शहर के मेन बस स्टैंड के पास बड़े दिनों से महिला शौचालय बनकर तैयार था पर कमेटी के प्रधान बड़ी दौड़ धूप के बाद भी उस शौचालय के लोकार्पण के लिए मंत्री जी से वक्त नहीं ले पा रहे थे और महिला यात्री थे कि पुरुष शौचालय में जाने के लिए विवश थे। पर वहां जब देखो कुत्ते लेटे हुए। अब कमेटी के कर्मचारियों का शौचालय की रखवाली करना मुश्किल हो रहा था। वे किस किसको कहते फिरें कि अभी इस शौचालय का मंत्री जी ने लोकार्पण नहीं किया है। लोगों को तो चलो जैसे कैसे मना लिया जाए पर औरों को कौन समझाए?सभी के आगे हाथ जोड़ते- जोड़ते बेचारों के अति हो गई थी।और आज कमेटी के प्रधान को बधाई देने की शुभ घड़ी आ पहुंची। बारह बजे महिला शौचालय को मंत्री जी ने जनता को समर्पित करना था। सुबह नौ बजे से शहर के सभी विभागों के मुखिया नाक पर रूमाल रखे सांसें रोके वहां खड़े हुए। मैंने उन्हें कहा ,‘ साहब !नाक पर रूमाल तो वाजिब है पर शौचालय के पास अभी से नाक पकड़ कर खड़े होने की जरूरत नहीं। अभी तो इसका लोकार्पण भी नहीं हुआ है,' पर वे अपनी नाक पर रूमाल रखे रहे। पता नहीं क्यों? मेरी समझ में आज तक नहीं आया।शौचालय को शादी के मंडप की तरह सजाया गया था गोया वहां किसी के फेरे लगने हों। पास ही लोक संपर्क विभाग वालों ने देश भक्ति के गीत पुरजोर चलाए हुए थे। उन्हें पता था कि मंत्री जी के दादा जी स्वतंत्रता सेनानी थी। छद्म थे ये केवल विपक्ष वाले कहते हैं। वैसे भी असली लोग फल की इच्छा रखते ही कहां हैं?आखिर एक बजे मंत्री जी का काफिला बस स्टेंड पहुंचा तो अफसरों की जान में जान आई। एक अफसर जो कोने जैसे में खडा. था अपने मोबाइल में टाइम देख मुंह में ही बड़बड़ाया,‘ साले ने भूखा मार कर रख दिया। अपने आप तो पता नहीं कहां -कहां काजू- बादाम मार कर आ रहा होगा।' कमेटी की सुंदर जवान महिला कर्मचारियों को खास तौर पर इओ ने सज धज कर आने को कहा था। उन्हें असल में मुस्कुराते हुए मंत्री जी को रिसीव करना था। मंत्री जी ने अपने स्वागत के लिए चार- चार सुंदर महिलाएं मुस्कुराते हुए अपनी राह में पलकें बिछाएं देखीं तो उनके चेहरे पर से एक झुर्री और गायब हुई।कुछ देर तक जुटाई गई भीड़ की ओर से खुश हो मंत्री जी कमेटी के प्रधान की पीठ थपथपाते रहे तो वह फूल कर कुप्पा हुए। उन्हें तय लगा कि अब वे किसी बोर्ड के चेयरमेन कभी भी हुए। देखते ही देखते उनका गला फूल मालाओं से पूरी तरह घुट गया। यह देख साथ चले पीए ने पूछा भी,‘सर! आपका गला फूलों से घुट रहा हो तो निकाल दूं?' पर वे उसकी बात को अनसुनी कर गए। आखिर उन्होंने महिला शौचालय के द्वार पर मुस्कराती लाल साड़ी में खड़ी, थाली में फूल, कैंची, तिलक लिए सुंदर नवयौवना को मंद मंद मुस्कराहट से देखा तो उसे लगा कि अब वह भी पक्की हो गई। महिला ने ज्यों ही मंत्री जी के माथे पर सिंदूर का टीका लगाया, उन्होंने अपने मन के वहम को बनाए रखने के लिए गठिया हुए हाथ से एक झटके से थाली से कैंची उठाई और खच से शौचालय के द्वार पर बंधा रिबन काट दिया। रिबन कटते ही पूरा बस स्टेंड अफसरों, पार्टी वर्करों की तालियों से गरज उठा। रिबन कटने के बाद ज्यों ही मंत्री जी शौचालय में जाने लगे तो पीए ने उन्हें रोक उनके कान में कहते उनसे पूछा,‘ सर! कहां जा रहे हैं आप?'‘लोकार्पण नहीं करना है क्या!?'‘ ये महिला शौचालय का लोकार्पण है सर! पुरुष शौचालय का नहीं।'‘ तो क्या हो गया! जाएंगे तो यहां मर्द ही। दूसरे हम मंत्री हैं, कहीं भी जा सकते हैं। मैं केवल पुरूषों का ही मंत्री थोड़े हूं। बल्कि महिलाओं का मंत्री अधिक हूं। पीछे हटो,' वे पीए को धक्का दे अंदर जाने को हुए तो पीए ने उनके कान में फुसफुसाया,' अखबार वाले आ गए हैं। एक ने तो कैमरा भी आपकी ओर ही कर रखा है', तो वे संभले और जिस पैर अंदर को चले थे उसके साथ सौ पैर और बाहर को मुड़े तो पार्टी वर्करों की जान में जान आई।महिला सशक्तीकरण हेतु महिला शौचालय के लोकार्पण के बाद मंत्री जी सीधे रेस्ट हाउस गए। वहां पर वे केवल खासमखासों से ही मिले। कमेटी के प्रधान को कार्यक्रम की सफलता की बधाई देते उन्होंने पूछा,‘ वे स्वागत के लिए अप्सराएं किस लोक से लाए थे?'‘ अपनी कमेटी की हैं साहब!' कह प्रधान मुस्कुराया।‘गड! वैरी गुड!! मेन टेन करके रखा है कमेटी को?'‘बस जनाब की दुआ है।'‘मन लग रहा है यहां?'‘मतलब, मैं समझा नहीं जनाब का???'‘राजधानी में एक बोर्ड के चेयरमेन का पद खाली है। कहो तो??'‘आपकी दुआ चाहिए बस!' कह कमेटी प्रधान उनके चरणों में गिरा तो उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई,‘ तो अब राजधानी जाने की तैयारी करो ।'काफी देर तक वे रेस्ट हाउस पसरे रहे। पार्टी वर्कर उनसे मिलना चाहते थे पर उन्होंने यह कह कर टाल दिया कि वे कई दिनों के थके हैं। अगली बार वे उनसे ही मिलने आएंगे। अभी वे वीआईपी बेड पर पड़े उनका स्वागत करने वाली महिलाओं के रूप सौंदर्य के बारे में सोच-सोच मस्त हुए जा रहे थे कि दरवाजे पर ठक- ठक हुई तो वे भीतर से ही बोले,‘ कौन??'‘ मंत्री जी!मैं पार्टी का जिला अध्यक्ष। आपसे अजेंर्ट काम है।'‘तो कल फोन पर बता देना,' उन्होंने अनमने से कहा।‘एक लोकार्पण और है साहब! आप अपने सोने वाले समय में से तनिक हमें दे देते तो हमारा उद्धार हो जाता।' उसने कहा तो उनकी बांछें खिल गईं। वे आनन- फानन में बेड पर से उठे और दरवाजा खोल बोले,‘ आओ, भीतरी आओ! कहो, कहां का लोकार्पण है?'‘ मनरेगा के तहत बने नए श्मशान घाट का!!' दरवाजा खुलने की देर थी कि जिला प्रधान के साथ चार पांच और जबरदस्ती भीतर घुस गए।‘यार! ये क्या मजाक कर रहे हो?श्मशान घाट का लोकार्पण करने को मंत्री ही रह गया क्या! अपने उस कब्र में टांगें लटकाए एमएलए से करवा लेते।'‘मंत्री जी, वह अपोजीशन का है।' सभी ने एक सुर में कहा तो मंत्री जी का गुस्सा कम हुआ,‘ पर श्मशान घाट!'‘ जनाब! उस श्मशान घाट पर दस गांवों के मुर्दे जलने आते हैं।'‘तो एक गांव में कितने वोटर हैं?'‘दस गांवों के कुल पांच सौ तो हैं ही। और वे सरकार से इन दिनों नाराज भी चल रहे हैं।'‘क्यों??'‘कह रहे हैं सरकार ने उनके इलाके से रूख ही मोड़ लिया है। अगर वे ऐसे ही नाराज रहे तो जनाब अगले चुनाव में हम कहीं के न रहेंगे,‘ जिला प्रधान ने कहा तो उनके चेहरे पर चिंता की रेखा खिंच आई। काफी देर तक सोचते रहने के बाद बोले,‘ तो??'‘तो आप जाने साहब! हमारी डूबती नैया की पतवार आपके हाथों में हैं। हमें जनता के बीच मुंह दिखाने लायक बना दीजिए बस! आप जो एकबार श्मशान घाट का लोकार्पण कर दें तो आगे तो हम खुद संभाल लेंगे। पांच सौ वोट अपने पक्के।' सबने एक साथ कहा तो वे एकबार फिर जवान हुए,‘पर वहां भीड़ कहां से आएगी? तुम्हें तो पता है कि मैं रोटी के सहारे नहीं समारोह में जुटी भीड़ के सहारे जीता हूं।'‘ आप वह चिंता न कीजिए। यह काम हमारे जिम्मे रहा। हजारों तो वहां पहले ही बैठे हैं। उन्हें भी तालियां बजाने के लिए मजबूर न कर दिया तो हम भी कर्मठ पार्टी वर्कर नहीं! आपको वहां हम हरगिज भी निराश नहीं होने देंगे।'‘ तो एक काम करते हैं!'‘कहो मंत्री जी?'‘श्मशान घाट के लोकार्पण को ऐतिहासिक बनाने के लिए सीएमओ को फोन करो। और हां !वहां जाने को कतना समय लगेगा?'‘एक घंटा सर।'‘तो सारे विभागों को कह दो कि मंत्री जी चार घंटे बाद अमुक श्मशान घाट का लोकार्पण करने जा रहे हैं। वहां सब पहुंच जांए।'‘सीएमओ से क्या कहना है मंत्री जी??'‘उससे कहो कि मंत्री जी श्मशान घाट का लोकार्पण करने जा रहे हैं। एक मुर्दे का इंतजाम करो। पर एक बात ध्यान रखी जाए कि मुर्दा विपक्ष का हो। अपने पक्ष का हम मुर्दा भी खोना नहीं चाहते। मेरे पीए को बुलाना।'भीतर से आकर पीए ने सीएमओ को फोन लगाया,‘ कौन? सीएमओ ?'‘जी!'‘मैं मंत्री जी का बोल रहा हूं।'‘कहिए, क्या सेवा है मेरे लायक?' वह फोन सुनते -सुनते कुर्सी से खड़े हो गए।‘मंत्री जी एक मुर्दा चाहते हैं। इसी वक्त! वह भी अपोजीशन का!'‘पर इस वक्त तो․․․․․'‘मैं कुछ नहीं जानता! मंत्री जी ने चाहा है तो बस चाहा है․․․․' और फोन कट गया।देखते ही देखते सारे विभागों की गाडियां अपने- अपने अफसरों को लादे श्मशान घाट की ओर हवा पर बैठ दौड़ीं।․․․․․․․सीएमओ साहब की गाड़ी मुर्दा लिए सबसे आगे। बेचारे! पसीना पोंछते भगवान का धन्यवाद करते थक नहीं रहे थे। भगवान ने उनकी सुन ली जो ऐन मौके पर गलत इंजेक्शन लगने से बंदा मंत्री जी को प्यारा हो गया। वरना पद की गरिमा को सदा सदा के लिए बट्टा लग जाता।--
