए एक सोलह वर्षीया तरुणी ओकिओसान नियुक्त थी जिसे कवि अपनी बेटी की तरह मानते थे। वह टैगोर की श्रद्धालु थी और पूरे मनोयोग से उनकी सेवा करती थी। वह मुकुल दे को नियमित रूप से जापानी भाषा सिखलाती थी और स्वयं उनसे बांग्ला सीखती थी।

कन्हैयालाल नंदन



हिंदी के जाने माने साहित्यकार और पत्रकार कन्हैयालाल नंदन का  25 सितंबर को  निधन हो गया। वह 77 वर्ष के थे।  वह पिछले काफ़ी समय से डायलिसिस पर थे। उनके परिवार में पत्नी और दो पुत्रियाँ हैं। 
 उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर जिले में 1 जुलाई 1933 को जन्मे नंदन ने  डीएवी कानपुर से स्नातक , इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर  और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच.डी की। उन्होंने  4 वर्षों तक मुम्बई के महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। वह वर्ष 1961 से 1972 तक धर्मयुग में सहायक संपादक रहे। 1972 से दिल्ली में क्रमश: पराग, सारिका और दिनमान के संपादक रहे । तीन वर्ष तक दैनिक नवभारत टाइम्स में फ़ीचर संपादक, 6 वर्ष तक हिन्दी संडे मेल में प्रधान संपादक और 1995 से इंडसइंड मीडिया में निदेशक के पद पर कार्य  किया । नंदन को पद्मश्री, भारतेंदु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार और नेहरू फ़ैलोशिप सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्होंने विभिन्न विधाओं में तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं। वह मंचीय कवि और गीतकार के रूप में मशहूर रहे। उनकी प्रमुख कृतियाँ लुकुआ का शाहनामा, घाट-घाट का पानी, आग के रंग, समय की दहलीज़ बंजर धरती पर इंद्रधनुष,गुज़रा कहाँ कहाँ से आदि‍ तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं जो विभिन्न विधाओं को समृद्ध करती हैं । वह मंचीय कवि और गीतकार के रूप में मशहूर रहे। साहित्य सुगंध की भावभीनी श्रद्धाजंलि !

गणेश चतुर्थी व्रत कथा (पत्थर चौथ)

दोस्तो,  आज ईद और गणेश चतुर्थी पावन त्योहार है। दोनों ही त्योहार का संबंध चांद से है। ईद में चांद का दर्शन किया जाता है लेकिन भाद्र चतुर्थी के इस दिन चांद नहीं देखा जाता। पौराणिक कथा है कि इस दिन चंद्र दर्शन से झूठा कलंक लगता है। तो लीजिए विस्तार से पेश है यह कथा। 


गणेश चतुर्थी व्रत कथा 


     ०    आशा रानी शर्मा 




हर शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन किया जाता है, गणेश जी ऋद्धि-सिद्धि, सुख-समृद्धि के देवता माने जाते हैं। आज भाद्र माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी है। इस दिन गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है। आज के दिन चन्द्र दर्शन नहीं किया जाता। पौराणिक कथा है कि आज के दिन चांद देखने से झूठा कलंक लगता है। अगर, ग़लती से चन्द्र के दीदार हो भी जाएं तो यह कथा सुन लेनी चाहिए या इसका पाठ कर लेना चाहिए। कथा यूं है :-


 गणेश जी किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपने वाहन मूषक पर सवार हो कर जा रहे थे। चंद्रमा ने उनका मज़ाक उड़ाया। चंद्रमा को अपने सौंदर्य, अपनी खूबसूरती पर बहुत अभिमान था। उनके अभिमान को भंग करने के लिए गणेश जी ने उन्हें शाप दे दिया कि जो भी तुम्हें देखेगा उसे कलंक लगेगा। परिणामस्वरूप चंद्रमा को अपनी ग़लती का अहसास हुआ तो उन्होंने गणपति से क्षमा याचना की। अंतत: गणेश जी ने प्रसन्न हो कर उन्हें इस शाप से मुक्त करते हुए कहा कि इसका प्रभाव केवल भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को रहेगा। 


कहते हैं कि एक बार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण को गाय दुहते समय गाय के मूत्र में चांद दिख गया था। परिणामस्वरूप उन पर समयंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा। कथा कुछ इस प्रकार है -


सत्राजित यादव ने सूर्य भगवान की तपस्या कर उनसे समयंतक मणि प्राप्त की थी जिसका प्रकाश सूर्य के समान था। वह प्रतिदिन पूजा के बाद स्वर्ण प्रदान करती थी। एक दिन उस मणि को धारण कर सत्राजित श्री कृष्ण के दरबार में गया तो लोगों ने श्री कृष्ण से कहा कि भगवान सूर्य आपके दर्शनों को पधारे हैं। श्री कृष्ण ने कहा कि यह तो सत्राजित है। वास्तविकता पता चलने पर लोगों ने सत्राजित से वह मणि राजा उग्रसेन को सौंपने का आग्रह किया परंतु उसने इन्कार कर दिया।



एक दिन सत्राजित का छोटा भाई प्रसेन उस मणि को गले में डाल जंगल में गया। वहाँ एक शेर ने उसे मार कर मणि ले ली। आगे चल कर शेर को रीछ जामवंत ने मार डाला और मणि ले जाकर अपनी बेटी को दे दी।

उधर प्रसेन के घर न लौटने पर सत्राजित ने अपनी पत्नी से शंका ज़ाहिर की कि मणि की ख़ातिर श्री कृष्ण ने मेरे भाई को मार दिया है। इस तरह धीरे-धीरे यह बात श्री कृष्ण की पटरानी तक पहुंची और पटरानी से श्री कृष्ण तक। आरोप को सुनकर भगवान श्री कृष्ण कुछ लोगों को साथ लेकर प्रसेन की तलाश में गए। जंगल में उन्हें प्रसेन का शव दिखा और शेर के पैरों के निशान नज़र आए। पैरों के निशानों का पीछा करते हुए वे आगे बढ़े तो थोड़ा आगे जाकर उन्होंने शेर को भी मृत पाया। पुन: वे रीछ के पैरों के निशानों का पीछा करते हुए एक गुफा के पास पहुँचे। श्री कृष्ण ने अपने साथियों से गुफा के बाहर इंतज़ार करने को कहा और यह भी कहा कि 15 दिनों तक मैं न आऊँ तो आप लोग वापिस लौट जाएं और मुझे मृत समझ लिया जाए। गुफा के भीतर प्रवेश कर श्री कृष्ण ने वहाँ जामवंत की बेटी को  मणि के साथ खेलते देखा। वे उससे मणि लेने लगे तो बेटी ने जामवंत को आवाज़ दी। उस मणि के लिए दोनों में 27 दिनों तक रात-दिन युद्ध हुआ। अंतत: हार मान कर जामवंत ने अपनी बेटी जामावंती श्री कृष्ण को ब्याह दी और मणि उपहार में श्री कृष्ण को सौंप दी। और, इस प्रकार वापिस आकर श्री कृष्ण ने वह मणि सत्राजित को वापिस लौटा कर खुद पर लगे झूठे कलंक से मुक्ति पाई और बताया कि भाद्र चतुर्थी (चौथ का चांद) का चांद देखने के कारण मुझ पर यह झूठा कलंक लगा था। यह भी कहा कि अगर कोई ग़लती से भादों की चौथ का चांद देख ले तो उसे मणि की इस कथा का श्रवण या पाठ कर लेना चाहिए तो कलंक दूर हो जाएगा और भगवान गणेश प्रसन्न हो जाएंगे। सत्राजित ने अपनी बेटी सत्भामा का विवाह कर मणि श्री कृष्ण को भेंट कर दी।  



!  जय गणेश  !