हिंदी ! तेरा झाड़ा अमृत
Posted by :अशोक गौतम
ON
Thursday, October 28, 2010
No comments
No comments
शांति कीतलाश में दिन रैन कस्तूरा हो भटक रहे मेरे शहर में एकाएक किसी ऐरे गैरे नत्थूखैरे बाबा के आने पर जो हाल बेहाल हो जाता है वही हाल बेहाल हिंदी पखवाड़े के आनेपर मेरे देश का हो जाता है। जो आदरणीय बंधु सारा साल अंग्रेजी थूक- थूक कर पूरेदेश का थोबड़ा थुकियाए रहते हैं इन दिनों वे बगल में हिंदी के बजट रुपी बकरे कीखाल लिए, जुबान पर चाशनीकी तरह किसी के अच्छे से निबंध के दो चार पहरे चिपकाए, करमंड़ में सौदो सौ भारी भरकम ठेठ हिंदी के शब्द लिए, हाथ में हिंदी के पॉलिशड्शब्दों की मालाफेरते- फेरते,हर विभागमें हिंदी की धुनी जमाए स्वयं को देश का सबसे बड़ा हिंदी प्रेमी कहते जीभ सुखाएनहीं थकते। वाह रे बायस समय के फेर! विभाग हैं कि इस पखवाड़े हिंदी के साथ की सारेसाल की गुस्ताखियों से उऋण होने के लिए के हिंदी के कल्याणार्थ सड़कों पर कबाड़ीके कपड़ों के ढेरों की तरह बजट के ढेर लिए बैठे होते हैं। पर बेचारों को उठानेवाला ही नहीं मिलता। अब वे भी सच्चे हैं। पंद्रह दिन में साल भर पिचके पेट रहनेवाला कितना की खा लेगा? इन दिनों जिस विभाग ने साहित्यिक गऊओं को जितना ग्रास दियाउसे हिंदी ने उतना अधिक फल दिया।
सच कहूंतो हिंदी पखवाड़े में इतना आकर्षण होता है कि․․․․कि इतना तो अपने जमाने में मेनका और उर्वशी में भी नहीं रहाहोगा। अगर आज भी मेनका , उर्वशी होतीं तो इस पखवाड़े में सारा साल इनकी चौखट पर पड़ेरहने वाले बुद्धिजीवी इन दिनों हिंदी की चौखट पर ही ड़ार लेते,पेट पर हाथफेरते ही दिखते,मेरी तरह।
सारी उम्रअपने पुरखों और हिंदी को दाने दाने से मोहताज रखने वाले उनका श्राद्ध जिस लगन सेकरते हैं तो लगता है देश में धर्म अभी भी शेष है। पूरी तन्मयता से , सारी लोक लाजछोड़ पांव में हिंदी के घुंघरू बांध हे हर मंच पर नाचने वालो हिंदी प्रेमियों!! आपकोशत् शत् नमन्! आपका हिंदी प्रेम हर पे्रम से बड़ा है। याद रखना! आपके कंधों परही हिंदी का सारा भार है। पंद्रह दिन तक तो आप हर मंच पर ऐसे नाचो कि घुघंरू टूटजाएं तो टूट जाएं। लोक लाज छूट जाए तो छूट जाए। पर हर हाल में बजट खत्म होना चाहिए।अगर ये न हुआ तो हिंदी को बहुत बुरा लगेगा कि कैसे हिंदी प्रेमी हैं? उसके लिए रखाबजट तो खा नहीं सके और फिर दावा ये कि हमसे बड़ा कोई हिंदी प्रेमी नहीं! आप ये सबकर अपना पेट नहीं हिंदी का पेट भर रहे हो। इन दिनों आप जितना खाओगे वह आपको नहींदुर्बल हिंदी को ही लगेगा। आप तो हिंदी का पेट भरने के लिए माध्यम हो बस! इसलिएमन में कोई संकोच नहीं, कोई हीन सोच नहीं। वैसे मुझे पता है अधिकतर हिंदी प्रेमीसोच और संकोच से ऊपर उठे हुए होते हैं।
कल यों हीअपने गांव की साल भर सूखे रहने वाले तालाब के पास से गुजर रहा था। पर भैंसे हैं किसूखे तालाब की मिट्टी में लोट पोट हो ही अपने में स्वदेशी होने का बहम पाले रहतीहैं। उसमें मेंढक टर्रा रहे थे। एक मेंढक ने मुझे वहां से जाते देखा तो सूखे तालाबको फांद मेरे आगे खड़ा हो गया बोला,‘ और हिंदी प्रेमी! क्या हाल है?'
‘ठीक हूं।'
‘बैठो! कोई कविता-शविता हो जाए! बड़े दिनों से तुम्हारी कोई ताजा चोरी हुई कविता नहीं सुनी।' उसने कहा तोमुझे गुस्सा आ गया। हद है यार! हम मर गए चोरी के लिए हाथ पांव मारते- मारते और येमेंढक हैं कि․․․․․ आप ही कहो, चोरी के लिए क्याहाथ पैर नहीं मारने पड़ते? ऊपर से चोरी की कविता के कवि से जो उसके मन में आए सुनतेरहो। कवि जिंदा तो जिंदा, मरे भी अपनी कविता पर फणिधर की तरह कुंड़ी मारे बैठे रहतेहैं। अपनी कविता को हम जैसों का हाथ नहीं लगाने देते तो नहीं लगाने देते । इनकीकविता पर हाथ साफ करना महीनों भूखे शेर के मुंह में हाथ डालने से कम नहीं होता।मैं तो कहता हूं ये सब करना किसी मौलिक कविता को लिखने से सौ गुणा ज्यादा मेहनतका काम है । हम जैसे जब इनकी कविता की ओर बढ़ते ही हैं कि ये नरक से भी भौंकनाशुरू कर देते हैं। खैर, मैंने उसकी बात का कोई बुरा नहीं माना क्योंकि बुरा मानजाता तो हिंदी पखवाड़े की रात्रि पर कविता सुनाने जाने का सारा मजा किरकिरा होजाता।
सच कहूं, आजकल तो मेरेजैसों के मजे ही मजे हैं। हरिद्वार के पंडे की तरह एक मिनट की भी फुर्सत नहीं।सबेरे नौ बजे से हिंदी प्रेमी विभागों में पदिआना शुरू कर देता हूं कि सिलसिला रातको भी चलता रहता है। मैंने उसके द्वारा जले पर खुद ही गुलाब जल ड़लते कहा,‘ अभी तो हिंदी काउद्धार करने के लिए एक आयोजन में जा रहा हूं। पर तुम बिन पानी ही सूखे तालाब मेंटर्र -टर्र क्यों किए जा रहे हो?'
‘तो अपनी कवितायहीं सुना दो न! हम भी हिंदी पखवाड़ा मना रहे हैं।' उसने कहा औरहाइकू के नाम पर दो बाद टर्र- टर्र की।
‘पर सूखे तालाबमें? यार इन दिनों तोहिंदी की फटी किताबें भी तर हो जाती हैं और तुम हो कि․․․ क्या किसी विभाग ने तुम्हें टर्राने के लिएबजट नहीं भेजा?इन दिनोंतो हिंदी में ,टर्राने तोटर्राने, खुर्राने वालेभी साल भर के लिए पैसा इकट्ठा कर टाटा हुए जा रहे हैं,' मैंने कहा तोमेंढक बिन कुछ कहे सूखे तालाब में जा मरा, सिर झुकाए। चलो देश में किसी को तो सच सुननेपर शर्म आई।
चोरी कीकविताओं के असहनीय भार वाले थैले को कांधे पर उठाए मैं वहां से सीधा हिंदी पखवाड़ेके कवि आयोजन में। वहां देखा तो हैरानी हो गई! कवि गोष्ठी में कई साल पहले दिवंगतकवि अधिक तो दूसरे गिनती के ! हद है यार! मरने के बाद भी कवि गोष्ठी नहीं छूटी।आखिर मैंने एक को आयोजकों की नजर बचा किनारे ले जाते पूछ ही लिया,‘ बंधु ये क्या! अबतो चैन करते। अगर मरने के बाद भी हिंदी पखवाड़े की गोष्ठियों में यों ही आतेरहोगे तो हम तो जिंदा जी ही मर लिए। यही पंद्रह दिन ही तो होते हैं हिंदी प्रेमीहोने का अहसास करने के लिए। हमें मारना ही है तो लो हमारे गले में अंगूठा दे दो।दिवंगत हुए पितृ पक्ष में आते ही शोभा देते हैं। वे कवि हों या श्रोता! कब है तुम्हाराश्राद्ध?'
‘ मेरे श्राद्धमें क्या तुम ऐसी सेवा करोगे जैसी यहां हो रही है?इस पखवाड़े के कार्यक्रमों में आ तो हमएक बार फिर जिंदा हो उठते हैं। साल भर इस पखवाड़े का इंतजार रहता है और तुम कहतेहो कि․․․'अब समझा! मेरेदादा ने अपना श्राद्ध पितृ पक्ष के सबसे बाद वाले दिन करने को क्यों कहा? वे भी कभी कभारअपने को हिंदी हिमायती कहा करते थे।
सच कहूंतो हिंदी पखवाड़े में इतना आकर्षण होता है कि․․․․कि इतना तो अपने जमाने में मेनका और उर्वशी में भी नहीं रहाहोगा। अगर आज भी मेनका , उर्वशी होतीं तो इस पखवाड़े में सारा साल इनकी चौखट पर पड़ेरहने वाले बुद्धिजीवी इन दिनों हिंदी की चौखट पर ही ड़ार लेते,पेट पर हाथफेरते ही दिखते,मेरी तरह।
सारी उम्रअपने पुरखों और हिंदी को दाने दाने से मोहताज रखने वाले उनका श्राद्ध जिस लगन सेकरते हैं तो लगता है देश में धर्म अभी भी शेष है। पूरी तन्मयता से , सारी लोक लाजछोड़ पांव में हिंदी के घुंघरू बांध हे हर मंच पर नाचने वालो हिंदी प्रेमियों!! आपकोशत् शत् नमन्! आपका हिंदी प्रेम हर पे्रम से बड़ा है। याद रखना! आपके कंधों परही हिंदी का सारा भार है। पंद्रह दिन तक तो आप हर मंच पर ऐसे नाचो कि घुघंरू टूटजाएं तो टूट जाएं। लोक लाज छूट जाए तो छूट जाए। पर हर हाल में बजट खत्म होना चाहिए।अगर ये न हुआ तो हिंदी को बहुत बुरा लगेगा कि कैसे हिंदी प्रेमी हैं? उसके लिए रखाबजट तो खा नहीं सके और फिर दावा ये कि हमसे बड़ा कोई हिंदी प्रेमी नहीं! आप ये सबकर अपना पेट नहीं हिंदी का पेट भर रहे हो। इन दिनों आप जितना खाओगे वह आपको नहींदुर्बल हिंदी को ही लगेगा। आप तो हिंदी का पेट भरने के लिए माध्यम हो बस! इसलिएमन में कोई संकोच नहीं, कोई हीन सोच नहीं। वैसे मुझे पता है अधिकतर हिंदी प्रेमीसोच और संकोच से ऊपर उठे हुए होते हैं।
कल यों हीअपने गांव की साल भर सूखे रहने वाले तालाब के पास से गुजर रहा था। पर भैंसे हैं किसूखे तालाब की मिट्टी में लोट पोट हो ही अपने में स्वदेशी होने का बहम पाले रहतीहैं। उसमें मेंढक टर्रा रहे थे। एक मेंढक ने मुझे वहां से जाते देखा तो सूखे तालाबको फांद मेरे आगे खड़ा हो गया बोला,‘ और हिंदी प्रेमी! क्या हाल है?'