गीतकार शैलन्द्र को श्रद्दांजलि


'मारे गए गुलफ़ाम' पर तीसरी कसम बनाने वाले गीतकार शैलन्द्र का कल 30 अगस्त को जन्म दिन है। मारे गए गुलफाम बनाने के क्रम में शैलन्द्र साहब का भी वही हष्र हुआ। अपना सब कुछ इस फिल्म पर झोंक कर सचमुच वे मारे गए। इस सदमें को बर्दाश्त न करते हुए अंतत: 14 दिसंबर, 1966  को वे इस जगत से विदा हो गए।इस दिन राजकपूर साहब का जन्मदिन था।  फ़िल्म ज़बरद्स्त सफल हुई लेकिन इस सफलता को देखने के लिए वे नहीं रहे। उतना इंतज़ार उनकी आत्मा को गवारा न हुआ। गीतों ने तो लोकप्रियता की हदें पार की, चाहे वह पान खाए संईया हमार हो या चलत मुसाफिर मोह लीना रे पिंजरे वाली मुनिया या सजन रे झूठ मत बोलो।  शैलेन्द्र साहब ने उस समय के सभी संगीतकारों सलिल चौधरी, एस. एन. त्रिपाठी, एस. डी. बर्मन, पं. रविशंकर के साथ काम किया लेकिन राजकपूर, शैलन्द्र और शंकर जयकिशन ने मिलकर कालजयी गीत-संगीत की सर्जना की।


उनकी लिखित पंक्तियां उन पर प्रासंगिक प्रतीत होती हैं :-

' के मर के भी किसी को याद आएंगे
किसी  के आँसुओं में मुस्कराएंगे
कहेगा फूल हर कली से सौ बार
जीना इसी का नाम है।'








साहित्य सुगंध परिवार की भाव-भीनी श्रद्धांजलि कलम के उस चितेरे के नाम !


प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'

मुकेश चंद्र माथुर को श्रद्धा सुमुन

दोस्तो रफी, मुकेश, किशोर त्रयी के पार्श्व गायक मुकेश साहब की आज पुण्यतिथि है। एक बात काबिल-ए-गौर है कि रफ़ी, किशोर की आवाज़ में परफार्म वाले तो बहुत से गायक हैं और मिल भी जाएंगे लेकिन मुकेश जी का जवाब नहीं। मुकेश साहब की आवाज़ में गाने वाले उनके पुत्र नितिन मुकेश के अलावा कोई और शायद ही उनके आस-पास पहुंच पाया है।  ख़ैर मुकेश जी तो पर्दे पर छाना चाहते थे लेकिन क़िस्मत ने उन्हें पार्श्व-गायन में बुलंदियों पर पहुंचाया। उनकी इस चाहत को उनके पौत्र नील ज़रूर पूरा करने में प्रयासरत हैं।

एक बात शेयर करना चाहूंगी कि रफ़ी, मुकेश, किशोर और लता मंगेशकर को एक साथ गाने का अवसर केवल एक ही गीत में मिला था। वह गीत था अमर अकबर एन्थॉनी का हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें। इस गीत में परवीन बॉबी की आवाज भी थी। यही गीत इन चार महारथियों द्वारा एक साथ गाया पहला और अंतिम गीत है।

 साहित्य सुगंध परिवार मुकेश जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

आकाशवाणी कोलकाता के जन्मदिन पर विशेष


पुराने ज़माने में हमारे पास मनोरंजन के साधन न के बराबर हुआ करते थे। नानी, दादी के क़िस्सों से हम बच्चे खुश हो जाया करते। उनसे राजा-रानी, परियों की कहानियां सुनते-सुनते कब रात को नींद हमें अपने आगोश में ले लेती पता ही न चलता। और, अब वे क़िस्से कहीं पीछे छूट गए हैं क्योंकि आज बच्चों की नानी और दादी भी कहीं बहुत पीछे छूटती जा रही हैं । उन्हें अपने इस ‘छूटने’ का मलाल क़तई नहीं बल्कि (बकौल डॉ कुमार विनोद) उनकी परेशानी का आलम कुछ यूं हैं -


‘बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है



कहानी की किताबों में न आजकल राजा है न रानी है।’





मुझे अच्छी तरह याद है......बचपन में नानी और दादी का आँचल तो नहीं मिला, हां मां ज़रूर रात को कहानियां सुनाया करती थीं। उनमें राजा-रानी के किस्सों के साथ-साथ पौराणिक कहानियां ज्यादा होतीं।  मेरा भाई जब तीन-साढ़े तीन वर्ष का था तो जब तक मां रात को रसोई के काम से फ़ारिग होकर बिस्तर पर आती, वह मुझसे कहा करता कि दीदी तब तक तुम कोई कहानी सुनाओ। मैं जैसे ही सुनाना शुरू करती - इक सी राजा....., वह तुरंत अपने तुतलाते स्वर में कहता – इक नाणी ।