‘ठीक हूं।'
‘बैठो! कोई कविता-शविता हो जाए! बड़े दिनों से तुम्हारी कोई ताजा चोरी हुई कविता नहीं सुनी।' उसने कहा तोमुझे गुस्सा आ गया। हद है यार! हम मर गए चोरी के लिए हाथ पांव मारते- मारते और येमेंढक हैं कि․․․․․ आप ही कहो, चोरी के लिए क्याहाथ पैर नहीं मारने पड़ते? ऊपर से चोरी की कविता के कवि से जो उसके मन में आए सुनतेरहो। कवि जिंदा तो जिंदा, मरे भी अपनी कविता पर फणिधर की तरह कुंड़ी मारे बैठे रहतेहैं। अपनी कविता को हम जैसों का हाथ नहीं लगाने देते तो नहीं लगाने देते । इनकीकविता पर हाथ साफ करना महीनों भूखे शेर के मुंह में हाथ डालने से कम नहीं होता।मैं तो कहता हूं ये सब करना किसी मौलिक कविता को लिखने से सौ गुणा ज्यादा मेहनतका काम है । हम जैसे जब इनकी कविता की ओर बढ़ते ही हैं कि ये नरक से भी भौंकनाशुरू कर देते हैं। खैर, मैंने उसकी बात का कोई बुरा नहीं माना क्योंकि बुरा मानजाता तो हिंदी पखवाड़े की रात्रि पर कविता सुनाने जाने का सारा मजा किरकिरा होजाता।
सच कहूं, आजकल तो मेरेजैसों के मजे ही मजे हैं। हरिद्वार के पंडे की तरह एक मिनट की भी फुर्सत नहीं।सबेरे नौ बजे से हिंदी प्रेमी विभागों में पदिआना शुरू कर देता हूं कि सिलसिला रातको भी चलता रहता है। मैंने उसके द्वारा जले पर खुद ही गुलाब जल ड़लते कहा,‘ अभी तो हिंदी काउद्धार करने के लिए एक आयोजन में जा रहा हूं। पर तुम बिन पानी ही सूखे तालाब मेंटर्र -टर्र क्यों किए जा रहे हो?'
‘तो अपनी कवितायहीं सुना दो न! हम भी हिंदी पखवाड़ा मना रहे हैं।' उसने कहा औरहाइकू के नाम पर दो बाद टर्र- टर्र की।
‘पर सूखे तालाबमें? यार इन दिनों तोहिंदी की फटी किताबें भी तर हो जाती हैं और तुम हो कि․․․ क्या किसी विभाग ने तुम्हें टर्राने के लिएबजट नहीं भेजा?इन दिनोंतो हिंदी में ,टर्राने तोटर्राने, खुर्राने वालेभी साल भर के लिए पैसा इकट्ठा कर टाटा हुए जा रहे हैं,' मैंने कहा तोमेंढक बिन कुछ कहे सूखे तालाब में जा मरा, सिर झुकाए। चलो देश में किसी को तो सच सुननेपर शर्म आई।
चोरी कीकविताओं के असहनीय भार वाले थैले को कांधे पर उठाए मैं वहां से सीधा हिंदी पखवाड़ेके कवि आयोजन में। वहां देखा तो हैरानी हो गई! कवि गोष्ठी में कई साल पहले दिवंगतकवि अधिक तो दूसरे गिनती के ! हद है यार! मरने के बाद भी कवि गोष्ठी नहीं छूटी।आखिर मैंने एक को आयोजकों की नजर बचा किनारे ले जाते पूछ ही लिया,‘ बंधु ये क्या! अबतो चैन करते। अगर मरने के बाद भी हिंदी पखवाड़े की गोष्ठियों में यों ही आतेरहोगे तो हम तो जिंदा जी ही मर लिए। यही पंद्रह दिन ही तो होते हैं हिंदी प्रेमीहोने का अहसास करने के लिए। हमें मारना ही है तो लो हमारे गले में अंगूठा दे दो।दिवंगत हुए पितृ पक्ष में आते ही शोभा देते हैं। वे कवि हों या श्रोता! कब है तुम्हाराश्राद्ध?'
‘ मेरे श्राद्धमें क्या तुम ऐसी सेवा करोगे जैसी यहां हो रही है?इस पखवाड़े के कार्यक्रमों में आ तो हमएक बार फिर जिंदा हो उठते हैं। साल भर इस पखवाड़े का इंतजार रहता है और तुम कहतेहो कि․․․'अब समझा! मेरेदादा ने अपना श्राद्ध पितृ पक्ष के सबसे बाद वाले दिन करने को क्यों कहा? वे भी कभी कभारअपने को हिंदी हिमायती कहा करते थे।
मुहब्बत में राजनीति
Posted by :अशोक गौतम
ON
Monday, October 25, 2010
No comments
No comments
इसेकहते हैं भाई जी रिसोर्सफुलनेस! एक घंटे पहले धर्म बदला तो दूसरे घंटे बाद पत्नीबदल ली। इधर मर गया छह महीने से फटी चड्डी बदलने की प्लान बनाता- बनाता! पर चड्डीफिर भी वहीं की वहीं। कल फिर जब दस दुकानों पर चड्डी के रेट कन्सल्ट करने के बादखाली हाथ घर लौटा तो द्वार पर खड़ी पत्नी ने उलाहना दिया, "आगए न आज फिर खाली हाथ?"
"क्या करता! बस! चड्डी लेने ही वाला था कितुम्हारे चेहरे पर आई छाइयों की याद आ गई। और मैं तुम्हारे लिए छाई नाशक क्रीम ले आया। मुझे तब अपनी चड्डी से जरूरीतुम्हारी छाई नाशक क्रीम लगी। ये लो।" सुन पत्नी से कुछ कहते न बना।
अभी पत्नी के लिए लाई छाई नाशक क्रीम की यूज विधि बड़ीसावधानी से पढ़ ही रहा था कि वे आ पहुँचे, पत्तों के डोने में प्रसाद लिए। माथे पर टीका लगाए। पिछले कल तक वे नास्तिकथे। घोर नास्तिक। धूप की बास भी आ जाती तो बीसियों छींकें लेते। बीड़ी के बंडल परभी भगवान का फोटो दिख जाता तो आँखों में दवाई डाल आँखें साफ कर ही आँखें खोलते।
उन्हींने बताया था कि वे पहले घोर आस्तिक थे। बात उनदिनों की है जब उनकी शादी नहीं हुई थी। वे भगवान का नाम लेकर रोज इश्क़ करने सड़कों पर सरकारी सांड़ से निकलते और साँझ को सकुशल घर लौट आते। उसरोज भी वे भगवान का नाम लेकर ही इश्क़ फरमाने निकले थे। पर तब भगवान ने साथ नहीं दिया और वे इश्क़ करते- करते ऐसे फँसे किविवाह करना पड़ा, कतई न चाहते हुए भी। बस! तबसे भगवान से उनका छत्तीस का आँकड़ा हो गया। हालाँकिभगवान ने बाद में सॉरी भी फील की, पर वे नहीं माने तो नहीं माने। ये तो कोई बात नहीं होती कि पहले तो आप किसीकोमरवा दो और बाद में सॉरी फील करके पूजनीय बने रहो।
"और यार, क्या कर रहे हो? लो प्रसाद लो।"
"प्रसाद और आप?"
"हाँ यार! मैं फिर आस्तिक हो गया। ले प्रसाद और अपना जीवन सुधार।" कह उन्होंने डोने में से थोड़ा सा प्रसाद मेरे हाथपर रख दिया। पर मेरी पत्नी को नहीं दिया।
"पर ये प्रसाद है कहाँ का? आज तक हर जगह का प्रसाद ही तो खाया,परअपना जीवन नहीं सुधरा तो नहीं सुधरा। अब तो प्रसाद तो क्या भगवान पर से विश्वासउठने लगा है।" पत्नी के चेहरे की छाइयों को देख रोना निकलने ही वाला था बस!
" क्या बताऊँ यार! शहर में पहुँचे हुए मुहब्बतयोगी आए हैं। मुहब्बत पर वो प्रवचन करते हैं कि, खुदा खैर करे...वो प्रवचन करते हैं कि....ईश्वर हीमुहब्बत है, मुहब्बत ही ईश्वर है। मुहब्बत साधक तो मैंने बहुत देखे पर ऐसा मुहब्बत साधकपहली बार देखा। उनके प्रवचन सुन मन ऐसा गद्गद् हुआ कि ... ले थोड़ा प्रसाद और लेऔर जीवन में सफल हो। चित्त शुद्ध हो जाएगा, पित्त ही चिंता किसे?" कह उन्होंने थोड़ा प्रसाद और दिया और किसी फिल्म के गीत पर बने भजन कोगुनगुनाते हुए आगे हो लिए।
अगले दिन मैं भी पत्नी को बिन बताए मुहब्बत योगी केप्रवचन सुनने हो लिया। सच हंस तो! जबसे इस धर्म में रहकर विवाह किया है उस दिन सेमुहब्बत को तरस गया हूं। बहुत कोशिश की ! हर एंगिल से कोशिश की, पर पत्नी में कमबख्त महबूबा कभी नज़र ही नहीं आई। जबपत्नी में महबूबा नज़र ही न आए तो भला मुहब्बत भी कैसे होती? बस साहब चले हुए हैं भरे रेगिस्तान में परछाइयों कोपानी समझते हुए। जब तक हैं, सफ़र में रहेंगे। समरथ तो चड्डी बदलने की नहीं, अब धर्म कैसे बदलें साहब?