राजा – रानी और परियों की कहानी के साथ हमारे पास मनोरंजन का एक साधन और भी मौजूद था – रेडियो ! जी हां, उस ज़माने में रेडियो ही वह सशक्त माध्यम था, जो मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाएं भी देता था। उससे भी बहुत पहले उसकी पहुंच हर किसी के वश की बात नहीं थी। जिस घर में रेडियो होता, उस घर के बाहर लोगों का मजमा इकट्ठा हो जाता। सभी एक जगह बैठकर एक साथ मिलकर सुनते। लोग हैरान होते कि उस डिब्बे में से आखि़र आवाज़ कैसे निकलती है। मेरा रेडियो से पहला परिचय शैशवावस्था में ही हुआ। मेरे पिता जिस कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत थे उनके रसोईये को रेडियो सुनने की बहुत आदत थी। रेडियो का हैंडल पकड़े वह इधर-उधर घूमता रहता, काम भी करता जाता। एक दिन उसी के रेडियो में दिल से संबंधित कोई गाना बज रहा था, वह गाना सुनकर मैंने मेरी मां से तुतलाती हुई आवाज़ में कहा था – 'मम्मी, मम्मी! डीडी (रेडियो) कैंहदा, दिल्ला मेरा ' (मुझे तो याद नहीं घर वाले बताते हैं)। हमारे घर में रेडियो बजाने की अनुमति नहीं थी, हां यह अलग बात है कि घर के सामने डेकोरे़टर्स की दुकानों पर दिन भर फिल्मी गीत बजा करते थे। व्यक्तिगत रूप से रेडियो से जुड़ाव कॉलेज के दिनों में हुआ। भाई साहब ने रेडियो खरीद कर लाकर दिया। तब मैं रेडियो पास रखकर ही पढ़ा करती। परीक्षा की तैयारी भी इसी तरह होती। रेडियो धीमे स्वर में बजता रहता, भले ही उसके कार्यक्रमों की तरफ ध्यान रहता हो या नहीं। कॉलेज का वक्त पंजाब में गुज़रा, उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चर्मोत्कर्ष पर था पर हमें उससे कोई मतलब नहीं था। हमारी अपनी ही दुनिया था, आवाज़ के साथियों की दुनिया। वहां ऑल रेडियो दिल्ली की उर्दू सर्विस खूब सुनी जाती थी। प्रसारण भी बहुत स्पष्ट होता था मीडियम वेव पर। तरह-तरह के फ़रमाईशी गीतों के प्रोग्राम, ख़तों के प्रोग्राम, बच्चों के प्रोग्राम, फ़िल्मों से संबंधित तरह-तरह के प्रोग्राम। हम आवाज़ के ज़रिए प्रोग्राम के आर. जे. को पहचाना करते या फिर उनकी प्रस्तुति के विशेष अंदाज़ से भी। बस यहीं से रेडियो से गंभीरता से जुड़ाव हुआ। ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गई थी 1980 से 86 तक। 1986 के बाद वापिस बंगाल आए तो भी दुआर्स में शॉर्ट वेव पर उसे सुन लेते परंतु 1989 में कोलकाता आने के बाद उर्दू सर्विस का साथ छूट गया क्योंकि यहां शॉर्ट वेव पर उसे ट्यून करने में बहुत मशक्त करनी पड़ती, तिस पर प्रसारण भी स्पष्ट सुनाई नहीं देता। आज भी जब-जब पंजाब जाना होता है तो हम उसे बड़ी शिद्दत से सुनते हैं। रेडियो के जुनून का सिलसला ऐसा रहा कि जब - जब मौका मिलता खाली वक्त में कोलकाता में ऑफिस में भी ड्रॉयर में रख रेडियो सुना करती। इसके बाद 1998 में आकाशवाणी कोलकाता की एफ. एम. सेवा शुरू हुई तो पता चला कि सुबह नौ बजे और शाम छह बजे तक बड़े बढ़िया हिन्दी गीत बजा करते हैं तो उसे सुनने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। इसी दौरान रेडियो पर घोषणा सुनकर एफ. एम के आकस्मिक आर. जे. के लिए आवेदन किया और अब विगत लगभग ग्यारह वर्षों से खुद ऑल इंडियो रेडियो एफ. एम पर परफार्म कर रही हूं। बल्कि इस तरह रेडियो का वह जु़ड़ाव और मजबूत हो गया। रेडियो से जुड़ा एक क़िस्सा और शेयर करना चाहूंगी। 1990 में दिल्ली रेडियो गई तो वहां अपने क़ालेज के ज़माने में सुने आर. जे. से मुलाक़ात की। रेडियो के रिसेप्शन रजिस्टर में मैंने अपने नाम के साथ सिर्फ़ 6, एस्पलानेड ईस्ट, कोलकाता - 69 लिखा था, अपने ऑफिस का नाम नहीं लिखा था । फिर भी रजिस्टर से प्राप्त अधूरे पते पर ही रेडियो के किसी स्टाफ द्वारा भेजा गया पत्र मेरे ऑफिस में मुझ तक पहुंच गया। उन दिनों तो कोलकाता में मुझे ज़्यादा लोग जानते भी नहीं थे, शहर में आए साल भर हुआ था। रेडियो अब भी मेरे पास ऑफिस ड्रायर में रखा रहता है, यह अलग बात है कि अब सुनने की उतनी फुर्सत नहीं मिलती, ज़रूरी होने पर न्यूज़ बुलेटिन कभी-कभार अवश्य सुन लेती हूं।

रेडियो से जुड़ा यादगार वाक्या : बतौर आर. जे. दो यादगार घटनाओं का ज़िक्र करना चाहूंगी, पहली यह कि मैंने आकाशवाणी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर छायालोक की विशेष तैयारी की थी। मेरा प्रोग्राम 6 बजे से शुरू होना था। उससे पहले लखनऊ केन्द्र से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार वितरण से संबंधित लाइव प्रोग्राम का प्रसारण चल रहा था। वह लाइव प्रोग्राम इतना लंबा चला कि मेरे प्रोग्राम का समय भी उसी में कवर हो गया और मैं स्टुडियो में माइक्रोफोन के सामने बैठी इंतज़ार ही करती रह गई। दूसरी घटना है, उन दिनों अभिनेता प्रदीप कुमार साहब अपनी अस्वस्थता के दिनों में कोलकाता में थे। मैंने उन पर पूरे एक घंटे का लाइव शो पेश किया, जिसे उन्होंने अपने आवास पर सुना। उनकी गुज़रे ज़माने की यादें ताज़ा हो गई और उन्होंने सुनकर उस प्रोग्राम को सराहा। यह मेरी विशेष उपलब्धि रही कि इतने बड़े कलाकार ने मेरी परफार्मेन्स को सुना। एफ. एम. से ज़ुड़ने के बाद रेडियो कोलकाता को जितना मैंने जाना चलिए आप को भी बता दूं।

जी हां, 15 अगस्त और 26 जनवरी इतिहास के पन्नों में क्यों दर्ज हैं इससे तो शहर का बच्चा-बच्चा परिचित होगा लेकिन 26 अगस्त के बारे में ही शायद किसी को याद हो। 26 अगस्त 1927 को आकाशवाणी के कोलकाता केन्द्र की स्थापना हुई। बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल सर स्टेनली जैक्सन ने इसकी स्थापना की थी। आरंभ में इसका कार्यालय 1 गरस्टिन प्लेस में (अब बी. बी. डी. बाग़) में था। इसके पश्चात् 15 सितंबर 1958 में इसे इडेन गार्डन के मौजूदा भवन में स्थानांतरित किया गया। मुंबई और कलकत्ते वाले प्रसारण निजी ट्रांसमीटरों से होते थे, बाद में इन ट्रांसमीटरों को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। 1 अप्रैल 1930 को ही रेडियो का प्रसारण सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया था। Deptt. of Industries & Labour के अधीन इसका Indian Broadcasting Service नामकरण किया गया। 1 जनवरी 1936 को Indian State Broadcasting Service के दिल्ली केन्द्र की स्थापना की गई। 8 जून 1936 को इसक नामकरण किया गया – All India Radio. पुन: 1938 में इसका नामकरण किया गया - ‘आकाशवाणी’। रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित कविता ‘आकाशवाणी’ के आधार पर यह नामकरण किया गया। 1935 तक रेडियो से दो समाचार बुलेटिन प्रसारित होते थे, एक अंग्रेजी में और दूसरा भारतीय भाषा में। 1947 तक आते-आते इनकी संख्या बढकर 74 हो गई। इसके बाद रेडियो की अपनी पत्रिका भी प्रकाशित की जाने लगी, अंग्रेजी में ‘ All India Times’ और बांग्ला में ‘बेतार जगत’। 20 अक्तूबर 1941 को आकाशवाणी को सूचना मंत्रालय में शामिल किया गया। आकाशवाणी से प्रसारित सर्वश्रेष्ठ नाटक, फीचर तथा संगीतप्रधान नाटकों के लिए 1974 से आकाशवाणी के वार्षिक पुरस्कार शुरू किए गए।


हिन्दी प्रसारण : 1954 में आकाशवाणी कोलकाता से हिन्दी सेवा का प्रसारण आरंभ हुआ और 1980 में उर्दू सेवा का। एफ. एम.सेवा भी 1980 से शुरू हुई जिसकी समय-सीमा थी सुबह 7 बजे से 11 बजे तक। 1995 में इस समय-सीमा को बढ़ाकर 24 घंटे कर दिया गया।



हिन्दी एफ. एम : एफ. एम. की हिन्दी सेवा (107 मेगाहर्टज् पर) जून 1998 से शुरू हुई। इसके तहत् फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सिर्फ़ शाम को प्रसारित किया जाता था। 18 अगस्त 1998 से यह कार्यक्रम सुबह भी प्रसारित किया जाने लगा। सितंबर 1998 में इसका नामकरण किया गया – ‘छायालोक’ ।


चैनलों का नया नामकरण : 1 सितंबर 2001 को एफ. एम के द्वितीय चैनल (100.2 मेगा.) का प्रसारण शुरू हुआ। अप्रैल 2002 में एफ. एम. के इन दोनों चैनलों का नया नामकरण किया गया क्रमश: रेनबो और गोल्ड। ट्रैफिक संबंधी जानकारी का प्रसारण 16 फरवरी 2002 से हुआ।



रेडियो पर प्रथम : विश्व के प्रथम अनांउसर थे, हंगरी के वुडापेस्ट शहर के एडे शर्टसई। 1901 में उन्होंने प्रथम बार माइक्रोफोन का सामना किया था। वहीं आकाशवाणी कोलकाता की प्रथम महिला एनांउसर थीं - श्रीमती इंदिरा देवी। महिला महल कार्यक्रम की प्रथम संचालिका थी श्रीमती बेला दे।



अभिलेखागार : आकाशवाणी कोलकाता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर महत्वपूर्ण अभिलेखों को संरक्षित किया गया। आकाशवाणी के पूरे गौरवशाली इतिहास को 52 एपिसोडों में सहेजा गया है। इसके लिए केन्द्रीय अभिलेखागार बनाया गया और आकाशवाणी के प्रोड्यूसर प्रदीप कुमार मित्रा ने लगभग 7250 अभिलेखों को संरक्षित किया। ज्योति बसु, महाश्वेता देवी, शैलेन मन्ना जैसे विशिष्ट और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर तीन-तीन घंटों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। लोगों की मांग को देखते हुए आंचलिक संगीत पर ज़ोर देते हुए ड्रामा, लोक नाट्य और साहित्य से संबंधित प्रोजेक्ट तैयार किए गए हैं। बंगाल के लोकगीत, भक्ति संगीत, देश भक्ति गीत के साथ-साथ विभिन्न भाषाओं की सर्व भारतीय श्रेष्ठ कहानियों के ‘चिरंतन कौथा’ शीर्षक से 26 एपिसोड तैयार किए गए हैं। लोक कला की श्रृंखला के तहत् विभिन्न थीमों पर सात ऑडियो जात्राओं को संरक्षित किया गया है। लोक नाट्य की श्रृंखला पर आधारित 11 एपीसोड, साहित्य पर 75 तथा बंगाल के साहित्यकारों पर 75 और साहित्यकारों की पुस्तकों के चुनिंदा अंशों पर आधारित ‘चिरंतन’ शीर्षक से 5 मिनटों के 534 धारावाहिकों का निर्माण किया गया है। विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों की श्रृंखला में बंगाल के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों पर आधारित ‘लिंटन टू लेजर’ नामक 5 एपिसोड उपलब्ध हैं। नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाने के लिए आंचलिक अभिलेखों को संरक्षित कर रिलीज करने में प्रयासरत है आकाशवाणी। इसके तहत् रवीन्द्र संगीत की दो सी डी जारी की गई हैँ।



वर्तमान में आकाशवाणी के एफ. एम. चैनलों सहित पाँच चैनल प्रतिदिन 91 घंटों का प्रसारण प्रस्तुत करते हैं तथा फोन इन कार्यक्रमों के माध्यम से 31 घंटे का।

देशभर में रेनबो चैनल :  देश में कोलकाता सहित कुल 12 रेनबो चैनेल हैं - दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बंगलोर, कोयंबटूर, कटक, कोडाइकनाल, लखनऊ, त्रिचुरपल्ली, पंजी, जालंधर।
गोल्ड चैनेल :   दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई।

 

रेडियों का महत्व इस बात में भी है कि कई कलाकारों ने रेडियो पर दिग्गज कलाकारों के गाने को अपना प्रेरणा-स्त्रोत माना। पार्शव गायक सुदेश भोंसले और मुहम्मद अज़ी़ज़  ने कभी अपने साक्षात्कार में इस लेखिका से कहा था कि रेडियो पर रफ़ी और किशोर साहब के गीत सुन-सनुकर ही मैंने गाना सीखा।



आज आकाशवाणी कोलकाता ने अपने सफ़र के 83 वर्ष पूरे कर 84  वें में कदम रखा है। आज भी सुबह मेरा रेनबो पर प्रोग्राम था। मैंने इस अवसर पर कोलकाता से जुड़ी चीजों को शामिल किया। गीतों की शुरूआत कोलकाता के पार्श्व गायक मुहम्मद अज़ीज़ के गीत से की। फिर कोलकातावासी गायिका उषा उत्थुप का गीत रंभा हो... और इसके बाद ऐसे गीत बजाए जिनमें 'कोलकाता' शब्द शामिल था। भूपेन्द्र की आवाज़ में फिल्म 'कहकशां' की ग़ज़ल शामिल की जो कि कोलकातवासी शायर जनाब हलीम साबिर द्वारा रचित है। अंत में कोलकाता के ही शायर मुनव्वर राणा के शेर -

'किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई '

को कोट करते हुए फिल्म 'तारे ज़मीं पर' के गीत मेरी माँ से प्रोग्राम का समापन किया।



- नीलम शर्मा ‘अंशु’  (26-08-2010)

रिश्तों को महसूस करो, कोई नाम न दो।

आज रक्षा बंधन का पावन त्योहार। सभी को शुभकामनाएं।




पिछली बार भ्रातृ-द्वितीया के दिन एफ. एम. पर मेरा प्रोग्राम था, तो हर कॉलर दोस्त ने ऑन एयर टीका लगवाया था। जो भी आता कहता, दीदी मुझे भी टीका लगाईए। कितनी पाक सोच से उन्होंने यह आग्रह किया था। अक्सर लोग बहनें बनाने या भाई बनाने से घबराते हैं। बड़ा अटपटा सा लगता है न, यह कहना कि ‘बनाना’। रिश्ते तो बनाए नहीं जाते, बन जाते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि खून के रिश्ते यानी रक्त संबंध धरे के धरे रह जाते हैं और जिनके साथ हमारा खून का रिश्ता नहीं होता, वे रिश्ते बहुत ही मज़बूत और स्थाई बन जाते हैं। वैसे कुछ लोग यह भी कहते हैं कि रिश्तों को नामकरण के बंधनों में नहीं डालना चाहिए।







आज यह बात इस लिए भी याद आई कि आज मैंने हमारे एक दोस्त को फोन किया। हुआ यूं कि शहर में हमारा एक ग्रुप हुआ करता था, साहित्यिक सरोकारों से जुड़े दोस्तों का। उसमें हम सिर्फ़ दो महिलाएं थीं और शेष पुरुष। सारे पुरुष सदस्य हमसे सीनियर थे। दोस्ती के बावजूद हम एक दूसरे को परस्पर उम्र की सीनिऑरिटी के लिहाज़ से सम्मान दिया करते। मुझे छोड़कर सभी ट्रांसफ्रेबल नौकरियों में थे। ग्रुप में शामिल होने वाले नए सदस्य को एंट्री के तौर पर पार्टी देनी पड़ती थी। हम मासिक सब्सक्रिपशन भी जमा करते थे। जब किसी का ट्रांसफर होता तो उसे फेयरवेल पार्टी और फेयरवेल गिफ्ट दी जाती। बहुत व्यस्तता के चलते ग्रुप की मीटिंगों में कभी कोई अनुपस्थित भी हो जाता। ऐसे ही में एक दोस्त डी. के. जी कई मीटिंगों में न आ सके और जब आए तो मुझसे उनका नया परिचय हुआ। उनसे मेरा परिचय करवाया गया। अचानक चंडीगढ़ वाले दो दोस्तों से मुझे पंजाबी में बात करते देख उन्होंने पूछा, पंजाब में आप कहाँ की है। मेरे नवांशहर कहने पर उन्होंने कहा - मैं आदमपुर से हूँ। मैंने कहा - हाँ, हैं तो दोनों ही दोआबा के। तो पी. के. जी ने जान-बूझकर चुटकी लेते हुए डी. के. जी से कहा – अरे ! तब तुम लोग भाई-बहन हो गए। अब डी. के. जी का रियेक्शन देखने लायक था। यह क्या करते हो यार ? बस तब से हम लोगों ने उन्हें ‘भाई’ ही कहना शुरू कर दिया मज़ाक-मज़ाक में। दूसरी महिला थीं, एस. डी.। उसने भी एक दिन उन्हें भईया कह दिया तो फिर डी. के. जी ने उसी तरह रियेक्ट किया। मैंने कहा कि भई, नौकरीशुदा बहनें बनाने में तो आपको फायदा ही होगा, घाटे में नहीं रहेंगे। डी. के. जी ने कहा, अरे यार! दोस्ती का रिश्ता ही रहने दो। दोस्त ही ठीक हैं। ये भाई-भाई ठीक नहीं लगता। आजकल तो भाईयों का बोलबाला है। ‘भाई’ से तो हर कोई डरता है। आप बहनों के नाम से घबराते हैं। फिर डी. के. जी का ट्रांसफर हो गया। ग्रुप ने उन्हें फेयरवेल पार्टी तथा फेयरवेल गिफ्ट दी। जिसे भी उनका फोन आता तो यही कहता कि कल भाई से बात हुई थी, या भाई को फोन किया था या भाई का फोन आया था। चूंकि मैं लोकल हूँ तो मैंने कहा कि आप लोग ट्रांसफर होकर जाते रहेंगे और एकमात्र मैं सबको फेयरवेल देती रहूंगी। मुझे कभी फेयरवेल नहीं मिलेगा (क्योंकि मेरे अतिरिक्त सभी बैंकर थे और उनके पद ट्रांसफर वाले थे) । यह अलग बात है कि बाद में कुछ ग़लत लोगों के जुड़ जाने से वह ग्रुप टूट ही गया। और हम केवत तीन लोग बचे थे, जो आपस अक्सर मिला करते।