पांडाल में तिल रखने को जगह नहीं। लोग थे कि पांडालके साथ वाले पेड़ों पर भी चढ़े हुए थे। सच्ची को! दुनिया बहुत भटक रही है।
वे मंच पर आए तो सफेद बाल वाले चार- चार बच्चों केमुहब्बतहीन बापों की आँखों से आँसुओं के बरसाती नाले फूट पड़े।
अपने चारों ओर उन्होंने चार- चार शिष्याओं को जमायातो मन किया अभी पेड़ पर से छालांग मारकर इनसे दीक्षा ले लूँ।
उन्होंने प्रवचन शुरू किए,"मुहब्बतअल्लाह है। ईश्वर प्रेम हो या न हो। मुहब्बत के लिए धर्म तो क्या जन्म बदल दो।मैंने भी बदला। मुहब्बत तपस्या है। जिस तरह एक जगह खड़ा खड़ा पानी सड़ जाता है उसीतरह एक पतनी के साथ रहते रहते मर्द सड़ जाता है। इसलिए छोड़ दो उस धर्म को जोपत्नी बदलने की इजाज़त नहीं देता। मुहब्बत त्याग है। देखो, इसीके अधीन हो मैंने पहली पत्नी का बेहिचके त्याग करदिया, बच्चों का त्याग कर दिया, बापू की पगड़ी सरे बाजार उछाल दी। इस त्याग के पीछेमेरा कोई स्वार्थ नहीं। बस! मैं तो चाहता हूँ मुहब्बत ज़िंदा रहे, उसके साथ नहीं तो इसके साथ ही सही। मेन मकसद तोमुहब्बत को ज़िंदा रखने से है। जब पहले घर में मुहब्बत ज़िंदा न दिखे तो और जगहमुहब्बत की अलख जगा लो, यही सबसे बडा धर्म है। पद, संपत्ति तो हाथ पाँव का मैल है। घरवाले अगर घर से बेदखल कर दें, तो कर दें। घबराना नहीं। घबराए तो गए काम से। भक्तो!मुहब्बत की रक्षा के लिए आप सब आगे आओ। यह एक अभियान है। इस अभियान की मशाल मैंनेजला दी है। अब यह आप भक्तों पर है कि ये मशाल जलती रहे या बुझ जाए। छोड़ो ये लोकलाज। छोड़ो ये तिल तिल मरते हुए जीना। अपने दिल से पूछो- केवल एक पत्नी के साथ कौनखुश है? जो हो वह हाथ खड़े करे।" कह वे मुहब्बत योगी तनिक रुके और मजे की बातह्ज़ारों की भीड़ में एक हाथ भी खड़ा न हुआ। उन्होंने मुस्कुराते हुए आगे कहना शुरूकिया,"नहीं न! नहीं! तो हर धर्म में ये गुंजाइश क्यों नहीं ? होनी चाहिए। माँग करो सरकार से, संविधान से, हर धर्म से, लोकतंत्र से कहो हम वोट उसे ही देंगे जो समाज में मुहब्बत के लिए त्याग करसके। कौन कौन वोट करेगा ऐसे क्रांतिकारी,युगपुरुष को?" कहने भर की देर थी कि भक्तों ने हाथ तो हाथ दोनों टांगें भी समर्थन में खड़ी करदीं। उन्होंने भक्तों को दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया और अपनी शिष्याओं के साथपंचतारा होटल को हो लिए।
और मैं एक नए जोश खरोश के साथ डोने में प्रसाद लिए घर। क्याआपको भी प्रसाद दे कृतार्थ करूँ जनाब! एक और वैष्णव का उदय
Posted by :अशोक गौतम
ON
Friday, October 22, 2010
No comments
No comments
वेकाफी दिनों से कुछ ज़्यादा ही परेशान चल रहे थे। अपने ईश्वर के चरणों में भी उनको शांति नहीं मिल रही थी।
एक समय में वे शुद्ध वैष्णव थे। मांस-मदिरा का नामकोई उनके सामने ले लेता तो चार बार कुल्ला करते, कान जाकर कान वाले से साफ करवा आते। जब हर एलोपैथिकदवाई में अल्कोहल का पता चला तो कई दिन गले में अंगुठियाँ डाल उल्टियाँ करते रहे।ठीक हुआ गला एक बार फिर बैठा। घरवाली ने व्रत होने पर जब घर में खाना बनाने मेंअनिच्छा जताई तो बेचारे पेट भराई के लिए मुहल्ले के शुद्ध वैष्णव ढाबे पर जानेलगे। वाह! क्या माश की दाल। घर आकर भी उँगलियाँ ही चाटते रहते। बाद में एकमांसाहारी मित्र ने बताया कि वैष्णव ढाबे वाला बोलने को वैष्णव ढाबे वाला है, माश की दाल का स्वाद बढ़ाने के लिए उसमें बकरे वालेपतीले से तरी की दो-चार कड़छियाँ डाल देता है, तो उन्हें लगा कि अब तो रहा सहा वैष्णवीपन भी गया। शाम को भगवान की पूजा करतेहुए कौन सा मुँह दिखाएँगे? मन किया धर्म भ्रष्ट करने वाले इस समाज से कूच कर जाएँ। पर वैष्णव ढाबे की दालका स्वाद याद आता तो समाज से कूच होने का सवाल ढाबे की दाल के आगे गौण हो जाता।अतः प्रायश्चित के हजारों विकल्पों में से एक विकल्प पर गहराई से विचार करने केबाद इस नतीजे पर पहुँचे कि वैष्णवपन की शुद्धि के लिए हरिद्वार जाकर पंडों सेहजामत करवा ली जाए। क्योंकि भगवान से उनका सीधा लिंक सदियों से रहा है। और वेकिसीको बिना कुछ बताए हरिद्वार जाने की तैयारी में जुट गए। पत्नी तो पत्नी, इस बारे उन्होंने अपने भगवान को भी नहीं बताया।
पर भगवान ठहरे भगवान! सांध्यकाल काल को ज्यों ही रोज़की तरह वे भगवान की संध्या करने बैठे इससे पहले कि उनका दुख भगवान के आगे फूट पड़ताभगवान ने ही पूछ लिया,“क्यों भक्त! आज कुछ ज़्यादा ही दुविधा में लग रहे हो? क्या बात है? कहो तो कुछ हैल्प करूँ?”
उन्होंने इधर-उधर देखा। कहीं पर कोई नहीं। आवाज़ भीअनपहचानी सी लगी। पत्नी की आवाज़ तो इतनी मधुर हो ही नहीं सकती। वे परेशान हो उठेतो भगवान ने उनके कंधे पर हाथ धरते हुए कहा,“डरो नहीं, यार मैं हूँ। अब मुझसे तुम्हारी बेचैनी देखी नहीं गईतो दौड़ चला आया।”
“प्रभु! अब हद हो गई। सच कहूँ, पानी गले-गले तक आ गया है। वैष्णपन बचाना कठिन हीनहीं अति कठिन हो रहा है। अब तो जी चाहता है कि बस सबकुछ छोड़ आपके चरणों में चलाआऊँ। मुझे अपने चरणों में बस एक पटड़ा भर जगह दे दो प्रभु!” कहते-कहते वैष्णव धूप जलाने के बदले अपनी धोती में हीदियासलाई लगा बैठे।
“यार, इतने उतावले न हो मेरे भक्त! अपनी धोती बचाओ।”
खैर, इससे पहले कि वैष्णव का ध्यान अपनी धोती की ओर जाता प्रभु ने ही उनकी धोती मेंलगी आग बुझा दी। वैष्णव की धोती की आग बुझाते-बुझाते बेचारों का अपना हाथ भी थोड़ाजल गया। वैष्णव हड़बड़ाते हुए उठे तो भगवान ने पूछा, “अबकहाँ जा रहे हो भक्त?”
“बरनोलले आता हूँ। आपकी उँगलियाँ जल गईं न।”
“कोईचिंता नहीं। पर तुम इतने परेशान हो क्यों?”
“अबआप से छिपा क्या है प्रभु! सब जान कर भी क्यों अनजान बने फिरते हो? आज के दौर में अपना वैष्णवीपन तो गया पानी में।”
“यार, पानी में तो बिहार जाता है, असम जाता है। सरकार का उद्घाटन होने से पूर्व बनापुल जाता है, तुम क्यों पानी में जाने लगे?”
“प्रभुआज के दौर में धृतराष्ट्र के दरबार में अबला की इज़्ज़त बच सकती है पर इस समाज मेंवैष्णव का वैष्णपन नहीं। आपसे बस एक ही प्रार्थना है कि या तो मुझे इस वैष्णवीपनसे मुक्त करो या....”
“ आखिर ऐसी बात क्या हो गई भक्त जो इतने संवेदनशील होउठे। इतने संवेदनशील तो यहाँ वे भी नहीं जो मेरे नाम की खा-खा कर अपना अगला लोकबिगाड़ रहे हैं।”
“अगलेलोक की तो बाद में देखी जाएगी पर अभी तो इस लोक की दुविधा से उबारो हे मेरे नाथ!”
“तोतुम्हारी दुविधा क्या है वैष्णव? इतने रंगीन संसार में रहकर भी दुविधा! अगर मेरे वशमें होता तो आज के दौर को देखते हुए मैं भी देवलोक छोड़ यहीं पर अपना घर बसालेता... और इधर एक तुम हो कि...”
“आपनेवैष्णव के लिए नियम बनाया है कि वह झूठ नहीं बोलेगा। मैंने इसलिए आधे झूठ सेगुजारा चलाया। हालाँकि तंगी में रहा । बीवी से दिन में दस बार गालियाँ सुनीं। परख़ामोश रहा कि आप नाराज़ न हो जाएँ। आपने वैष्णव के लिए प्रावधान रखा कि वह हिंसा नकरे। पर मैं वैष्णपन की इज़्ज़त के लिए अर्द्ध हिंसक हो जीता रहा कि वैष्णपन की नाकबची रहे। अपनी नाक की फ़िक्र जब यहाँ समाज को ही नहीं तो उसूलन मुझे भी नहीं होनीचाहिए थी। क्योंकि आखिरकार हूँ तो मैं भी एक अदद सामाजिक प्राणी ही न। पर फिर भीवैष्णव हित में मैंने अपनी नाक की आधी चिंता किए रखी। आपने वैष्णव के लिए तय कियाकि वह औरों के माल पर बुरी तो बुरी, नज़र भी नहीं डालेगा। कुछ दिन दोनों आँखें बंद कर जीता रहा। पेट में कुछ-कुछहोने लगा तो औरों के माल पर थोड़ी नज़र डाली। मजा आया, पर आपके अभिशाप के डर से एक आँख से औरों के माल कोआधी बुरी नज़र देखने लगा। जीना तो मुझे भी है न प्रभु!”
“तो मैं कब कहता हूँ कि इस संसार में मेरे भक्तों कोजीने का अधिकार नहीं। अपितु मैं तो कहता हूँ इस संसार में किसी को अगर जीने काअधिकार है तो बस मेरे भक्तों को।”
“परप्रभु अब जीने के लिए हर हद पार करनी पड़ रही है। दिन में एक बार नहीं सौ-डसौ बारअंतरात्मा को मारना पड़ रहा है। जो कहना नहीं चाहिए वह साधिकार कहना पड़ रहा है।जो सपने में भी करना नहीं चाहिए वह सब कुछ सीना ठोंक कर करना पड़ रहा है। वह सब इसमरी जिह्वा के कहने पर खाना पड़ रहा है जिसकी पैदा होते हुए कल्पना भी नहीं की थी।”
“बस, इतनी सी बात! इतनी सी बात के लिए जीवन से विरक्तिक्यों भक्त? शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य जीवन बार-बारनहीं मिलता। किसी वस्तु को विवशता समझकर मत त्यागो। दूसरी ओर किसी चीज़ को विवशतामें ओढ़ना पड़े तो भी खुश होकर ओढ़े रखो। विवशता से किए गए त्याग को परमात्मा तोपरमात्मा, आत्मा भी स्वीकार नहीं करती। जो भी त्याग हो,मन के भीतर से हो। नहींतो....”
“ नहीं तो क्या प्रभु!!”
“नहींतो क्या भक्त! ये जन्म तो दुविधा में गया ही, अगले जन्म की क्या गारंटी कि तुम मनुष्य योनि में ही जन्म लो।”
“तो??”
“समझदारीइसी में है कि चोला वैष्णव का ओढ़े रहो और जो अपने को अच्छा लगे करते रहो। क्योंकिये दुनिया सच की नींव पर नहीं अपितु दिखावे की नींव पर ही तो टिकी है। यहाँ तो लोग दफतर के लिए और आटे की चपातियाँ ले जातेहैं और घर में और आटे की चपातियाँ खाते हैं। बस! कुछ भी करने से पहले ये सोच लो कितुम बाहर हर हाल में दिखने वैष्णव ही चाहिए, घर में भले ही तुम जो लगो सो लगो, इससे मुझे कोई सरोकार नहीं। चाहो तो बगल में छुरी कीजगह कटार रख लो पर मुँह से हर हाल में वैष्णव-वैष्णव ही कहो। यही मेरा आदेश है।”
“परअगर समाज ने उँगली मेरे ऊपर उठाई तो?” वैष्णव ने आखिरी शंका जाहिर की।
“उँगलियाँ तो समाज तब उठाए अगर उसके हाथों मेंउँगलियाँ हों।” कह प्रभु अपने भक्त के पास से उठ अपनी मूर्ति में वापस चले गए।
जा आत्मा, ऐश कर
Posted by :अशोक गौतम
ON
Friday, October 22, 2010
No comments
No comments
इधर कुछ दिनों सेअपने मुहल्ले में ये कुछ आम हो गया है कि हम करते हैं कुछ और तो होकर आता है कुछऔर! पता नहीं हमारे मुहल्ले के वाशिंदों के दिमाग में कौन पिशाच घर कर गया है?पिछले दो साल सेमुहल्ला सुधार कमेटी यह सोचकर चंदा इकट्ठा करने में दिनरात जुटी थी कि चंदे सेअबके मुहल्ले में जज घर बनावाया जाएगा। पिछले हफ्ते जब जज घर की आधार शिला रखीजानी थी तो मुहल्ले के सभी आदरणीय आधार शिला वाले स्थान पर खड़े के खड़े रह गए औरउधर मुहल्ला सुधार समिति के प्रधान ने चंदे से इकट्ठी हुई धन राशि के दम पर अपनेअपने दसवें कमरे की आधारशिला रख डाली।
इधर सरकारसे मुहल्ले के रास्ते के निर्माण के लिए बीस हजार में से कट कटाकर दस ही हाथ लगेतो मुहल्ले में जश्न हुआ। जिस दिन रास्ते का काम शुरू होना था तो पता चला कि इसपैसे से तो रास्ता सुधार कमेटी के प्रधान अपने आंगन को पक्का करवाने में जुटे हैं।
इन प्रधानजी से तंग आकर हमने फिर एक और नया प्रधान चुना । इसने सबसे पहले मुहल्ले के प्रतिसत्य निष्ठा और ईमानदारी की शपथ हमारे कहने से पहले खाई। लगा ये बंदा मुहल्ले केविकास में ईमानदारी बरतेगा । मुहल्ले वालों को लगा कि मुहल्ले में सरकार का एकसार्वजनिक नल लगवाया जाए। कारण, कुत्ते मुहल्लेवालों के बाहर रखे पानी के बरतनों को जूठा कर रहे थे और पता न लगने के कारण जब वहीजूठा पानी मुहल्ले का शरीफजादा पी रहा था तो कुत्तों सा हो रहा था। प्रधान के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए मुहल्ले वालों ने फिर चंदा इकट्ठा कर सरकारी दफ्तर मेंखिला पिला कर नल पाने के चक्कर लगाने शुरू किए। काफी मशक्कत के बाद मुहल्ले के लिएसार्वजनिक नल स्वीकृत हो गया। मुहल्ले में एक बार फिर नए प्रधान की अगुआई में जश्नमना।
महीने बादजब विभाग के सार्वजनिक नल लगाने आने वाले बंदों ने सोम पान करने के बाद पानी केनलके की पाइप नए प्रधान के शौचालय की ओर मोड़ी तो मुहल्ले वालों के होश एक बार फिरउड़े। पर सब यह सोच कर चुप से रहे कि हो सकता है मुफ्त की ज्यादा पी ली हो इसलिएगलती से पाइप का मुंह दूसरी ओर को मुड़ गया हो । मुफ्त की शराब जब काजी को भी हजमहोती रही है तो इन बंदों को पता नहीं क्यों हजम नहीं हो रही थी। इतनी सी पीकर हीबहक गए थे । तभी सरकारी बंधुओं से रोज का पाला पड़ने वाले एक सिद्ध पुरुष ने बतायाकि ये विभाग में नए नए ज्वायन किए हैं अभी खाने पीने के इतने हैबीचुअल नहीं हुएहैं, कुछ दिन मेंरवां हो जाएंगे। डांट वरी, मैं इन्हें खुदहैंडिल कर लूंगा। जब पाइप नए प्रधान के शौचालय के दरवाजे तक पहुंच ही गई तो एकआयोडीन रहित नमक खाने वाले ने उन्हें रोकते हुए पूछा‘ भैया! ये पाइपबिछा कहां को रहे हो? ज्यादा पी ली होतो कल आ जाना।’
‘ जहां के लिएनलका सैंक्शन हुआ है वहीं के लिए पाइप बिछा रहे हैं। इतनी पिलाई ही कहां है आपनेजो हम बहक जाएं।’इनके हेड ने अपना हेड झटकते हुए कहा और पाइप कसने लग गया।
‘पर नलका तोमुहल्ले के मुहाने पर लगना था।’
‘प्रधान जी काशौचालय क्या वहां भी है?’उसने चौड़े होकर पूछा तो साथ खड़े प्रधान जी सीना चौड़ा किएमंद मंद मुस्कराते रहे और मुहल्ले वाले....
कई दिनोंसे पेट में दर्द हो रहा था। सोच रहा था कि अजवायन खाकर ठीक हो जाएगा, पर नहीं हुआ तोनहीं हुआ । हारकर डाक्टर के पास गया तो उस समय वे एमआर से गिफ्ट लेने में मग्न थे।उनके कमरे के बाहर मरीजों की इतनी लंबी लाइन, इतनी तो यमराजके दरबार के आगे भी नहीं होती। अचानक अपनी जान पहचान का इस अस्पताल का बंदा कहींसे आ टपका, जान में जान आई।
‘क्या बात है?’
‘पेट में कईदिनों से दर्द हो रहा है।’
‘तो पहले क्योंनहीं आए?’
‘सोचा यों ही ठीकहो जाऊंगा।’
‘थोड़ा यों मुड़िए, तुम्हारे साथ हीनहीं ,पूरे देश के साथयही प्राब्लम है, जब बीमारी हद सेआगे निकल जाती है तो इलाज करवाने चलते हैं। समय रहते अगर इलाज करवा लिया जाए तो यहहाल न हो। और हां थोड़ा अपने खाने की आदत को सुधारिए।’
‘ पर जब साथ वालाखाता ही रहता है तो डाक्टर साहब मुझसे भी नहीं रहा जाता।’ मैंने अपनीव्यथा कही।
‘उसकी उम्र कितनीहै?’
‘ यही कोई तीसबत्तीस साल।’
‘ उसे तो अभीजिंदगी में बहुत कुछ करना है। आप बस अब अपने आगे की सोचिए।’
घर आकरदवाई ली तो पेट दर्द तो ठीक नहीं हुई पर मुझे लगा जैसे मेरी मरी हुई आत्मा जिंदाहो उठी। एकाएक मुझमें मानसिक परिवर्तन आने लगा। और घंटे बाद ही पूरा का पूरापरिवार परेशान। में तो पहले ही शर्म से पानी पानी हुआ जा रहा था। घर वालों ने आननफानन में गाड़ी की और मुझे अस्पताल ले गए। शुक्र भगवान का! वहां वही डाक्टर मिल गएजिन्होंने मुझे पहले देखा था।
‘ अब क्या हो गया? कहीं और दर्द होगई क्या?’
‘नहीं।’
‘तो??’
‘साहब, खाई तो आपकीलिखी पेट दर्द की दवाई ही थी, पेट दर्द तो ठीकनहीं हुआ पर मरी हुई आत्मा जाग उठी। ’पत्नी ने मेरादर्द से पीड़ित पेट पकड़े रखा।
‘ देखिए भाई साहब!हम तो केवल दवाई ही लिख सकते हैं। बाकी दवाई में क्या है,यह तो दवाईबनाने वाला ही जाने।’ डाक्टर साहब भीपरेशान हो उठे।
‘पर दवाई खाकर आजतक मरते ही अधिक देखे। यह पहला केस है जिसमें दवाई खाकर मरा हुआ कुछ जिंदा हुआ हो।’ करुणामूलक आधारपर मेरी जगह लगने की आस लगाए बेटे ने चिंता में डूबे हुए कहा तो डाक्टर ने उसकेकंधे पर हाथ रखते कहा,‘यार! किस्मत अपनी- अपनी।’
मरी हुईआत्मा के जिंदा होने वाले दिन से लेकर आज तक मेरा परिवार ही नहीं मैं भी सच्ची कोबहुत परेशान हूं। घर की सारी शान शौकत को ग्रहण लगा गया है। केवल और केवल पगार परजी रहा हूं। आत्मा से रोज की तरह कल सांझ फिर निवेदन किया,‘हे आत्मा! प्लीजतू मर जा और मुझे जिंदा रहने दे। या मैं तुझसे तंग आकर आत्महत्या कर लेता हूं। फिरन रहेगा बांस और न रहेगी बांसुरी।’ तो आत्मा नेविनम्र हो पूछा,‘एक बात पूछूं?’
‘ तो मर जाओगी?’
‘ हां।’
‘तो पूछो।’ मेरा मन मल्हारगाने लगा।
‘तुम मुझे मारकरकितने साल जिए?’
‘जबसे दिमाग कीभूख से परेशान हुआ।’
‘ये भूख कम हुईक्या?’उसने पूछा तोपहली बार मैं सोचने को विवश हुआ। काफी देर तक सोचने के बाद मैंने सिर खुजलाते कहा,‘नहीं।’
‘ तो जिस देश मेंलोकतंत्र हो वहां कुछ जीने का हक तो गरीबों को भी होता होगा न? आत्मा से सबकुछछीन लो मित्र, पर थोड़ा सा हकतो उसे भी जीने का दो। ’
बंधुओं!मैंने आज तक पत्नी को उसके नाजायज हक दिए। बच्चों को उनके नाजायज हक दिए तो मेरेमन में आया कि जिसने अपने मरने के बाद मुझे इतने हक दिए आज मैं भी इसे कुछ जीने काहक दे ही दूं। तो जा आत्मा! तू भी क्या याद रखेगी कि तेरा भी किसी शरीफ से पालापड़ा था। मैंने आज से तुझे जीने का हक दिया।
इधर सरकारसे मुहल्ले के रास्ते के निर्माण के लिए बीस हजार में से कट कटाकर दस ही हाथ लगेतो मुहल्ले में जश्न हुआ। जिस दिन रास्ते का काम शुरू होना था तो पता चला कि इसपैसे से तो रास्ता सुधार कमेटी के प्रधान अपने आंगन को पक्का करवाने में जुटे हैं।
इन प्रधानजी से तंग आकर हमने फिर एक और नया प्रधान चुना । इसने सबसे पहले मुहल्ले के प्रतिसत्य निष्ठा और ईमानदारी की शपथ हमारे कहने से पहले खाई। लगा ये बंदा मुहल्ले केविकास में ईमानदारी बरतेगा । मुहल्ले वालों को लगा कि मुहल्ले में सरकार का एकसार्वजनिक नल लगवाया जाए। कारण, कुत्ते मुहल्लेवालों के बाहर रखे पानी के बरतनों को जूठा कर रहे थे और पता न लगने के कारण जब वहीजूठा पानी मुहल्ले का शरीफजादा पी रहा था तो कुत्तों सा हो रहा था। प्रधान के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए मुहल्ले वालों ने फिर चंदा इकट्ठा कर सरकारी दफ्तर मेंखिला पिला कर नल पाने के चक्कर लगाने शुरू किए। काफी मशक्कत के बाद मुहल्ले के लिएसार्वजनिक नल स्वीकृत हो गया। मुहल्ले में एक बार फिर नए प्रधान की अगुआई में जश्नमना।
महीने बादजब विभाग के सार्वजनिक नल लगाने आने वाले बंदों ने सोम पान करने के बाद पानी केनलके की पाइप नए प्रधान के शौचालय की ओर मोड़ी तो मुहल्ले वालों के होश एक बार फिरउड़े। पर सब यह सोच कर चुप से रहे कि हो सकता है मुफ्त की ज्यादा पी ली हो इसलिएगलती से पाइप का मुंह दूसरी ओर को मुड़ गया हो । मुफ्त की शराब जब काजी को भी हजमहोती रही है तो इन बंदों को पता नहीं क्यों हजम नहीं हो रही थी। इतनी सी पीकर हीबहक गए थे । तभी सरकारी बंधुओं से रोज का पाला पड़ने वाले एक सिद्ध पुरुष ने बतायाकि ये विभाग में नए नए ज्वायन किए हैं अभी खाने पीने के इतने हैबीचुअल नहीं हुएहैं, कुछ दिन मेंरवां हो जाएंगे। डांट वरी, मैं इन्हें खुदहैंडिल कर लूंगा। जब पाइप नए प्रधान के शौचालय के दरवाजे तक पहुंच ही गई तो एकआयोडीन रहित नमक खाने वाले ने उन्हें रोकते हुए पूछा‘ भैया! ये पाइपबिछा कहां को रहे हो? ज्यादा पी ली होतो कल आ जाना।’
‘ जहां के लिएनलका सैंक्शन हुआ है वहीं के लिए पाइप बिछा रहे हैं। इतनी पिलाई ही कहां है आपनेजो हम बहक जाएं।’इनके हेड ने अपना हेड झटकते हुए कहा और पाइप कसने लग गया।
‘पर नलका तोमुहल्ले के मुहाने पर लगना था।’
‘प्रधान जी काशौचालय क्या वहां भी है?’उसने चौड़े होकर पूछा तो साथ खड़े प्रधान जी सीना चौड़ा किएमंद मंद मुस्कराते रहे और मुहल्ले वाले....