वैसे तो डी. के. जी से बात होती ही रहती है लेकिन पिछले साल भाई दूज के दिन मैंने डी. के. जी को फोन लगा कर कहा -  मैंने सोचा आज भाईयों का दिन है तो भाई को याद कर लिया जाए। आपने तो हमें याद नहीं किया। उन्होंने कहा, तुम फिर शुरु हो गई। कहा न ये भाई, भाई मत किया करो। उन्हें आज तक समझ में नहीं आता कि हम चिढ़ाने के लिए कहते हैं या फिर वे भी जान-बूझकर इस तरह रियेक्ट करते हैं । जब भी मैं फोन करती हूँ तो वे पूछा करते हैं - लखनऊ कब आ रही हो। मैं कहती हूँ आप खुद तो फोन करते नहीं, मैं फोन करूं तो पूछा जाता है कि लखनऊ कब आ रही हो। आप हमारा शहर छोड़कर भाग गए (वे अपनी मर्ज़ी से ट्रांसफर करवा करा गए थे च्वॉयस ट्रांसफर पर, तब से मैं भी चिढ़ाने के लिए कहा करती हूँ कि हम क्यों आएं, आपके शहर। आप तो हमारा शहर छोड़ कर भाग गए)। अरे, तुम्हारी ट्रेन तो इधर से ही जाती है।





आज सुबह से ही ज़ेहन में था कि हो न हो डी. के. जी को फोन ज़रूर करना है। ऑफिस की व्यस्तता में समय ही नहीं मिला। अचानक ऑफिस से घर लौटते समय रास्ते में याद आ गया कि भाई को तो फोन किया ही नहीं। तुरंत पौने सात बजे शाम को फोन किया। पता नहीं चल पाया कि किसने रिसीव किया, उधर से पूछा गया कि कहां से कौन बोल रहे हैं। मैंने कहा - कलकत्ते से नीलम बोल रही हूँ और भाई का पूरा नाम लेकर कहा कि उनसे बात करनी है। तब तक मोबाईल भाई जी के हाथों तक पहुंच गया था। उन्होंने भी पूछा, कौन। मैंने उनका पूरा नाम लेकर पंजाबी में कहा - नीलम बोल रही हूँ। उन्होंने कहा, हो कहाँ? मैंने कहा - अपने शहर में, ऑफिस से घर जा रही हूँ। सोचा आज के दिन भाई से बात कर लूं। आपने तो फोन किया नहीं। उन्होंने कहा, देखो तुम खुले आम सबके सामने एक लड़के को छेड़ रही हो। मैंने कहा- किसने देखा और किसने सुना कि मैं किसी को छेड़ रही हूँ। मैंने फिर वही बात दोहराई कि आपको इतनी बार समझाया कि कमाऊ बहनें घाटे का सौदा नहीं होतीं। उन्होंने फिर वही कहा, कमाऊ-गैर कमाऊ की बात नहीं। दोस्त, दोस्त रहने चाहिएं। फिर उन्होंने बताया कि कल मेरा छोटा बेटा कह रहा था, पापा मैं तो बच गया, कल स्कूल में पाँच-छह लड़कियां सबको राखी बांध रही थी। मैंने तुरंत कहा, पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं। बेटा बिलकुल बाप पर गया है। फिर मैंने भी मज़ाक में कहा - देखिए, भगवान ने मुझे दो भाई दे रखे हैं, मुझे भी और भाई बनाने का क़तई शौक नहीं है। दोस्त ही बनाती हूँ मैं। उन्होंने कहा - यह हुई न बात। उन्होंने आदतन पूछा - लखनऊ कब आ रही ? मैंने भी वही रटा-रटाया जवाब दिया, मैं क्यों आऊं आपके शहर। उन्होंने फिर कहा, तुम्हारी ट्रेन तो इधर से ही जाती है। मैंने कहा - आजकल मैं उड़ कर जाती हूँ। जवाब में उन्होंने कहा, हाईजैक करवा कर लखनऊ उतार लेंगे।


ख़ैर,  सबसे बड़ी बात है कि  संवाद होते रहना चाहिए आपस में।



(कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी अपनी बहनें हैं फिर भी उन्हें और बहनें बनाने में कोई ऐतराज़ नहीं।) सुबह-सुबह श्याम नारायण जी का फोन आया था। कहा अमुक जगह, अमुक बहन के पास राखी बंधवाने आया हूँ, बंधवा कर ऑफिस जाऊंगा। आपकी भाभी तो राखी बांधने मायके गई हुई हैं। शाम को लौटेंगी। वे इन ख़ास दिनों में ज़रूर फोन करते हैं। बता रहे थे कि पोर्ट ब्लेयर से रज़िया का फोन आया था, कह रही थी राखी भेज दी है परंतु आज तक तो मिली नहीं। मैंने उनसे कहा, पोर्ट ब्लेयर का मामला है, कोई बात नहीं भाई दूज वाले दिन बांध लीजिएगा। बात भावनाओं के सम्मान की है।


एक बात और......बंगाल में नाम के साथ दा और दी लगाने का चलन है। क़माल है कि बचपन से मुझे यही पता था कि दादा (भईया) का संक्षिप्त रूप है ‘दा’ और इसी तरह दीदी का संक्षिप्त रूप है ‘दी’। यह तो बहुत बाद में पता चला कि दादा या दीदी का संक्षिप्त रूप न होकर सम्मान पूर्वक अपनों से बड़ों के नाम के साथ दा या दी संबोधन जोड़ा जाता है। दा या दी का अर्थ क़तई वह नहीं जो मैं समझती थी। बचपन में मेरी समझ में नहीं आता था कि दा और दी कहने वालों की आपस में शादी कैसे हो गई। बांग्ला वाले भले ही सम्मान पूर्वक दा या दी संबोधन को नाम के साथ जोड़ते होंगे लेकिन गैर बंगाली होने के नाते मेरे मन में तो यही भावना आती हैं कि हमने दा या दी कहकर उन्हें दादा यानी भईया या दीदी के रूप में सम्मान दिया है।







प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'
कोलकाता दूरदर्शन व आकाशवाणी कोलकाता के स्थापना दिवस !



कल 21 अगस्त को कोलकाता दूरदर्शन  की स्वर्ण जयंती थी।  कोलकाता व बंगाल  में रहने वाले हरेक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।








26 अगस्त को कोलकाता और हम बंगालवासियों के लिए एक और सुखद दिन है। जी हाँ, इस दिन आकाशवाणी, All India Radio का 83वां जन्मदिन है। 83 वर्ष पूर्व यानी इसी दिन 1927 में कोलकाता से प्रसारण शुरू हुआ था। पहले इसका कार्यालय 1,  गर्स्टिन प्लेस (आज का बी.बी.डी बाग/डलहौज़ी अंचल) में था। बाद में  15 सितंबर 1958 को इसे इडेन गार्डन के मौज़ूदा भवन में स्थानांतरित किया गया।



1 जनवरी  1936  को Indian State Broadcasting Service के दिल्ली केन्द्र की स्थापना की गई। 8 जून 1936  को इसे All India Radio नाम दिया गया। 1938 में इसे ‘आकाशवाणी’ नाम दिया गया। कभी सोचा है आपने कि इसका नामकरण 'आकाशवाणी' कैसै पड़ा ?

कवि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर रचित कविता पर इसका नाम 'आकाशवाणी' रखा गया। कविता के बोल कुछ यूं हैं : -
 




धौरार आंगिना होईते एई शोनो
उठिलो आकाशवाणी।
औमोर लोकेर मोहिमा दिलो जे
मौर्तोलोकेरे आनि।
सौरोसोतीर आसोन पातिलो
नील गौगोनेर माझे
आलोक बीनार सौभा मौंडोले
मानुषेर बीना बाजे

शुरेर प्रोबाहो धाय शुरोलोके
दूर के से नैय चिनि
कोबी कौल्पोना बोहिया चोलिलो
औलोख शौदामिनी
भाषारौथ धाए पूर्बे-पोश्चिमे
सूर्जो रौथेर शाथी
उधाऊ रोईलो मानोब चित्तो
सौर्गेर सीमानाते।

प्रस्तुति : नीलम शर्मा 'अंशु' 


संकेत






मित्रो जब हम एक उगली किसी की ओर उठाते है तो बाकी की चार उगलिया अपनी ओर उठ जाती है!
इस संकेत को जो पहचानता है वह इंसान,
बाकि "हम" सब नादान!

यह मत सोचो कि हमारे लिये क्या नही हुआ, आपितु यह सोचो कि हमने किसी के लिये क्या किया,

जिन माता पिता ने अपना जीवन हमारे लिये कुर्बान कर दिया, उन कि सेवा हम् ने कभी न कि,
जिस भाई ने पिता समान प्यार दिया, ज़िन्दगी के हर कदम पर साथ दिया उसे जरुरत के समय मुश्किल राह पर हम अकेला छोड गए!

क्योकि हमे अपने बच्चो का FUTURE सवारना है
पर हम शायद भूल रहे है जिन्हे हम इन सन्स्कारो से .....................................
बना रहे है
वह भी हमारे लिये हमारे कर्मो का FUTURE PLAN बना रहे है

आज भी आख खुले तो सवेरा, नही तो.............?????????????????

शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन



पंजाबी शायर शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन   23जुलाई) पर विशेष    



पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से रेखाचित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक हसीन चेहरे से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।



शिव बटालवी
0 बलवंत गार्गी



शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।



शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत फैली हुई थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।



उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है------- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है......इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’



शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’



मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’
वह मान गया।



शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे नहीं तो दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।



पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’



टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।



शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’



यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव.... बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।



यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।



स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो। मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखे देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’



मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’



नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।



हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’ शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –




‘तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’






हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।



एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’



एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।



सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा - ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने......
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला - ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।

शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।



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मैंने गुरु नानक देव पर लाईट ऐंड साउंड ड्रामा लिखा। इस नाटक के प्रदर्शन की रुप-रेखा तैयार की। इसके गीत शिव ने लिखे। वह एक महीना मेरे घर रहा। हम दोनों जन्म साखियों को पढ़ते तथा नाटक की बाणी के एक-एक शब्द का रसपान करते। शिव सुबह चार बजे उठ बैठता। रोज़ दो-तीन गीत लिखकर मुझ जगाता – ‘ले सुन।’

नानक के जन्म पर लिखा गीत उसने गाकर सुनाया –



‘हरिया नी मांए, हरिया नी भैणे।
हरिया ते भागी भरिया।
मेरे हरे दे चंद सूरज हाण......।’


इस जन्म पर तारे मिठाईयां बाँट रहे हैं । धरती उसक दाई......।



वह गा रहा था और मेरी आँखों में आँसू थे। उसने नानक के घर से चले जाने का गीत लिखा। किस प्रकार माता तृप्ता तथा सुलखणी नानक के बिछोड़े का संताप झेलती हैं। शिव ने ऊँची आवाज़ में सहराई के स्वरों में गाया -



‘इक दे सिर दा साँई चल्लिया
इक दी अक्ख दा नूर।
इक दे थण विच विरहा रोवे
इक दी माँग संधूर।’


उसने कहा, तुम सो रहे थे। मैंने सोचा एक नज़्म और लिख लूं। एक ग्रामीण लड़की कहती है –



‘कोठे चढ़ के कत्त लग्गी
आ पूणी नूं आग्ग पई
पट्टां दे विच्च पींघां पईयां
हुस्न जवानी रज्ज गई
सावे टोभे दे शीशे दी
चिप्पर-चिप्पर भज्ज गई।’



शिव ने यह नज़्म मुझे दिखाई। इसमें दो-चार पंक्तियां काटी हुई थी। ये पंक्तियां भी उसने काट दी थी –



‘खेतां विच्चों सूरज-रंगी
टौरे वाली पग गई।’



वह कई बार खूबसूरत पंक्तियां तथा अलंकार काट देता। ऐसी पंक्तियां जो कोई दूसरा शायर नहीं लिख सकता, शिव आसानी से लिख डालता। उसके शब्दों की सजावट में चमत्कार था, नाटकीयता थी। दो अलग शब्दों को तथा चित्रों को अजीब तरह से जोड़ता था। उसने बिंबों तथा प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया कि वे उसके नाम साथ ही जुड़ गए। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ‘भट्ठी वालीए’ या ‘कंडियाली थोर’ या ‘सप्पणी’ या ‘चंदरे रुख’ या ‘पुठड़े तवे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करे।



यदि वह प्यार का गीत लिखता या खुशी का तो उसी वक्त कब्रों या मृत्यु के विषय में भी गीत लिखता था। नानक पर रहस्यवादी कविता के बाद उसी वक्त उसने ‘उधाले’ पर नज़्म लिखी। वह ‘अलख़ बछड़ी’ की बात करता है जो सौ खूंटे उखाड़ कर भागी जाती है। एक में कहानी, नशा तथा वैराग्य है, दूसरी में जिस्म का शूकता वेग तथा वर्जित प्यार। शिव बहुपक्षीय तथा बहुमुखी कवि था।