कई दिनोंसे पेट में दर्द हो रहा था। सोच रहा था कि अजवायन खाकर ठीक हो जाएगा, पर नहीं हुआ तोनहीं हुआ । हारकर डाक्टर के पास गया तो उस समय वे एमआर से गिफ्ट लेने में मग्न थे।उनके कमरे के बाहर मरीजों की इतनी लंबी लाइन, इतनी तो यमराजके दरबार के आगे भी नहीं होती। अचानक अपनी जान पहचान का इस अस्पताल का बंदा कहींसे आ टपका, जान में जान आई।
‘क्या बात है?’
‘पेट में कईदिनों से दर्द हो रहा है।’
‘तो पहले क्योंनहीं आए?’
‘सोचा यों ही ठीकहो जाऊंगा।’
‘थोड़ा यों मुड़िए, तुम्हारे साथ हीनहीं ,पूरे देश के साथयही प्राब्लम है, जब बीमारी हद सेआगे निकल जाती है तो इलाज करवाने चलते हैं। समय रहते अगर इलाज करवा लिया जाए तो यहहाल न हो। और हां थोड़ा अपने खाने की आदत को सुधारिए।’
‘ पर जब साथ वालाखाता ही रहता है तो डाक्टर साहब मुझसे भी नहीं रहा जाता।’ मैंने अपनीव्यथा कही।
‘उसकी उम्र कितनीहै?’
‘ यही कोई तीसबत्तीस साल।’
‘ उसे तो अभीजिंदगी में बहुत कुछ करना है। आप बस अब अपने आगे की सोचिए।’
घर आकरदवाई ली तो पेट दर्द तो ठीक नहीं हुई पर मुझे लगा जैसे मेरी मरी हुई आत्मा जिंदाहो उठी। एकाएक मुझमें मानसिक परिवर्तन आने लगा। और घंटे बाद ही पूरा का पूरापरिवार परेशान। में तो पहले ही शर्म से पानी पानी हुआ जा रहा था। घर वालों ने आननफानन में गाड़ी की और मुझे अस्पताल ले गए। शुक्र भगवान का! वहां वही डाक्टर मिल गएजिन्होंने मुझे पहले देखा था।
‘ अब क्या हो गया? कहीं और दर्द होगई क्या?’
‘नहीं।’
‘तो??’
‘साहब, खाई तो आपकीलिखी पेट दर्द की दवाई ही थी, पेट दर्द तो ठीकनहीं हुआ पर मरी हुई आत्मा जाग उठी। ’पत्नी ने मेरादर्द से पीड़ित पेट पकड़े रखा।
‘ देखिए भाई साहब!हम तो केवल दवाई ही लिख सकते हैं। बाकी दवाई में क्या है,यह तो दवाईबनाने वाला ही जाने।’ डाक्टर साहब भीपरेशान हो उठे।
‘पर दवाई खाकर आजतक मरते ही अधिक देखे। यह पहला केस है जिसमें दवाई खाकर मरा हुआ कुछ जिंदा हुआ हो।’ करुणामूलक आधारपर मेरी जगह लगने की आस लगाए बेटे ने चिंता में डूबे हुए कहा तो डाक्टर ने उसकेकंधे पर हाथ रखते कहा,‘यार! किस्मत अपनी- अपनी।’
मरी हुईआत्मा के जिंदा होने वाले दिन से लेकर आज तक मेरा परिवार ही नहीं मैं भी सच्ची कोबहुत परेशान हूं। घर की सारी शान शौकत को ग्रहण लगा गया है। केवल और केवल पगार परजी रहा हूं। आत्मा से रोज की तरह कल सांझ फिर निवेदन किया,‘हे आत्मा! प्लीजतू मर जा और मुझे जिंदा रहने दे। या मैं तुझसे तंग आकर आत्महत्या कर लेता हूं। फिरन रहेगा बांस और न रहेगी बांसुरी।’ तो आत्मा नेविनम्र हो पूछा,‘एक बात पूछूं?’
‘ तो मर जाओगी?’
‘ हां।’
‘तो पूछो।’ मेरा मन मल्हारगाने लगा।
‘तुम मुझे मारकरकितने साल जिए?’
‘जबसे दिमाग कीभूख से परेशान हुआ।’
‘ये भूख कम हुईक्या?’उसने पूछा तोपहली बार मैं सोचने को विवश हुआ। काफी देर तक सोचने के बाद मैंने सिर खुजलाते कहा,‘नहीं।’
‘ तो जिस देश मेंलोकतंत्र हो वहां कुछ जीने का हक तो गरीबों को भी होता होगा न? आत्मा से सबकुछछीन लो मित्र, पर थोड़ा सा हकतो उसे भी जीने का दो। ’
बंधुओं!मैंने आज तक पत्नी को उसके नाजायज हक दिए। बच्चों को उनके नाजायज हक दिए तो मेरेमन में आया कि जिसने अपने मरने के बाद मुझे इतने हक दिए आज मैं भी इसे कुछ जीने काहक दे ही दूं। तो जा आत्मा! तू भी क्या याद रखेगी कि तेरा भी किसी शरीफ से पालापड़ा था। मैंने आज से तुझे जीने का हक दिया।
सुख भरे दिन बीते रे भैया...
Posted by :अशोक गौतम
ON
Friday, October 22, 2010
No comments
No comments
जो ताऊ चुनाव के दिनों में अपने तो अपने, पूरे परिवार केपेटों को कब्जी कराए बैठा था, सबका पेट था कि बस खाए जा रहा था, बस खाए जा रहाथा। जो भी आते ,जो भी देते खा जाते, ज्यों बरसों के भूखे हों। पता नहीं ये वोटरचुनाव के दिनों में इतने भुक्खड़ क्यों हो जाते हैं? तब मैंने ताऊ केये हाल देख उसे समझाया भी था,‘ ताऊ! कम खा, कम! क्यों चारदिनों में अपनी पांच साल की आदत खराब कर रहा है।' पर ताऊ था किमेरी एक भी सुनने को तैयार नहीं था उस वक्त। ताऊ ही क्या, कोई भी समझदारवोटर ताऊ की तरह ही डटा हुआ था।
चुनाव खत्महुए! हारने वाले हार गए, तो जीतने वाले जीत गए। हारने वालों ने आत्म मंथन शुरू कियातो जीतने वालों ने जन मंथन। जो कल तक हाथ जोड़े खडे़ थे वे अब मुटि्ठयां भिंचेखड़े हैं। वोटर सामने आए तो सही। साले ने इतने दिन ऐसी की तैसी घुमा कर रखी। सोनातक हराम कर दिया था इस वोटर जात ने। रात को सोए सोए भी पसीने छूटते रहते थे। बुरेसपने आते रहते थे। अब तो भैया जीत गए हैं ,पांच साल लंबी तान कर सोएंगे। मरने वाला मरतारहे , जीने वाला जीतारहे अपनी बला से। यार हमने कोई पांच साल तक का जनता का ठेका तो नहीं ले रखा है।बहुत खिलाया पिलाया इतने दिन जनता को, ये क्या कम है? अब तो अपनेटांगें पसार कर खाने के दिन हैं भैये! हमने चुनाव जनसेवा के लिए थोड़े ही जीता है।अपने भी बाल बच्चे हैं यार! अपनी भी भूखी नंगी रिश्तेदारी है! रिश्तेदारी केकर्ज अब नहीं उतारेंगे तो कब उतारेंगे भैये! साली जिंदगी का क्या भरोसा, सरकार गिरने काक्या भरोसा। आजकल तो सरकारें ऐसे गिर जाती हैं कि ऐसे तो नया नया चलना सीखने वालाबच्चा भी नहीं गिरता। अपनी भी आपकी तरह प्रेमिकाएं हैं जिनका अपने सिवाय सच्चीको कोई नहीं। होगा तो साले को साला बना कर नहीं रख दें तो खद्दर पहनना छोड़ दें॥सात पुश्तों के लिए अब नहीं जोड़कर रखेंगे तो कब रखेंगे? अब है किसी माईके लाल में इतनी हिम्मत कि जो हमें खाने से रोके?
चुनाव केबाद मैं ताऊ घर गया तो बेचारा ताऊ सिर में हाथ दिए बैठा था। सोचा बीमार चल रहाहोगा। बहुत खाया इतने दिनों तक। बहुत पिया इतने दिनों तक। जिसको पांच साल तक खानेको कुछ न मिले और एकाएक इतना मिले कि ... तो बीमार तो होगा ही।
‘और ताऊ क्याहाल हैं? चुनाव में हरामके खाए पिए की खुमारी उतरी कि नहीं?' मैंने ताऊ को पूछा तो ताऊ कुछ कहने के बदलेचुप रहा वैसे ही सिर में हाथ दिए। पहले तो सोचा की हारने वाले का गम खाए जा रहाहोगा इसे। पर ताऊ ने बताया कि उसका उम्मीदवार तो आज तक जीता ही है। उम्र हो गईताऊ को खाते खाते। खा खा कर वोट पाते पाते। वैसे चुनाव सम्पन्न हो जाने के बादजनता की अक्सर ताऊ वाली ही स्थिति होती है।
बड़ी देरतक ताऊ ने न पानी को पूछा न बैठने को तो ताऊ पर गुस्सा भी आया। हद हो गई यार ताऊचार दिन तक नेताओं ने फूक क्या भरी, टुच्चे से नर को नारायण क्या कहा कि तू तोउम्र भर के शिष्टाचार को भी भूल गया। मुझे प्यास लगी थी सो ताऊ के नलके की ओरमुड़ा। चुनाव के दिनों में जब यहां आया था तो ताऊ के पाइप में जहां पहले पानीरोकने को भुट्टे की गुल्ली लगी होती थी वहां कोई उम्मीदवार विदेशी नलका फसा गयाथा। अभी फिर वहां पाइप में मक्की के भुट्टे की वही -
गुल्लीलगी देखी तो गश खा गया।
‘ये क्या ताऊ? वो नलका कहांगया?'
ताऊ नेपेट पकड़ मरी आवाज मे कहा,‘ बादल वाले हारने पर ले गए मुए निकाल कर।'
‘क्यों?'
‘ कहा, वोट लेने तकदिया था।'
मैंने ताऊके ओबरे की छत की ओर नजर डाली तो देखा कि उस पर चुनाव कि दिनों में जो तरपाल लगाथा, वह भी गायब था।
‘ताऊ, वह तरपाल कहांगया? तूफान तो आयानहीं कि उड़ कर कहीं चला गया हो।'
‘ वो भी ले गएसाइकिल वाले। कहा, जीत तो हुई नहीं, अब अगले चुनाव में मिलेगा।'
‘ और वो लाइट जोतुम्हारे नीम के पेड़ के सिर पर लगी थी?'
‘ लालटेन वालेउतार कर ले गए। बोले, खुदा ने जिंदा रखा तो फिर चुनाव के आते ही तुरंत लगाएंगे, ले जा रहे हैंतब तक यहां लगी लगी फ्यूज न हो, इसलिए। दूसरे पार्टी के मुख्यालय में खुद भी अंधेरा है।'
'और जो सामनेसड़क पर सड़क पक्की करने को रोलर, रोड़ी ,तारकोल रखी थी?'
‘वो भी हाथ वालेले गए, बोले, पार्टी को संसदमें जमाने के लिए रास्ता पक्का करने को ले जा रहे हैं। सब पक्का होते ही लेआएंगे।'
‘और जो तुम्हारेगांव में स्कूल का पत्थर रखा था?' मुझे सामने वो पत्थर न दिखा तो पूछा।
‘हाथी वाले उठाकर ले गए। बोले, जहां से पार्टी को लीड मिली है अब वहां लगाएंगे। अगले चुनावतक हमें लीड का जुगाड़ करो तो देखेंगे।'
अचानकसामने नीम की फुनगी पर कौआ कांव कांव करता दिखा तो ताऊ ने पूछा‘,रे छोरे! कागभाषा जानता है क्या?'
‘हां ताऊ!'
‘तो ये कौआ बताक्या बोल रहा है?'
‘कह रहा है किअगले चुनाव तक वोटर को भगवान हिम्मत दे।'
मैंने ताऊका मन रखने के लिए कौवे की भाषा का विश्ोषज्ञ होने का दावा दे मारा जबकि सच तो यहहै कि मैं आदमी की भाषा भी नहीं जानता।
चुनाव खत्महुए! हारने वाले हार गए, तो जीतने वाले जीत गए। हारने वालों ने आत्म मंथन शुरू कियातो जीतने वालों ने जन मंथन। जो कल तक हाथ जोड़े खडे़ थे वे अब मुटि्ठयां भिंचेखड़े हैं। वोटर सामने आए तो सही। साले ने इतने दिन ऐसी की तैसी घुमा कर रखी। सोनातक हराम कर दिया था इस वोटर जात ने। रात को सोए सोए भी पसीने छूटते रहते थे। बुरेसपने आते रहते थे। अब तो भैया जीत गए हैं ,पांच साल लंबी तान कर सोएंगे। मरने वाला मरतारहे , जीने वाला जीतारहे अपनी बला से। यार हमने कोई पांच साल तक का जनता का ठेका तो नहीं ले रखा है।बहुत खिलाया पिलाया इतने दिन जनता को, ये क्या कम है? अब तो अपनेटांगें पसार कर खाने के दिन हैं भैये! हमने चुनाव जनसेवा के लिए थोड़े ही जीता है।अपने भी बाल बच्चे हैं यार! अपनी भी भूखी नंगी रिश्तेदारी है! रिश्तेदारी केकर्ज अब नहीं उतारेंगे तो कब उतारेंगे भैये! साली जिंदगी का क्या भरोसा, सरकार गिरने काक्या भरोसा। आजकल तो सरकारें ऐसे गिर जाती हैं कि ऐसे तो नया नया चलना सीखने वालाबच्चा भी नहीं गिरता। अपनी भी आपकी तरह प्रेमिकाएं हैं जिनका अपने सिवाय सच्चीको कोई नहीं। होगा तो साले को साला बना कर नहीं रख दें तो खद्दर पहनना छोड़ दें॥सात पुश्तों के लिए अब नहीं जोड़कर रखेंगे तो कब रखेंगे? अब है किसी माईके लाल में इतनी हिम्मत कि जो हमें खाने से रोके?
चुनाव केबाद मैं ताऊ घर गया तो बेचारा ताऊ सिर में हाथ दिए बैठा था। सोचा बीमार चल रहाहोगा। बहुत खाया इतने दिनों तक। बहुत पिया इतने दिनों तक। जिसको पांच साल तक खानेको कुछ न मिले और एकाएक इतना मिले कि ... तो बीमार तो होगा ही।
‘और ताऊ क्याहाल हैं? चुनाव में हरामके खाए पिए की खुमारी उतरी कि नहीं?' मैंने ताऊ को पूछा तो ताऊ कुछ कहने के बदलेचुप रहा वैसे ही सिर में हाथ दिए। पहले तो सोचा की हारने वाले का गम खाए जा रहाहोगा इसे। पर ताऊ ने बताया कि उसका उम्मीदवार तो आज तक जीता ही है। उम्र हो गईताऊ को खाते खाते। खा खा कर वोट पाते पाते। वैसे चुनाव सम्पन्न हो जाने के बादजनता की अक्सर ताऊ वाली ही स्थिति होती है।
बड़ी देरतक ताऊ ने न पानी को पूछा न बैठने को तो ताऊ पर गुस्सा भी आया। हद हो गई यार ताऊचार दिन तक नेताओं ने फूक क्या भरी, टुच्चे से नर को नारायण क्या कहा कि तू तोउम्र भर के शिष्टाचार को भी भूल गया। मुझे प्यास लगी थी सो ताऊ के नलके की ओरमुड़ा। चुनाव के दिनों में जब यहां आया था तो ताऊ के पाइप में जहां पहले पानीरोकने को भुट्टे की गुल्ली लगी होती थी वहां कोई उम्मीदवार विदेशी नलका फसा गयाथा। अभी फिर वहां पाइप में मक्की के भुट्टे की वही -
गुल्लीलगी देखी तो गश खा गया।
‘ये क्या ताऊ? वो नलका कहांगया?'
ताऊ नेपेट पकड़ मरी आवाज मे कहा,‘ बादल वाले हारने पर ले गए मुए निकाल कर।'
‘क्यों?'
‘ कहा, वोट लेने तकदिया था।'
मैंने ताऊके ओबरे की छत की ओर नजर डाली तो देखा कि उस पर चुनाव कि दिनों में जो तरपाल लगाथा, वह भी गायब था।
‘ताऊ, वह तरपाल कहांगया? तूफान तो आयानहीं कि उड़ कर कहीं चला गया हो।'
‘ वो भी ले गएसाइकिल वाले। कहा, जीत तो हुई नहीं, अब अगले चुनाव में मिलेगा।'
‘ और वो लाइट जोतुम्हारे नीम के पेड़ के सिर पर लगी थी?'
‘ लालटेन वालेउतार कर ले गए। बोले, खुदा ने जिंदा रखा तो फिर चुनाव के आते ही तुरंत लगाएंगे, ले जा रहे हैंतब तक यहां लगी लगी फ्यूज न हो, इसलिए। दूसरे पार्टी के मुख्यालय में खुद भी अंधेरा है।'
'और जो सामनेसड़क पर सड़क पक्की करने को रोलर, रोड़ी ,तारकोल रखी थी?'
‘वो भी हाथ वालेले गए, बोले, पार्टी को संसदमें जमाने के लिए रास्ता पक्का करने को ले जा रहे हैं। सब पक्का होते ही लेआएंगे।'
‘और जो तुम्हारेगांव में स्कूल का पत्थर रखा था?' मुझे सामने वो पत्थर न दिखा तो पूछा।
‘हाथी वाले उठाकर ले गए। बोले, जहां से पार्टी को लीड मिली है अब वहां लगाएंगे। अगले चुनावतक हमें लीड का जुगाड़ करो तो देखेंगे।'
अचानकसामने नीम की फुनगी पर कौआ कांव कांव करता दिखा तो ताऊ ने पूछा‘,रे छोरे! कागभाषा जानता है क्या?'
‘हां ताऊ!'
‘तो ये कौआ बताक्या बोल रहा है?'
‘कह रहा है किअगले चुनाव तक वोटर को भगवान हिम्मत दे।'
मैंने ताऊका मन रखने के लिए कौवे की भाषा का विश्ोषज्ञ होने का दावा दे मारा जबकि सच तो यहहै कि मैं आदमी की भाषा भी नहीं जानता।
कहो, कैसी रही कबीर?
Posted by :अशोक गौतम
ON
Friday, October 22, 2010
No comments
No comments
भाई साहब!अब आप से छुपाना क्या! मंदी के इस दौर में भी हफ्ते में एक दिन जैसे तैसे उपवासरख ही लेते हैं। इसलिए नहीं कि भगवान से अपना कोई नाता है। इसलिए भी नहीं कि हमपरलोक सुधारने के चक्कर में हैं। ये लोक तो चमची मार कर मजे से कट गया। अगले लोकमें भी कोई न कोई चमचा प्रेमी मिल ही जाएगा। अरे साहब ! अब तो जब घरवालों से हीकोई रिश्ता नाता नहीं रहा तो भगवान से रिश्ते की बात करना समय की बरबादी करनाहै। अब तो सारे रिश्ते नाते मनी बेस्ड हो गए हैं। आत्म केंद्रित हो गए हैं।घरवाले बाप को बाप तब तक कहते हैं जब तक उनकी मांगें पूरी करते रहो। जिस दिन उनकीमांगें पूरी करने में आपने जरा सी भी असमर्थता जाहिर कर दी के उसी वक्त आप कौन तोवे कौन? वे मेरी तरह आपको पहचान भी जाएं तो आपका जूता मेरा सिर। सिर भी वह जिस के बाल घिस घिस कर साफ होगए हैं।
हम तोसाहब उपवास इसलिए रख लेते हैं कि इस बहाने हफ्ते में कम से कम एक दिन तो भरपेट फलफ्रूट खाने को नसीब हो जाते हैं। उपवास तो मात्र एक बहाना है। असल में उपवास केनाम पर चपाती छोड़ डटकर मेवे सेवे खाना है। रोज रोज चपाती खा खाकर आपका मन नहींउकता जाता?मेरा तोउकता जाता है और उसका सबसे सरल रास्ता है कि हफ्ते में एक दिन उपवास।
कल भीमेरे उपवास था। थाली में आठ दस केले काट कर भगवान के नाम पर रखे हुए थे। साथ मेंचार सेब। पोता दूर से सेबों को देख घूर रहा था। पर घरवाली ने उसे भगा दिया,‘ बहू! कहां हो ।पोते को परे ले जाओ। देखती नहीं तुम्हारे ससुर जी के उपवास है। बेचारों ने सुबहसे कुछ खाया नहीं।' पोता बहू की गोद में जा केलों की थाली को टुकुर टुकुर देखतारहा। पर मेरी हिम्मत उसे केले का एक टुकड़ा देने की नहीं पड़ी तो नहीं पड़ी।
अभी थालीमें से एक केले का टुकड़ा उठाया ही था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। घरवाली ने दरवाजाखोला तो सामने एक ढली उम्र के। पर अकड़ ऐसी जैसे किसी कमर्शियल फिल्म के हीरोहों।
‘कौन???' घरवाली ने गुस्सातेपूछा।
‘ मैं कबीर!' कबीर ने मुस्करातेहुए कहा तो मुझे अचानक किताबों वाले कबीर की याद आ गई।
‘कौन कबीर?? हम तो किसी कबीरकबूर को नहीं जानते।' घरवाली दरवाजा फेरने को हुई तो मैंने उससे कहा,‘ जरा रूको। आनेदो इन्हें भीतर। तुम भीतर जाओ।' कबीर वैसे ही मुस्कराते हुए मेरे पास आ गए।
‘पहचाना??'
‘ अगर मैं गलत नहोऊं तो आप किताबों वाले कबीर ही हो न??'
‘ अरे वाह! मान गएउस्ताद! ऐसी धक्कमपेल जिंदगी में भी अपनी मेमोरी को बनाए हुए हो।'
‘ तो यहां कैसेआना हुआ??'
‘तुम्हारे मुहल्लेसे एक श्रद्धालु लाउडस्पीकर से बांग दे रहा था। ऊपर कान फट गए तो चला आया उसेसमझाने।'
‘ आपकी पंगे लेनेकी आदत ऊपर भी नहीं गई??'
‘क्या करूं भाई।आदत कैसे बदलूं?'
‘ तो क्या कहाउसने?'
‘ कहता क्या!बोला- जब बगल वालों को ही आब्जेक्शन नहीं तो तुम कौन होते हो परेशान होने वाले?'
‘ तो भगवान कोबिना लाउउस्पीकर के ही बुला लेते। पहले ही क्या यहां पर ध्वनि प्रदूषण कम है जोअब तुम भी․․․․'
‘तभी तो लाउडस्पीकरसे बुला रहा हूं। इतने शोरशराबे में उस तक मेरी बिन लाउडस्पीकर के आवाज क्यापहुंच जाएगी?बिनालाउडस्पीकर के तो बगल वाला बंदा तक नहीं सुन पाता और वह तो स्वर्ग में बैठा है।'
‘तो ??'
‘तो क्या बंदेकी बात में दम था इसलिए पानी पानी हो चला आया।'
‘पर आप तो आजतकसभी को पानी पानी करते आए थे।' मैंने कहा तो वे कुछ देर कुछ सोचते हुए चुप रहे। फिर सन्नाटाचीरते बाले,‘ये क्या??'
‘उपवास है।'
‘ तो???'
‘तो क्या ! अन्नका त्याग किया है आज का दिन।' मैंने अपने को महान धर्मात्मा के पद पर प्रतिष्ठित करतेहुए कहा तो वे पेट पकड़ कर हंसने लगे।
‘ इसमें हंसने कीक्या बात है?चार केलेमुंह में ठूंसने के बाद मैंने दूध का गिलास मुंह में उड़ेलते पूछा।
‘एक बात बताओ?? मुझे कितना पढ़ा??'
‘ आपको लेकर ही तोपीएच․डी. की है। प्रोफेसर रिटायर हुआ हूं।'
‘झूठ! सफेद झूठ!!मुझको लेकर पीएच․डी करते तो कम से कम मंदी के इस दौर में दस रूपए की चारचपातियां छोड़ सौ रूपए के फल न तोड़ते। मुझको लेकर ही पीएच․डी. की थी याकिसी और पर मुझे फिट कर दिया था?'
‘ मतलब!!' मैं चौंका।
‘ देखो एक्सशोधार्थी। आज शोध के नाम पर फिटिंग ही तो चल रही है। कबीर को तुलसी पर फिट कर दोतुलसी को अज्ञेय पर। अज्ञेय को निराला पर फिट कर दो निराला को भारती पर और हो गईपीएच․डी।'
‘पर कबीर साहब!किताबों से पेट तो नहीं भरता न! पेट के लिए तो……' मैं आगे कुछ कहने के बदले चुप हो गया।
‘तो कौन कहता हैउपवास रखने को?यार पढ़ेलिखे हो। सबकुछ करो ,पर उपवास के साथ उपहास तो मत करो। जो करो, मन से करो।'
‘पर आज मन यहांहै किसके पास??'फिर कुछदेर तक मेरी पीठ थपथपाने के बाद बोले,‘ कबीर हूं न, सो चुप रहा नहींजाता तो नहीं रहा जाता। तुम आम आदमी तो हो नहीं, बुद्धिजीवी हो।पर इस समाज का कुछ नहीं हो सकता। एक कबीर तो क्या, लाख कबीर भी आजाएं तो भी नहीं।' कह वे मुंह सा बनाते उठने को हुए तो मैंने आधा सिर झुकाएपूछा,‘ कबीर, मछली तो मछली है, क्या छोटी,क्या बड़ी! देशआजाद है। सभी को खाने का पूरा हक है। मन मार कर सदियों तक बड़े जिए। अब तो खुलकरजीने दो न․․․․․ कहां जा रहे हो?'
‘कहां जाऊंगा? कबीर को तो इससंसार में जगह ही जगह है।‘ कह वे उठे तो मैंने चैन की सांस लेते घरवाली से पूछा,‘ चाय को पानी तोनहीं रखा था ?'
‘ नहीं, सोच रही थी वेजाने का नाम लेते तो चाय को पानी रखने का नाटक करती।'
‘भगवान ऐसीघरवाली सबको दे। अंदर से थोड़े से काजू और लाना ।' मैंने भगवान कानाम लिया और दो केले पलक झपकते डकार गया। अब पेट कुछ भरा भरा लग रहा है। सच कहताहूं उपवास वाले दिन तो पेट मुआ भरने का नाम ही नहीं लेता। पेट भरने का कोई शानदारतरीका हो तो प्लीज लिख भेजिएगा। तहेदिल से पूरे देशवासी आपके शुक्रगुजार रहेंगे।
हम तोसाहब उपवास इसलिए रख लेते हैं कि इस बहाने हफ्ते में कम से कम एक दिन तो भरपेट फलफ्रूट खाने को नसीब हो जाते हैं। उपवास तो मात्र एक बहाना है। असल में उपवास केनाम पर चपाती छोड़ डटकर मेवे सेवे खाना है। रोज रोज चपाती खा खाकर आपका मन नहींउकता जाता?मेरा तोउकता जाता है और उसका सबसे सरल रास्ता है कि हफ्ते में एक दिन उपवास।
कल भीमेरे उपवास था। थाली में आठ दस केले काट कर भगवान के नाम पर रखे हुए थे। साथ मेंचार सेब। पोता दूर से सेबों को देख घूर रहा था। पर घरवाली ने उसे भगा दिया,‘ बहू! कहां हो ।पोते को परे ले जाओ। देखती नहीं तुम्हारे ससुर जी के उपवास है। बेचारों ने सुबहसे कुछ खाया नहीं।' पोता बहू की गोद में जा केलों की थाली को टुकुर टुकुर देखतारहा। पर मेरी हिम्मत उसे केले का एक टुकड़ा देने की नहीं पड़ी तो नहीं पड़ी।
अभी थालीमें से एक केले का टुकड़ा उठाया ही था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। घरवाली ने दरवाजाखोला तो सामने एक ढली उम्र के। पर अकड़ ऐसी जैसे किसी कमर्शियल फिल्म के हीरोहों।
‘कौन???' घरवाली ने गुस्सातेपूछा।
‘ मैं कबीर!' कबीर ने मुस्करातेहुए कहा तो मुझे अचानक किताबों वाले कबीर की याद आ गई।
‘कौन कबीर?? हम तो किसी कबीरकबूर को नहीं जानते।' घरवाली दरवाजा फेरने को हुई तो मैंने उससे कहा,‘ जरा रूको। आनेदो इन्हें भीतर। तुम भीतर जाओ।' कबीर वैसे ही मुस्कराते हुए मेरे पास आ गए।
‘पहचाना??'
‘ अगर मैं गलत नहोऊं तो आप किताबों वाले कबीर ही हो न??'
‘ अरे वाह! मान गएउस्ताद! ऐसी धक्कमपेल जिंदगी में भी अपनी मेमोरी को बनाए हुए हो।'
‘ तो यहां कैसेआना हुआ??'
‘तुम्हारे मुहल्लेसे एक श्रद्धालु लाउडस्पीकर से बांग दे रहा था। ऊपर कान फट गए तो चला आया उसेसमझाने।'
‘ आपकी पंगे लेनेकी आदत ऊपर भी नहीं गई??'
‘क्या करूं भाई।आदत कैसे बदलूं?'
‘ तो क्या कहाउसने?'
‘ कहता क्या!बोला- जब बगल वालों को ही आब्जेक्शन नहीं तो तुम कौन होते हो परेशान होने वाले?'
‘ तो भगवान कोबिना लाउउस्पीकर के ही बुला लेते। पहले ही क्या यहां पर ध्वनि प्रदूषण कम है जोअब तुम भी․․․․'
‘तभी तो लाउडस्पीकरसे बुला रहा हूं। इतने शोरशराबे में उस तक मेरी बिन लाउडस्पीकर के आवाज क्यापहुंच जाएगी?बिनालाउडस्पीकर के तो बगल वाला बंदा तक नहीं सुन पाता और वह तो स्वर्ग में बैठा है।'
‘तो ??'
‘तो क्या बंदेकी बात में दम था इसलिए पानी पानी हो चला आया।'
‘पर आप तो आजतकसभी को पानी पानी करते आए थे।' मैंने कहा तो वे कुछ देर कुछ सोचते हुए चुप रहे। फिर सन्नाटाचीरते बाले,‘ये क्या??'
‘उपवास है।'
‘ तो???'
‘तो क्या ! अन्नका त्याग किया है आज का दिन।' मैंने अपने को महान धर्मात्मा के पद पर प्रतिष्ठित करतेहुए कहा तो वे पेट पकड़ कर हंसने लगे।
‘ इसमें हंसने कीक्या बात है?चार केलेमुंह में ठूंसने के बाद मैंने दूध का गिलास मुंह में उड़ेलते पूछा।
‘एक बात बताओ?? मुझे कितना पढ़ा??'
‘ आपको लेकर ही तोपीएच․डी. की है। प्रोफेसर रिटायर हुआ हूं।'
‘झूठ! सफेद झूठ!!मुझको लेकर पीएच․डी करते तो कम से कम मंदी के इस दौर में दस रूपए की चारचपातियां छोड़ सौ रूपए के फल न तोड़ते। मुझको लेकर ही पीएच․डी. की थी याकिसी और पर मुझे फिट कर दिया था?'
‘ मतलब!!' मैं चौंका।
‘ देखो एक्सशोधार्थी। आज शोध के नाम पर फिटिंग ही तो चल रही है। कबीर को तुलसी पर फिट कर दोतुलसी को अज्ञेय पर। अज्ञेय को निराला पर फिट कर दो निराला को भारती पर और हो गईपीएच․डी।'
‘पर कबीर साहब!किताबों से पेट तो नहीं भरता न! पेट के लिए तो……' मैं आगे कुछ कहने के बदले चुप हो गया।
‘तो कौन कहता हैउपवास रखने को?यार पढ़ेलिखे हो। सबकुछ करो ,पर उपवास के साथ उपहास तो मत करो। जो करो, मन से करो।'
‘पर आज मन यहांहै किसके पास??'फिर कुछदेर तक मेरी पीठ थपथपाने के बाद बोले,‘ कबीर हूं न, सो चुप रहा नहींजाता तो नहीं रहा जाता। तुम आम आदमी तो हो नहीं, बुद्धिजीवी हो।पर इस समाज का कुछ नहीं हो सकता। एक कबीर तो क्या, लाख कबीर भी आजाएं तो भी नहीं।' कह वे मुंह सा बनाते उठने को हुए तो मैंने आधा सिर झुकाएपूछा,‘ कबीर, मछली तो मछली है, क्या छोटी,क्या बड़ी! देशआजाद है। सभी को खाने का पूरा हक है। मन मार कर सदियों तक बड़े जिए। अब तो खुलकरजीने दो न․․․․․ कहां जा रहे हो?'
‘कहां जाऊंगा? कबीर को तो इससंसार में जगह ही जगह है।‘ कह वे उठे तो मैंने चैन की सांस लेते घरवाली से पूछा,‘ चाय को पानी तोनहीं रखा था ?'
‘ नहीं, सोच रही थी वेजाने का नाम लेते तो चाय को पानी रखने का नाटक करती।'
‘भगवान ऐसीघरवाली सबको दे। अंदर से थोड़े से काजू और लाना ।' मैंने भगवान कानाम लिया और दो केले पलक झपकते डकार गया। अब पेट कुछ भरा भरा लग रहा है। सच कहताहूं उपवास वाले दिन तो पेट मुआ भरने का नाम ही नहीं लेता। पेट भरने का कोई शानदारतरीका हो तो प्लीज लिख भेजिएगा। तहेदिल से पूरे देशवासी आपके शुक्रगुजार रहेंगे।