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लंदन में उसे बी.बी.सी वालों ने कहा, ‘तुम ग़म के शायर हो, इसे बारे में कुछ बताओ।’
शिव ने कहा, ‘काहे का ग़म ? मुझे कोई ग़म नहीं। मुझे कोई ग़म नहीं, मज़े से शराब पीता हूँ। महबूबाओं ने प्यार दिया। बेशुमार लड़कियों ने इश्क किया। काफ़ी रुपया है। यार, दोस्त हैं। नेक बीवी है। काहे का ग़म। मुझे कोई ग़म नहीं। मैं ग़म की कविता लिखता हूँ हँसकर। मुझे अपना कोई ग़म नहीं। दुनिया का ग़म अवश्य मेरे भीतर है। जो शायर निज़ी ग़म का रोना रोते हैं, उनकी कविता फीकी होती है।’



जब मैं लंदन गया तो लोग महफ़िलों में उसकी बातें करते थे। गलासगो गया तो उसकी बात। टोरांटो गया तो उसके बात तथा न्यूयॉर्क की पंजाबी महफ़िलों में भी उसी की चर्चा।
वह मृत्यु के बाद एक मिथक बन गया है – मंटो की भाँति, सहगल की भाँति। यदि किसी ने शिव के साथ खाना खाया, या बस में सफ़र किया या शराब पी या उसकी तिल्ले वाली चप्पल ठीक की या रेशमी कुर्ता सिला तो वह गर्व से शिव की बात करता है। ऐसी शोहरत तथा प्यार किसी विरले को ही नसीब होता है।



शिव ने अपनी मृत्यु अठाईस साल की उम्र ही निर्धारित कर ली थी। कोई शक्ति उसे मरने से नहीं रोक सकती थी। जब किसी का नाम ही शिव बटालवी हो तो उसकी मौत जवानी में ही लिखी होती थी। उसने अपनी कलम से अपना मरसिया खुद लिखा।



वह भरी जवानी में मरने का इच्छुक था। एक बार शराब पीकर नशीली आँखों से देखते हुए वह मुझसे कहने लगा – ‘मैं बूढ़ा होकर नहीं मरना चाहता। बुड्ढे की मौत बड़ी ज़लील चीज़ है। जापान के समूराई सूरमे अपने जिस्म को सुडौल तथा खूबसूरत बनाते हैं। जब जिस्म की खूबसूरती चरम पर होती है तब वे अपने पेट में तलवार घोंप कर हाराकेरी की रस्म अदा करते हैं और मौत की गोद में समा जाते हैं। चैरी का फूल पूरी तरह खिलता है और बड़ी शान से गिरता है। मरना कोई चैरी के फूल से सीखे।’



शिव ने अपनी मौत की फूलों से तुलना की है। उसने जवानी में मरने की खूबसूरती का वर्णन किया और इसकी रस्म भी पूरी की। चंडीगढ़ में हम अक्सर मिलते। वह सर्दियों में मलागीरी कोट तथा मफ़लर पहन कभी-कभी स्टेट बैंक आता। वहाँ से उठकर मेरे साथ। मेरे बहुत मजबूर करने पर भी वह कॉफी न पीता। उसके खून में शराब इस क़दर घर कर गई थी कि चाय या कॉफी उसे अच्छी नहीं लगती थी। सिर्फ़ शराब ही उसके शरीर को शीतलता दे सकती थी। कई बार वह बिना सोडे या पानी के शराब की शीशी में से सीधे तीन-चार घूंट भर लेता जिससे उसका मन शांत तथा एकाग्र हो जाता। उसमें रचना-शक्ति दौड़ने लगती। वह पहले से भी ज़्य़ादा नम्र हो जाता। उसमें बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी।



नए शायर, नौजबान इन्कलाबी शायर, प्रयोगवादी शायर उसके विरुद्ध बोलते। उसे सामाजिक चेतना से वंचित कहते। भला ऐसी कविता का क्या मतलब, जब कि मुल्क में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, भूख है, और शिव चाँद, सूरज और कच्ची कंध मले दंदासा की बातें करता है। वह समाज से कट गया है।



ऐसे कवि पत्रिकाओं में उसके विरुद्ध लिखते रहे तथा मंचों पर बोलते रहे परंतु कोई भी मुशायरा शिव के बगैर मुकम्मल नहीं होता था। कवि सम्मेलनों में लोग पहली बात यही पूछते कि इस मुशायरे में शिव आ रहा है या नहीं।



शिव अपनी बढ़िया कला तथा सृजन शक्ति के बारे सजग था। लोग उसे निराशावादी कवि कहकर बदनाम करते रहे। कुछ उसे वासना का कवि कहते। कई लोग उसके कविता में से तकनीक गलतियां निकालते रहे। कई उसकी नकल करके उससे बेहतर कवि होने का दावा करते रहे पर शिव शोल की भाँति जलता रहा और रौशनी बिखेरता रहा।



उसने कहा, ‘सारी प्रकृति एक दूसरे की निंदा तथा प्रशंसा है। हमारा जन्म ही निंदा तथा प्रशंसा के संभोग से होता है। मेरा सबसे बड़ा निंदक या प्रशंसक मैं खुद हूँ। अपनी पीड़ा की निंदा मैंने अपने गीतों से की और मेरे गीतों की निंदा लोगों ने की। इसकी वजह मेरी शोहरत के प्रति ईर्ष्या के सिवा कुछ नहीं। ईर्ष्या हमेशा घटिया को बढ़िया से होती है।’



उसके जीवित रहते मैंने उस पर कई लेख लिखे, उसकी कई कविताओं का उसे साथ बिठाकर अंग्रेजी में अनुवाद किया परंतु उसकी मृत्यु के बाद पंजाबी में कोई लेख नहीं लिखा। प्रशंसात्मक लेख लिखने का काम मैंने उसके निंदकों के लिए छोड़ दिया था, जो बढ़-चढ़कर रोने तथा मातमी गीत गाने के लिए तत्पर थे।



शिव की मृ्त्यु एक निज़ी ग़म भी था और समूचा ग़म भी। ऐसी पीड़ा कई बार इन्सान के अंदर ही रह जाती है।अब शिव को गुज़रे बारह साल हो गए हैं। उस की कविता, उसकी याद, उसकी उदास हँसी, टिप्पणियां तथा झिंझोड़ डालने वाले गीत उसी तरह ताज़ा हैं। वह लंदन में पाँच-छह महीने रहकर वापस आया तो मैं उससे मिलने गया। 21 सेक्टर में उसने मकान बदल लिया था।



वहाँ पहुँचा ते देखा कि शिव के ड्रॉइंग रूम में गोल-मटोल रबड़ की फूली हुई कुर्सियां थी। कुछ विदेशी चीज़ें। उसका प्रशंसक तथा शिष्य दीपक मनमोहन भी वहीं बैठा था। एक लंबी लड़की किचन में रोटी बना रही थी, उसकी प्रशंसक। अरुण भी खुशी से काम कर रही थी। घर में खुशहाली थी।



शिव बातें करने लगा तो मैंने देखा कि वह उन छह महीनों में बदल गया था। उसके कपोल भर गए थे तथा उसके चेहरे पर धुएं जैसी एक छाया सी थी। मैं सोचता रहा कि क्या वह ज़्यादा सेहतमंद हो गया था या बीमार।



उसने कहा, ‘ये देख रबड़ की कुर्सियां। लंदन से लाया हूँ ये। इनमें हवा भरो और चाहे एक मन की औरत बैठ जाए, चाहे बारह मन की धोबिन....बड़ी देर हो गई बाईस्कोप देखे.... दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताज देखो, बारह मन की धोबिन देखो.....ये लोग कहाँ चले गए ?’

मैंने कहा, ‘लंदन की कोई बात सुना। क्या हाल है वहाँ के लोगों का ?’
‘सब पौंडों (पाउंड) के भूखे हैं । हर कोई शायर तथा लेखक। उन्होंने बर्तानिया को फ़तेह कर लिया है। वे पंजाब से आए लेखक की सेवा भी करते हैं और उससे नफ़रत भी। मुझे वहाँ पाकिस्तान की शायरा ... सर मुहम्मद इकबाल की पोती....बहुत खूबसूरत लड़की मुझ पर फिदा हो गई.....उसकी चिट्ठियां....और तीन चार और लड़कियों का....मैंने अचार डालना है इन लड़कियों का......शराब पिलाते मुझे तथा मेरे गीत सुनते...मैंने कह दिया था कि मैं पाँच सौ पाउंड लूंगा। एक शाम का.....और उन्होंन पैसे दिए.....घुटने टेककर। मैं तो शायर हूँ.....शिव......उनका बाप.... पर वह लड़की सायरा बानो....या नसीम बानो मुझ पर फिदा हो गई......पर मुझे क्या परवाह....मुझे घर याद आ रहा था...अरुण....बच्चे.....व्हिस्की .....मेरा बेटा......।’



इन टूटे-फूटे शब्दों नें शिव की सारी मानसिक स्थिति बयां कर दी। टुकड़े हुआ दिल...काँपते शब्द तथा बेढंगे वाक्य....इनमें अंदरूनी तर्क था। वह इस तरह बोल रहा था जैसे मुझे नहीं किसी और से कह रहा हो।



कई दिनों बाद पता चला कि शिव बीमार है। मैं उसे मिला तो उसकी बातें और भी उखड़ी हुई तथा बेतुकी थीं। मुझे अब तक याद है उसका धूंसर चेहरा तथा बुझी आँखें।



वह ज़िदगी से निराश हो गया था। निराशा के गहरे कुँए में डूब कर उसने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो समूची परंपरा के विरुद्ध थीं। इनमें एक अजीब दिव्य-दृष्टि थी जो कई बार उस इन्सान में आ जाती है जो मृत्यु को देख रहा हो। जिसे किसी का डर न हो। जो अंधेरी कोठरी में छत फाड़ने वाली चीख़ मार सके ताकि सोए पड़े लोग जाग सकें। इसी मानसिक अवस्था में उसने कविताएं रचीं – कुत्ते, फाँसी, लुच्ची धरती। वह धरती को माता कहते-कहते थक गया था। इसके अलावा वह देख रहा था कि पाखंडी तथा हर प्रकार का साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्ति धरती को माँ कह कर लूट रहा था। शिव ने धरती को ‘लुच्ची’ कह कर अपने इर्द-गिर्द को चौंकाया। परंपरागत नमस्कार को त्याग कर धरती गो क्रोध से लुच्ची कहा – जैसे कोई जवान बेटा अपनी माँ को गाली दे।



लोगों ने शिव को गालियां दी। शिव और क्रोधित हो गया तथा कहने लगा, ‘बेवकूफों ! कुत्तो मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात सुनो।’
कई लोगों ने उसे ललकारा तथा कहा कि उसकी विचार-धारा उलटी है। शिव ने कहा – ‘हाँ, मैं उलटा हूँ – शीशे की भाँति आपका अक्स हूँ, जो आपको उलटा लगता है।’
धीरे-धीरे शिव अपने भीतर ही भीतर धंसता गया। लोगों ने जो कहा, उसी तरह का बन कर दिखाने की ज़िद में और भी बातें करने लगा, जिनमें हक़ीक़त की चिंगारियां थीं। कईयों ने कहा - शिव बतौर शायर मर गया है। वह बिलकुल मर गया है। शिव मरने के लिए तैयार हो गया।
मुझे पता चला कि शिव अस्पताल में है और मुझे याद कर रहा है। मैं अस्पताल गया तो वह प्राईवेट कमरे में चारपाई पर पड़ा था। दवा की शीशियां, अस्पताल की अजीब सी बू तथा घुटन। उसके पैरों की तरफ वही लंबी सुंदर युवती बैठी थी जो उसके घर रोटी बना रही थी।
एक रात वह अस्पताल से निकल कर चला गया। मैं अस्पताल में नहीं मरना चाहता। उसे फिर से अस्पताल में दाखिल किया गया। उसकी हालत बिगड़ती गई।



बिस्तर पर पड़ा वह कई बार ज़ोर-जो़र से रोता और आवाज़े लगाता – ‘मैं मर रहा हूँ। कहाँ है मेरे यार दोस्त ? कुत्तो मैं जा रहा हूँ। ढूंढोंगे शिव को !’



उसके अधिकतर दोस्त व्यस्त थे। किसी के पास वक्त नहीं था। साहित्य समारोह हो रहे थे। भाषण चल रहे थे। कॉफी हाउस में लेखकों, अध्यापकों तथा अख़बार वालों का जमघट लगा रहता था। उनके पास वक्त नहीं था कि शिव से मिलने जाएं।



मुझे एक शाम संदेसा मिला कि शिव मुझे याद कर रहा है। उसने मुझे फौरन मिलने के लिए कहा क्योंकि वह चंडीगढ़ छोड़ कर अगली सुबह बटाला जा रहा था। चंडीगढ़ उसे रास नहीं आया था। वह सेक्टर 21 के मार्केट के पिछवाड़े एक दोस्त के घर ठहरा हुआ था, जिस का पता मैंने नोट कर लिया था।



रात हो चुकी थी। सोचा सुबह उसे मिलने जाऊंग। मुझे डर लगा कि वह कहीं मुझे बिना मिलो न चला जाए। एक अजीब ख़ौफ़ तथा बेचैनी मेरे भीतर थी कि यदि वह बटाला चला गया तो पता नहीं कब मुलाकात हो।



मैं सुबह साढ़े पाँच बजे उठा, कार स्टार्ट की और सेक्टर 21 के उस पते पर गया। लोग सोए हुए थे। तीन मंजिले मकान शांत थे। मुझे वह मकान ढूंढने में कुछ समय लग गया। घबराहट बढ़ती गई।



अंत में जब मकान मिला तो पता चला कि शिव आधा घंटा पहले वहाँ से चला गया था।
मैंने पूछा – ‘कहाँ ?’
‘बटाला।’
मैंने फौरन कार घुमाई और बस अड्डे पर गया। बटाला जाने वाली बस का पता किया। आधा घंटा बस अड्डे पर घूमता रहा। शिव जा चुका था।



फिर पता लगा कि शिव अपनी बीवी तथा बच्चों सहित टैक्सी में बटाला गया था। उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसने टैक्सी को सेक्टर 22 के बत्तियों वाल चौंक पर रोका, जहाँ शाम को दोस्तों के साथ लोहे के जंगले के पास खड़ा होता था। उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला। नफ़रत से थूका और कहा – ‘कभी नहीं आऊँगा मैं इस कुत्ते शहर में।’



चंडीगढ़ पत्थरों का शहर था, बटाला लोहे का। दोनों शहरों ने उसे प्यार दिया, शिव ने इन शहरों को गीत दिए। दोनों शहरों को उसने प्यार भी किया और नफ़रत भी।
बटाला वह कुछ ही दिन रहा। फिर अरुण के साथ अपने ससुराल के गाँव चला गया जो पठानकोट से पंद्रह मील दूर पहाड़ के क़दमों में है।



यहाँ हरियाल थी, छोटे घर थे, खेत थे। शिव इस घर के चौबारे में रहे जहां अत्यं गर्मी थी।
रात को उसे नींद न आती। कई बार वह आवाज़े देता और रोता। ‘मैं अकेला हूँ लोगों। मैं अकेला रह गया। कहाँ हैं मेरे यार ? ’



दूर खेतों में गीदड़ रोते और भांय-भांय करती रात में शिव की आवाज़ें खो जातीं। 6 मई, 1973 की रात को शिव की आत्मा सदा के लिए सो गई।


पंजाब से अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु’