सवर्ण देवता दलित देवता [कहानी] - एस आर हरनोट

मैं तकरीबन आधी रात को लौट आया। यह लौटना अत्यन्त तकलीफ देह और अप्रत्याशित था। मेरे पास न तो कोई रोशनी का प्रबन्ध था और न ही किसी घर से रोशनी मांगने की होश ही रही। विचलित मन। आक्रोश और भय से मिश्रित। चार-पांच किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद सीधे रास्ते में पहुंचा तो पीछे देखा। आश्चर्य हुआ कि इतने गहरे अन्धेरे में पांव न लगी पगडंडी से मैं कैसे आ गया। कन्धे पर हाथ गया। फिर दांईं तरफ नीचे लटके झोले की डोरों से सरकता हुआ भीतर तक। ऊपर पट्टु था। उसके नीचे झोली में शहनाई। इसी का डर था कि कहीं हड़बड़ी और गुस्से में शहनाई को ही तो नहीं भूल आया। 

मैं अंधेरे में एक जगह खड़ा हो गया। दूर-पार घाटियों की तराइयों में नजर गई। छितराए घरों में कहीं-कहीं रोशनी टिमटिमाती और बुझ जाती। जुगनुओं की तरह। आसमान की तरफ ध्यान गया। सिर के बिल्कुल ऊपर से आकाश गंगा ने एक लम्बा चौड़ा रास्ता बना लिया था। दादी की कई कहानियां याद आईं और बिजली की लपलपाहट की मानिंद अंधेरे में लुप्त हो गईं। लगा जैसे बाहर के अन्धेरे से मन का अन्धेरा कहीं गहरा है। इधर-उधर देखते ही डर भी लगता। कई बार तो किसी झाड़ी, चट्टान या झुरमुट पर नजर पड़ती तो आभास होता कि कोई जानवर बैठा मेरी तरफ सरकता आ रहा है। अभी मुझ पर झपट पड़ेगा। कभी महसूस होता कि वही आकृति अंधेरे में ऊपर की तरफ उठ रही है जिसका न कोई सिर है न पैर। कोई भूत तो नहीं....? सोच कर बदन कांपने लग जाता। 

रचनाकार परिचय:-


श्री एस.आर. हरनोट का जन्म जनवरी, 1955 में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिल की पिछड़ी पंचायत व गाँव चनावग में हुआ। बी.ए. ऑनर्ज़ एम.ए.(हिन्दी), पत्रकारिता, लोक-सम्पर्क एवं प्रचार-प्रसार में उपाधि पत्र प्राप्त करने वाले श्री हरनोट प्रदेश तथा देश से प्रकाशित होने वाले हिन्दी के समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में इतिहास, संस्कृति, लोक जीवन और विविध विषयों पर नियमित लेखन करते रहे हैं। इनकी कहानियाँ कई संपादित संग्रहों में शामिल हो चुकी हैं तथा अंग्रेजी, मराठी, कन्नड़, पंजाबी और गुजराती, तेलगू सहित कई अन्य भाषाओं में इनकी कहानियों के अनुवाद भी प्रकाशित हुये हैं। अब तक इनके कई कहानी संग्रह, "हिडिम्ब" नामक उपन्यास, हिमाचल प्रदेश के मंदिरों व लोक-कथाओं पर एक शोध तथा एक यात्रा-संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं। 

"दारोश तथा अन्य कहानियाँ" कहानी-संग्रह के लिये इन्हें २००३ का अंतर्राष्ट्रीय इंदु-शर्मा कथा सम्मान तथा २००७ में हिमाचल राज्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। इसके अतिरिक्त इन्हें अखिल भारतीय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एवार्ड, हिमाचल गौरव सम्मान व हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा साहित्य सम्मान सहित कई अन्य सम्मान और पुरुस्कार भी मिल चुके हैं। 

वर्तमान में आप हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम में अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
हल्की सी आहट हुई। सचमुच कोई छोटा जानवर मेरे होने के एहसास को परखता या अपने आप में भयाक्रान्त नीचे कूदा था। मेरे दांत बैठ गए। दंदकुशकें बट गईं। मुंह खोलने का प्रयास किया पर खुला नहीं। जीभ कहीं तालू में फंसती महसूस हुई। शरीर में ऐसी सिहरन हुई मानो किसी ने सिर पर ठंडे पानी का घड़ा उड़ेल दिया हो। उसके बाद एक अजीब सी गंध नाक में पसर गई। पिता की बात याद आ गई। वे बताया करते कि आधी रात को यदि मर्द कहीं रास्ते में अकेला चल रहा हो तो उसका साथ बाघ देता है। उससे डरना नहीं चाहिए। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ था। पहले तो बाघ की कल्पना मात्र से पानी-पानी हो गया। लेकिन साथ देने की बात ने मन में एक भरोसा भी पैदा कर दिया। एकदम मुंह से देवता का नाम निकला......। भय ने देवता की अचानक याद दिला दी। 

गांव अब कुछ दूरी पर था। इतनी रात घर पहुंचूंगा तो पिता क्या कहेंगे? मां और दादी क्या सोचेगी? इसका ख्याल करते-करते एक जगह विवशत: चट्टान पर बैठ गया। जगह खुली थी। तारों की संयुक्त झिलमिलाहट ने आंखों का अंधकार कुछ कम कर दिया था। बैठते ही ठंडी हवा के स्पर्श ने मन को थोड़ा हल्का किया। माथे और मुंह पर सिकुड़न सी हुई। पसीना सूखने की चिपचिपाहट। कुछ इसी तरह पूरे शरीर में भी महसूस हुई। एक ही सांस में इतना रास्ता तय करने के बाद जो गर्माहट और खुलापन शरीर में था वह कम होने लगा। सर्दी से बचने के लिए झोले से पट्टु निकालकर ओढ़ लिया।  
पिछली शाम लीला दास शर्मा के यहां देवता गया था। उसने अपनी किसी मन्नत पूरी होने पर देव जातर मानी थी। उसके यहां दो और देवताओं के रथ भी आए थे। यानी तीन देवताओं की जातर थी। मुझे पिता ने पहली बार देवता के साथ भेजा था। उनका अब यह विचार था कि मैं ही देवता की कार निभाता रहूं। सेवा करता रहूं। मुझे अब आठवीं के बाद पढ़ाने का भी मन न था। जबकि मैं आगे पढ़ना चाहता था। पिता होश संभालते ही देवता की सेवा में लग गए थे। देवता के साथ रहते हुए हर अच्छे-बुरे को सहा, लेकिन कभी जुबान नहीं खोली। न ही कभी कुछ घर में बताया। उनका काम देवता के बजंतरियों (वादकों) के साथ शहनाई बजाने का था।  

वे गांव-परगने में शहनाई के माहिर थे। उन जैसा शहनाईया हरिजन बिरादरी में कोई दूसरा न था। देवता के साथ ही नहीं बल्कि शादी-ब्याह में भी उन्हें दूर-दूर तक लोग ले जाते थे। पैसे की भी उनकी ज्यादा मांग नहीं रहती। जिसने जो दे दिया सिर-माथे। न कोई लालच न ही किसी चीज की अधिक चाहत। बस लोगों के मुंह से बड़ाई के दो बोल सुन कर ही खुश हो जाते कि वह एक काबिल और बेजोड़ शहनाई मास्टर है। लोग तारीफों के पुल बांधते तो वह ध्याड़ी तो क्या रोटी खाना भी भूल जाते। सचमुच ईश्वर ने उन्हें इस कला में खूब पारंगत भी बनाया था। वे इसे मां सरस्वती की कृपा मानते। देवता का आशीर्वाद मानते.....और मन से सेवा में लगे रहते। 

उनकी इच्छा थी कि मुझे अपनी तरह कलाकार बनाएं। एक अच्छा और बेहतर शहनाई मास्टर। लेकिन मेरा उस तरफ कोई ध्यान नहीं था। मैं अक्सर उन्हें निवेदन करता कि मुझे कम से कम दस तो पढ़वा दें। गांव में आठवीं तक का ही स्कूल था। दसवीं के लिए बहुत दूर जाना पड़ता था। लेकिन गरीबी के कारण उनकी हैसियत इसका दायित्व लेने की नहीं थी। मन से वे चाहते भी थे कि मुझे खूब पढ़ाएं-लिखाएं, लेकिन कई कारणों से वे टालते गए। एक कारण शायद गांव के सवर्णों का दबाव भी था। गरीबी का कारण तो समझ आता था जिसे मैं भी मानता था। लेकिन दूसरी बात मेरे गले कभी नहीं उतरी। फिर उस गांव में शायद मैं पहला दलित लड़का था जिसने आठवीं प्रथम श्रेणी में पास की थी। मैं बोर्ड की परीक्षा में अपने जिले में भी प्रथम आया था। जबकि मेरे साथ सवर्णों के कई लड़के फेल हो गए थे। 

शहनाई बजाने का कोई शौक भी न था। कभी-कभार स्कूलों के कार्यक्रमों में बांसुरी और शहनाई अवश्य बजाया करता। मुझे कोई खास स्वरज्ञान भी न था। न ही तालों की समझ। फिर भी मैं बहुत अच्छी शहनाई बजा लेता और पिता उस स्कूली शौक में मेरे भीतर अपना कलाकार तलाशने लगते। कई टूर्नामैंटों में मुझे इनाम भी मिले थे। वे इसमें होनहार बिरवान के होत चिकने पात वाली बात देखने लगे थे।  

हालांकि मैं पिता जी का बहुत आदर करता था पर हमारे बीच अक्सर झड़पें हो जाया करतीं। उनका गांव के ब्राह्मणों और ठाकुरों के प्रति अतिरिक्त आदर इसका मुख्य कारण था। बचपन से होश संभालने तक मेरे साथ कई घटनाएं ऐसी घटी थीं जिन्होंने मेरे मन में नफरत के बीज रोपित कर दिए थे। एक घटना तो बार-बार आंखों के सामने आ जाती और पिता जब भी मुझ से कोई बात करते तो वह दीवार बन कर हमारे मध्य खड़ी हो जाया करती।  

जब मैं पांचवीं में पढ़ता था एक दिन उनके साथ देवता के मन्दिर चला गया। शायद सक्रान्त का दिन था। उस रोज गांव-परगने के इलावा दूर-दूर से भी लोग पंची-पंचायत करने पहुंचे होते। उनमें ज्यादातर वे लोग होते जो अपने और अपने परिवार को भूत-परेतों द्वारा परेशान किया बताते और देवता से उसे भगाने की फरियाद करते। साथ ही अपनी गाय-भैंसों के लिए भी रक्षा के चावल लेते। कई बार तो लोग अपने सिर और पेट तक की दर्द के निवारण के लिए देवता के पास गुहार लगा देते।  

देवता की पंचायत एक विशेष कार्यक्रम के आयोजन से होती। समय दोपहर बाद का रहता। बजंतरी देवता के सारे वाद्य बजाते। उनके साथ पिता शहनाई बजाते। जब वाद्यों का बजना उत्कर्ष पर होता तो मुख्य गूर (देवता का प्रतिनिधि जिसके द्वारा देवता बोलता है) में हल्की-हल्की कंपन होने लगती। कुछ देर बाद उसका पूरा शरीर कांप जाता। फिर वह झटके से सिर हिला देता। उसकी टोपी गिर जाती और औरतों की तरह रखे लम्बे बाल बिखर जाते। वाद्य बजते रहते। गूर का शरीर अब पूरी तरह देवछाया के वश में हो जाता। उसकी आंखों में खून तैरने लगता। चेहरा काला हो जाता। इसके बाद दूसरे सहायक देवताओं के गूरों में भी अलग-अलग देवता प्रवेश करते और वे भी पूरी तरह कांपने लग जाते। उनके हाथों में लोहे के विशेष शंगल होते। वे उन्हें कांपते हाथों में पकड़ते, हिलाते रहते और अपनी पीठ पर मारते रहते। यह क्रिया तीन या पांच बार की होती। जमीन पर मुंह लगाकर जोर से किलकें देते, लम्बी हू की आवाज करते।  

फिर मुख्य देवता का गूर जमीन पर जोर से अपना हाथ मारता और कहता......"रख्खे......"। इसका मतलब होता "रक्षा" ....और इसी के साथ दूसरे गूर भी वैसा ही करते। देवता के इस आयोजन को नियंत्रित करने के लिए पांच पंच आसपास बैठे होते। अब बारी-बारी लोग आते और अपनी पंची-पंचायत करवाते। अपनी समस्या बताते। मुख्य गूर उनका दु:ख-दर्द सुनता और उपाय बताने लगता। समस्याओं के निवारण के समाधान देवता कम और पंच कुछ ज्यादा ही बता देते। इनमें देवता की जातर और मन्दिर के पास बकरे की चढ़त और उसकी देवता के लिए बलि देने जैसे उपाय मुख्य रहते।  
उस दिन जब पंची-पंचायत समाप्त हुई तो पता नहीं मुझे क्या सूझी। जाने-अनजाने मन्दिर की एक सीढ़ी पर बैठ गया। पुजारी की नजर पड़ी तो आग-बबूला हो गया। भागता हुआ आया और मेरे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया। फिर बांह से पकड़ा। घसीटते हुए मुझे पिता के पास फेंक दिया। पिता द्वारा बजाए इसका विरोध करने के एक और तमाचा मेरे मुंह पर जड़ दिया। मैं रोता हुआ चला आया, पर वे तमाचे मेरे मन पर स्थायी रूप से घर कर गए। यह बात भी गांव-बेड़ में फैल गई थी कि शहनाईए का लड़का बड़ा कमजात है। इस घटना का प्रभाव कुछ ऐसा हुआ कि मैं अब ब्राह्मणें के बच्चों तक से स्कूल में नफरत करता और गाहे-बगाए उन्हें तंग भी करता। उनके बच्चे तो मुझे जाति के नाम से पुकारते और भद्दी गालियां भी देते रहते। 

एक दिन पूजारी की दूसरी पत्नी, जो जवान और देखने में सुन्दर थी बांवड़ी से पानी लेकर आ रही थी। मैं भी घड़ा उठा कर पानी भरने जा रहा था। हमारा पगडंडी में एक जगह टाकरा हो गया। नीचे-ऊपर होने को कोई जगह नहीं थी। अब मुझे बहुत पीछ लौटना पड़ता। उसके बार-बार कहने पर भी मैं रास्ते में डटा रहा। उल्टा उसे ही पीछे जाने को कहता रहा। जब वह अड़ी रही तो मैं किनारे से आगे निकल गया। फिर क्या था उसने सिर पर उठाई पानी की टोकणी नीचे पटक दी और चिल्लाना शुरू कर दिया। मुझ से रहा नहीं गया। उसके पास आया और प्यार से पूछ लिया, "छोटी पंडताणी, पहले तू एक बात तो बता? मैं तो तेरे में छूआ तक नहीं और तैने इतनी गाली-गलौज शुरू कर दी। उस दिन जो तू अपनी गौशाला के पिछवाड़े जगरू लुहार के लड़के की टांगों के बीच नंगी पड़ी थी, उससे तो तेरे को छोत लगी ही नहीं..?" ढोल की पोल खुल गई। चेहरा तमतमा गया था उसका। इतनी बड़ी बात वह सहती भी कैसे। गांव में फैल गई तो क्या मुंह दिखाएगी। जैसे-कैसे बचाव जरूरी था। उसने रास्ते में गिराई टोकणी अब खेतों से नीचे फैंक दी थी और चिल्लाती घर चली गई। पूजारी से शिकायत लगा दी कि शहनाईए के लड़के ने उसका पानी तो छुआ ही पर हाथापाई भी कर दी। बात पिता तक पहुंची। उस दिन तो मेरी जो धुनाई हुई उसकी दर्दें आज भी महसूस होती हैं।  

अब तो आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते मैं कई बार पिता को भी सीख देने लगा था कि वे इनकी इतनी आव-भगत न किया करें। बस पिता इसी बात से चिढ़ जाते। उनको मेरी यही एक बात पसन्द नहीं थी। मैंने अपने आप को पिता की खातिर काफी बदल दिया था परन्तु मन के घाव कभी नहीं भरे। 

पिता कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। इसी बीच गांव के देवता की जातर का कार्यक्रम बन गया। पिता को बीमारी ने कमजोर भी बना दिया था। उनका सांस भी फूल जाता। इसलिए शहनाई बजाने में उन्हें काफी तकलीफ होती थी। लेकिन देवता के साथ जाने की कार तोड़ना भी मुमकिन न था। जातराओं के लिए तो देवता के साथ तकरीबन हर घर से एक आदमी का जाना जरूरी होता। उसे कोई न कोई काम पहले से ही सौंपा हुआ होता। इस तरह के काम दलित परिवारों के लिए ज्यादा होते। .........और देवता के नाम से कार निभाने के लिए बलि का बकरा आज मैं बन गया था। मुझे न चाहते हुए भी जाना पड़ा।  

देवता की कोठी के पास जब मैं पहुंचा तो पूजारी ने पिता के न आने का कारण पूछा। मेरे बताने पर वह कुछ परेशान हो गया। लेकिन जब मैंने बताया कि आज मैं शहनाई बजाने के काम के लिए आया हूं तो वह विस्मित होकर मुझे देखने लगा। मेरी बिरादरी के कुछ लोगों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि लड़का अच्छी शहनाई बजाता है तो वह कुछ न बोला। मैं यह बखूबी समझता था कि मेरा आना उसे अखर रहा था। शायद कहीं उसके मन में यह बात भी उठी होगी कि अच्छा ही है आगे पढ़ने के बजाए मैं शहनाई बजाने का ही काम करूं। इसीलिए कुछ देर के बाद बोलचाल में परिवर्तन हो गया और वह अच्छी बातें करने लगा। पूजारी और देवता के अन्य कारदार अब मुझे एक छोटे शहनाई मास्टर के रूप में देखने लगे थे। कइयों ने तो मुंह पर ही तारीफों के पुल बान्ध दिए। इनमें पूजारी से लेकर देवता के पंचों तक थे। उनके चेहरे पर शायद इस बात की अब कुछ ज्यादा खुशी थी कि पढ़ने के बजाए मैं उन्हीं के बजंतरियों के बीच शहनाई फूंका करूंगा।  

पिता ने मुझे शहनाई बजाने के कुछ गुर भी बता दिए। मसलन जब देवता का रथ मन्दिर से बाहर निकले तो शहनाई में यह गाना बजाना चाहिए। देवता चलने लगे तो वह गीत। देवता की जातर होने लगे और देवता नाचे तो वह धुन तथा जब देवता का हिंगर-हिंगराव यानी पंची-पंचायत हो तो फलां गाना बचाना चाहिए। मेरे लिए यह कोई मुश्किल का काम नहीं था। 
उस घने अंधेरे में बैठे-बैठे मैं वर्तमान से लेकर अतीत की परतों को कुरेदने में उलझ गया था। आज देवता की कार निभाने का पहला दिन और इस तरह का हंगामा? सोच कर ही मैं परेशान हो रहा था। सचमुच देवता की पंचायत जो सजा दे वह तो माननी ही पड़ेगी पर पिता की डांट को सहना मेरे लिए असंभव जान पड़ता। उन्होंने कितनी उम्मीद और विश्वास से मुझे देवता के साथ भेजा था। पर जब उन्हें पता चलेगा कि उनका बेटा पहली बार में ही अपनी करतूत के झण्डे इस तरह गाड़ कर लौटा है तो वह न केवल भीतर तक आहत और अपमानित होंगे बल्कि अब उनका यह विश्वास भी पक्का हो जाएगा कि मैं कभी नहीं सुधर सकता। .....और उनकी बनी-बनाई इज्जत-परतीत को निश्चित तौर से खाई में डाल दूंगा। 

पता नहीं क्यों लीला दास शर्मा के घर देवता पहुंचने के बाद से ही मेरा मन उखड़ा-उखड़ा सा था। हमारे बैठने के लिए आंगन के नीचे खेतों में जहां जगह दी गई वहां कोई अच्छा इंतजाम नहीं था। हालांकि खेत बड़ा था। उसमें पीछे की तरफ छोटा सा तरपाल बांस के डंडों पर लटका दिया था। देवता के रथ रखने और पूजारी, गूर तथा पंचों इत्यादि के लिए अच्छी जगह बनाई थी। उनके लिए बेहतर प्रबन्ध था। हमारी बिरादरी के लोगों के लिए प्राल (पुआल) बिछाई गई थी लेकिन ऊपर कुछ भी नहीं था। न आग ही का कोई इंतजाम था। नवम्बर का महीना था। हमारे पास सर्दी के बचाव के लिए पर्याप्त कपड़े भी न थे। रात भर की ठंड, ऊपर गिरती ओस और पाला, सोच कर ही मैं सिहरने लगा था। 

देवता की पूजा के बाद हम काफी देर तक इस आस में नौबत बजाते रहे कि हमारे लिए कुछ कपड़ों और आग का प्रबन्ध हो जाएगा। पर किसी ने बात तक न पूछी। हमने यह भी सुना था कि यहां की पंडित बिरादरी हरिजनों से कुछ ज्यादा ही नफरत करती है। उन्हें आंगन में भी नहीं मानते। हमारे देखते-देखते देवता के साथ आए सभी सवर्ण बिरादरी के लोगों को रजाईयां, कम्बल और अंगेठी में आग दे दी गई और हम सभी मुंह ताकते रह गए। सर्दी बहुत बढ़ रही थी। अब गुस्सा भी आने लगा था। मेरा गुस्सा लीला दास शर्मा पर कम और अपने देवता के कारदारों पर ज्यादा बढ़ता गया।  

इधर-उधर देखा। मेरे साथ के वादक अपने-अपने वाद्यों की ओट में पट्टु की बुक्कल मारे सो गए थे। पहले सोचा कि जैसे-कैसे रात काट ली जाए। पर मन की बेचैनी नहीं गई। मैंने रथ के साथ सोए पूजारी पर डाली दो रजाईयों में से एक खींची। वह हड़बड़ा कर उठ गया। पहले तो उसे कुछ नहीं सूझा। जब रजाई मेरे हाथ में देखी तो पगला गया। जोर-जोर से बकने लगा। उसकी चिल्लाहट सुन कर सभी उठ गए। जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो या किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी उन पर उड़ेल दी हो। हंगामा मच गया। उसका रुख मेरी तरफ था, "ओ छोकरे! तेरा दमाग खराब हो गया। दिखता नहीं तेरे को। यहां रथ रखा है। उसे छू दिया तैने। तेरी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की। और रजाई में हाथ लगाने की।"  

मैं इस अप्रत्याशित घटना का सामना करने के लिए कतई तैयार नहीं था। डांट मुझ पर किसी डंडे की तरह पड़ी। मैं कुछ संभलता, लीला दास शर्मा वहां टपक पड़ा। उसने आव देखा न ताव मुझ पर कुत्ते की तरह झपटा, "सालों ने आठ जमात क्या पास कर ली, आसमान में चढ़ने लग गए। तेरे को दिखता नहीं कि नई रजाईयां हैं। तेरे छूने के बाद मैं इन्हें कहां डालूंगा।"  

उसे देवता के रथ की चिन्ता कम और अपनी रजाईयों का फिक्र अधिक था। अब चारों तरफ से गालियों की बौछार होने लगी थी। जितने मुंह उतनी बातें। मेरे साथ जो ढोलिया, नगारची, एक-दो दलित गूर, करनालची इत्यादि थे वे सहमे हुए पीछे खड़े हो गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। 

देवता का एक पंच पंडित नारायणू पता नहीं कब उठा और सीधा मुझ पर टूट गया। उसने जैसे ही थप्पड़ मारने को हाथ उठाया मैंने वहीं रोक दिया। झटका इतना तेज था कि वह बांस की कनात से टकराया और ऊपर लगा तरपाल नीचे गिर गया। किसी ने इतना सोचा भी न था कि बात हाथापाई तक आ जाएगी। इससे सारे ब्राह्मण संभल गए। गालियों की जो झड़ी लगी थी वह कुछ थम गई। जो उछलकर मेरी तरफ आ रहे थे वह काफी पीछे चले गए। मेरा चुप रहना मुमकिन नहीं था। मैं कुछ दूर खड़े लीला दास शर्मा के पास गया और उससे सीधे-सीधे पूछा, "पंडत! जितनी गालियां तुमने मेरे को दी वह तो मैंने सहन कर ली। लेकिन मेरी एक बात का जवाब तू दे दे। तू ही क्यों देवता के साथ जो ये पूजारी और पंच आए हैं इनसे भी मैं पूछता हूं कि क्या ठंड बामणों और कनैतों को ही लगती है या कि कोली-चमारों को भी। खुद तो तुम दो-दो रजाईयां लेकर खराटे मारने लग गए और हम लोगों को बैठने के लिए पूरा प्राल भी नहीं। हमारे में भी ऐसा ही दिल है, प्राण है जैसे तुम लोगों में हैं। हमारे पूजारी और पंचों को तो शर्म है नहीं लेकिन पंडित तेरे तो बड़ा कारज है। तीन-तीन देवताओं की जातरा है, तेरे को तो समझ चाहिए थी कि देवता के साथ बाहर की बिरादरी के भी लोग हैं। इस सर्दी में उन्हें भी तो रात काटनी है।"  

मुझे खुद पता नहीं चला कि मैं इतना कुछ कैसे बोल गया। वहां तीनों देवताओं के साथ आए लोग एकत्र हो गए थे। उसका घर दो मंजिला था। उसके साथ दो-तीन और घर थे। शोर सुनकर घरों की औरतें और बच्चे खिड़कियों से झांक कर नीचे देख रहे थे। मर्द और छोकरे-छल्ले आंगन की मुंडेर पर आकर खड़े हो गए। मैं घबरा भी गया था। कहीं सारे ब्राह्मण-कनैत इकट्ठे होकर मेरा हुलिया ही न बिगाड़ दे। अब वहां रुकना खतरे से खाली न था। क्योंकि मैं जानता था मेरे अपने लोग भी मेरा साथ नहीं देंगे। अपना सामान संभाला। मौका देख कर नीचे की तरफ पगडंडी से भागता हुआ सामने की चढ़ाई में चढ़ गया। कुछ छोकरे मेरे पीछे भागे लेकिन अंधेरे में वे अधिक दूर तक नहीं आ सके। बोलचाल अभी भी जारी था। वहां अभी भी हंगामा हो रहा था। जिसके मन में जो आता बकता जाता। 

दूर घाटी से गुजरती सड़क से कोई रात्रि बस सेवा गुजरी। मोड़ काटते हुए उसकी लाइट सीधी मेरे आसपास पड़ी तो मैं चौंक गया। एक पल तो पता ही नहीं चला कि क्या हुआ। दोबारा मोड़ काटते हुए जब उसकी रोशनी सीधी मेरे मुंह पर पड़ी तो मन सहज हुआ। माथे पर हाथ गया तो उंगलियां भीग गई। पसीने से तरबतर। नीचे बूंदें टपक रही थीं। हालांकि मुझे बैठे काफी समय हो गया था लेकिन उस घटना को याद करते हुए स्मृतियों में उसे पूरी तरह दोबारा जी लिया। 

धीरे से उठा। चलना शुरू किया। आसमान की तरफ पुन: नजर गई। आकाश गंगा उत्तर की तरफ चली गई थी। सप्तऋषि तारे पश्चिम की तरफ बढ़ रहे थे। एक बहुत बड़ा तारा चमकता दिखाई दिया। ध्रुव तारा। रात अभी भी काफी है मैंने सोचा। पर घर जाने से कतरा गया। कुछ दूर चलने के बाद फिर एक जगह बैठ गया। 

मेरे सामने कई चीजें एकाएक खड़ी हो गई। सबसे पहले जो बात मन में उठी वह देवता को लेकर थी। यह देवता आखिर है किसका? सवर्णों का या हम सभी का। सचमुच वह देवता है तो सभी का ही होगा। उसे न तो पूजारी या गूर ने कभी प्रत्यक्ष देखा और न ही सरपंचों या कारदारों ने। हमने भी नहीं देखा। बस एक परम्परा तय हुई, उसे पीठ पर उठाए नगाड़ों की तरह हम सभी ढोते चले गए। आज भी निभा रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी। लेकिन क्या इसमें एक खतरनाक साजिश नहीं रची गई ? 
सोचते हुए पहले तो मुझे सचमुच एक झटका सा लगा। मैं अंधेरे में खड़ा हो गया। आसपास कुछ नहीं था। मन का भ्रम........या देवता का डर..या इन तयशुदा परम्पराओं के विरुद्ध जाने का भय......। मस्तिष्क में कई बातें कौंधती रही। 

जिस देवता को छोड़ कर मैं आया हूं। वह तो उसके निशान मात्र है। रथ है। बहुत सुन्दर जिसे दो लम्बी कनातों पर बनाया गया है। कनातें चांदी से मढ़ी हैं। शिखर पर सोने का बड़ा छत्तर है। उसके नीचे मुख्य देवता का एक सोने का मोहरा (देवता का काल्पनिक चेहरा) है। साथ कई सहायक देवता हैं........उसी की तरह बड़ी देहरी के, जिनके मोहरे चांदी और पीतल के हैं। एक मूर्ति याक के बालों के नीचे ढकी रहती है। बताते हैं कि वह किसी रकसीन यानी राक्षसी देवी की है। उसे खुली रखे तो उत्पात मचा देती है। उसकी जिधर भी नजर पड़ी सब कुछ वहीं ढेर। बस सुना है, होते किसी ने कुछ नहीं देखा। चारों तरफ चार छत्त्तर। चादीं से बने हुए। चारों तरफ चांदी की गाची यानी चौड़ी पट्टी है। उस पर गूर और पूजारी के नाम खुदे हैं........जैसे देवता उन्हीं का है। उसमें जो चार-पांच किलो चांदी लगा है वह देवता के नाम का है, निजी तौर पर किसी का भी कुछ नहीं।  

पर देवता के भय से कोई कुछ नहीं कहता न पूछता। पूछे-टोके तो बागी। या देवता के खोट के प्रतिभागी। देवता नाराज तो कौन मनाए। आदमी हो तो सौ उपाए। सब कुछ सिर माथे। मुख्य देवता रथ पर चलता है। उसी में रहता है। उसी पर बैठता है। आलीशान कोठी है। दो मंजिली। जब जातरा नहीं होती, कोई मेला नहीं होता तो उस रथ को खोल दिया जाता है। उसके मोहरे भीतर बनी अट्टालिकाओं में रहते हैं। उनकी रोज पूजा होती है। सुबह-शाम। घी-दूध से। उसके लिए पूजारी नियुक्त है। ब्राहमण पूजारी। दूसरा नहीं हो सकता। देवता नहीं मानता? जब से गांव बसा, देवता आया तभी से एक ही खानदान से पूजारी देवता की सेवा में लगा है। पहले उसका पड़दादा। फिर दादा। उसके बाद वह खुद। आगे उसके बेटे। पोते और पड़पोते।  
मुख्य और सहायक देवताओं के इलावा कई दूसरे देवता भी हैं। हालांकि ये सभी उस देवता के अंगरक्षक या द्वारपाल है। उनकी न तो आलीशन कोठी हैं, न सोने-चांदी के मोहरे हैं। न कोई रथ है। न छत्तर है। न ही कोई पालकी।  

देवता के साथ तीन देवता प्रमुख हैं। इन्हें द्वारपाल कहते हैं। पहला गेट के पास रहता है। उसकी आदमकद काले पत्थर की मूर्ति है। किसी अच्छे कारीगर ने घड़ी है। नंगधड़ंग। कपड़े के नाम से महज लिंग ढका है। न कोई चौबारा है न सिर पर किसी तरह की छत। धारणा यह है कि वह न तो कपड़े पहनता है न मन्दिर में रहता है। उसे नंगापन पसन्द है। बाहर खुले आसमान के नीचे रहना अच्छा लगता है।  

दूसरे द्वारपाल की मूर्ति तक नहीं है। पूजारी बताता है कि उसे अपनी मूर्ति पसन्द नहीं। एक नुकीला लम्बा सा पत्थर जमीन में स्थापित है। चारों तरफ एक चबूतरा सा बनाया गया है। वहां कई लोहे के कड़ोले रखे हैं। उसी तरह के पहले द्वारपाल के गले में भी है। बाहों में भी है। आसपास भी है। 

तीसरे द्वारपाल की निशानी एक लोहे की गुरज है। मोटी लम्बी। उसे जमीन में गाड़ा गया है। 

इन द्वारपालों को सोना नहीं चढ़ता। दूध नहीं चढ़ता। घी के दिए नहीं जलाए जाते। चाहे ब्राह्मण हो या दलित, जब कोई मन्नत करते हैं तो उनकी हैसियत देख कर। यानी द्वारपालों को अनछाणा आटा लाएंगे। लोहे के कड़े वे भी अनगढ़े हुए। दिया जलाना हो तो सरसों के तेल का। उसके लिए भी शुद्ध सरसों का तेल नहीं खरीदेंगे। जो सबसे घटिया होगा, सस्ता होगा उसे ले आएंगे। उन्हे घी से बनी कढ़ाई भी नहीं दी जाएगी। भोग के नाम से कच्चे आटे के रोट। न गरी न चुहारे। न केसर न सुपारी। न ही कोई कपड़ा। कपड़ा जितना आएगा वह बड़े देवता के रथ के लिए। उसी को ही सोना, चांदी, दूध और घी। यानी जिसकी जैसी हैसियत वैसा चढ़ावा।  

इतना ही नहीं उनके लिए गूर भी उसी तरह के। मुख्य देवता का गूर ब्राहमण। उसका दर्जा भी उतना ही बड़ा। उतनी ही इज्जत-परतीत। ऊंचा आसन। और जो द्वारपाल यानी दूसरे सहायक देवता उनके गूर दलित। वैसे ही स्थान। उतनी ही इज्जत-परतीत। उतना जैसा बोलबाला। गूर होने पर भी मंदिर का बरामदा तक छू लें तो दंडित।  

बुजुर्ग बताते हैं कि गांव का मुख्य देवता हम सभी का इष्ट है। कुल देवता है। पर हमें कभी मन्दिर की दहलीज तक भी जाना नसीब नहीं। मन करता है कि भीतर जाकर हम भी घी का दिया जलाएं। धूप दें। बैठ कर उसकी पूजा करें, लेकिन हमारे लिए सब कुछ निषेद्ध। प्रतिबन्धित। बस दूर से हाथ जोड़ो और मन की मुराद पूरी। ज्यादा ही लोभ है तो बाहर बिठाए द्वारपालों के पास मथा टेको, रोट-आटा चढ़ाओ और मन्नतें मांग कर चलते बनो।  

देवताओं में भी दलित देवता.....? सवर्ण देवता.....? सवर्ण तो फटाफट सीढ़ियां ऐसे चढ़ेंगे जैसे ये देवता इन्हीं के टब्बर-बिरादरी से हैं। पर इसमें शंका भी क्या....? जिस अधिकार से जाते हैं होगा ही। दलितों के लिए तो द्वारपाल यानी दलित देवते बाहर नंगधड़ग खड़े हैं। सर्दी में भी। गर्मी में भी। पाला भी उन्हीं के ऊपर। आंधी-तूफान भी इन्हीं पर। न कपड़ा-न लत्ता। बस घटिया से लोहे की तारों से बनाए कड़ोले। एक चढ़ा दो तो बेचारे प्रसन्न। पर आलीशान कोठी में बसा मुख्य देवता तो नहीं लेगा न लोहे का कड़ोला। किसी की हिम्मत जो उसे चढ़ा दे। नहीं तो उम्र भर खोट-दोष का भागी।  
देवता की कथा याद आ रही है। पिता सुनाते हैं कई बार। गांव में देवता कैसे आया। मन्दिर कैसे बना। किसने पहली बार उसे देखा। एक रात एक तुरी यानी ढोल बजाने वाला ब्याह-शादी बजा कर अपने घर लौट रहा था। गांव से कुछ दूर पहुंचा तो झाड़ियों में किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी। वह पहले खड़ा रहा। आवाज बन्द हो गई। चलने लगा तो आवाज फिर आने लगी। पहले उसने सोचा कि कोई छल हो रहा होगा। लेकिन आवाज आदमी के कहराने की थी। उसने हिम्मत की और झाड़ियों के बीच चला गया। जमीन से आवाज सुनाई दी। एक जगह कुछ पत्थर पड़े थे। उसने पत्थर किनारे किए। आवाज फिर भी बन्द न हुई। ढोल बजाने की एक छट्टी निकाल कर जमीन कुरेदने लगा। कुछ देर बाद उंगलियां किसी चीज से टकराई। वहां उसे चिपचपाहट महसूस हुई। दियासिलाई जला कर देखा तो वह खून था। घबरा गया। चमत्कार....? पहले रुका। फिर हिम्मत बांध कर मिट्टी इधर-उधर करता गया। किसी कठोर चीज से हाथ टकराया। एक पत्थर की पिंडी थी जिससे खून बह रहा था। मफलर उसमें बांध दिया। कहराना बन्द हो गया। खून भी अब नहीं निकल रहा था। कुछ देर बाद घर आ गया। 

रात को उसे स्वप्न हुआ। एक आदमी सफेद घोड़े पर सवार आंगन में खड़ा है। माथे पर बड़ा सा तिलक। लम्बे बाल। बड़ी-बड़ी आंखें। घुटनों तक लटकती बाहें। सिर पर वही मफलर। निर्देश दे रहा है कि उसका मन्दिर उसी जगह बनाए। नहीं तो गांव का सर्वनाश। वह देवता है। महाभारत काल का देवता। पांडवों की तरफ से लड़ा था युद्ध में। गांव में बसना-रहना चाहता है। 

पहले भी कई घटनाएं घट चुकी थी। जहां तुरी को पिंडी मिली थी वहां सुई हुई गाए चली जातीं और खड़ी हो जाया करती। उनके थनों से स्वत: ही दूध चूने-गिरने लगता। गाय खाली थन लिए घर लौटतीं। गावों वाले कई दिनों से परेशान कि आखिर माजरा क्या है? 

जब दूसरे दिन तुरी ने गांव में बताया तो सभी उस तरफ चले गए। लोगों ने देखा कि एक गोल पिंडी काफी बाहर निकल गई है और तुरी का मफलर भी उस पर बंधा है। उसके बाद गांव के लोगों ने वहां मंदिर बनाया। गर्भगृह में वही पिंडी स्थापित की। उस देवता की छाया भी उसी तुरी में आई। कई बरसों तक वह गूर रहा पर उसके मरने के बाद पता नहीं कैसे मन्दिर पर सवर्णों का कब्जा हो गया..? 

आज जिन तुरियों के पुण्य से वह देवता गांव में प्रकट हुआ था वे उसके मन्दिर तक को नहीं छू सकते। अछूत हो गए और ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व देवता पर भी स्थापित कर लिया। उस तुरी को कोई याद तक न करता। हां जब शहनाई, ढोल बजाने या नगाड़ा उठाने की बारी आती है तो पूजारी-पंच उस तुरी की दुहाई अवश्य देते हैं कि देवता को वे कितने प्यारे हैं। उनके बिना देवता एक कदम भी नहीं चल सकता। वे यदि देवता के कामकाज से पीठ फेरेंगे तो देवदोष के भागीदार।.......सचमुच मेरी हंसी निकल गई। मैं जैसे सपनों में ही हंसता रहा। 

रात का कोई पंछी आया और मेरे सिर के ऊपर से स्पर्श करता नीचे घाटी में उतर गया। उसकी आवाज कई पल मेरे कानों में सरसराती रही। उसी क्षण एक गीदड़ बोला, फिर दूसरे गीदड़......उनकी आपस में जैसे होड़ लग गई। हू....हू.......हू हू हू। फिर दूर-पार से कई कुत्तों के भौंकने की आवाजें।  

मैं क्या सोचने लगा हूं.......? सोच रहा हूं....? पर इसमें गलत भी क्या है ? गांव में इन सवर्ण पूजारियों और गूरों का ही तो बोलबाला है। वर्चस्व है। देवता के नाम पर ऐश.....? आप इनसे कभी मिलें तो जानेंगे कि अपने परिक्षेत्र में ये भी किसी मत्री या अफसर से कम नहीं। कोई नोकरी नहीं। चाकरी नहीं। बस पीढ़ी दर पीढ़ी देवता के पूजारी या गूर। गांव में सबसे ज्यादा हैसियत है उनकी। साहूकारी अलग चलती है। दबदबा बाकी का। जो कुछ दलित वे इनकी नोकरी-चाकरी में। देवता के द्वारपालों की तरह।.....घर में भी राजे और देवता के साथ बाहर भी। रोटी तब तक नहीं खाएंगे जब तक बकरे का मीट और बोतल दारू न मिले। देवता के नाम पर सब कुछ माफ.....? 

सोचते जाएं तो संदेह होता है कि सदियों से परम्परा के नाम पर हम दलित बेचारों के खिलाफ कोई साजिश तो नहीं ? अच्छे और सम्माननीय काम सवर्णों के लिए और गए-गुजरे दलितों के लिए। अब अगर मैंने ठंड से बचने के लिए एक रजाई मांग ली तो क्या गुनाह कर दिया? आदमी तो हम भी है। उन्हीं की तरह जीव है हमारे भीतर भी। उस पर इतना बवेला। पिता के साथ भी ऐसा ही होता होगा। पर देवता के भय और इन बड़ों को मान-प्रतिष्ठा देते-देते वे सठियाते गए पर जुबान न खोली। चुप रहो तो आप सबसे बढ़िया शहनाईए, ढोलिए, नगारची और इल्मदार। अपने हक की बात करेंगे तो आप कोली, चमार, डुमणे और चनालों की औलादें। हरामी, बतमीज.......पढ़ लिख कर बिगड़ते बदमाश?  

सोच कर खून खौल गया था मेरा। जोर से एक पत्थर पर हाथ मार दिया। हड्डी टूटने से बच गई पर काला निशान अभी तक भी नहीं गया। इस सोच में डूबा मैं आधी रात तो काट गया, पर घर पिता के सामने जाने की हिम्मत नहीं हुई। बैठा भी कितनी देर रहता। इतना समय तो रात के सहारे काट लिया। अब तो भोर होने लगी थी। सुबह का तारा भी काफी ऊपर आ गया था। पर धूरें अभी भी काले बादलों से ढकी थीं। मेरे पास न तो कोई बहाना था न ही कोई वास्तविक कारण कि मैं देवता को छोड़ कर कैसे चला आया। 

घर पहुंचा तो पहला सामना पिता से ही हुआ। मुझे देख कर वह ऐसे सहमे मानो सामने कोई बाघ-तेंदुआ आ गया हो। उनके मुंह से अचानक निकला, "तू......इतनी सुबह?"  
"हां पिता जी।"  
"पर क्यों ? जातर तो दिन भर है। देवता के साथ क्यों नहीं लौटा?"  

पहले सोचा कोई झूठ-मूठ का बहाना बना कर बात टाल जाऊं। पर अच्छा नहीं लगा कि पिता से यह सब कर सकूं। आखिर मैंने कोई गुनाह तो नहीं किया। न ही ऐसा कोई पाप किया। सच बोल दिया। पिता ने सुना तो आग बबूले हो गए। बरस पड़े मुझ पर। 

"तू बड़ा आया तीसमार खां। पूजारी से लड़ गया। जानता नहीं अपनी औकात। मैंने आज तक जितणी इज्जत कमाई पल में गंवा दी। हे भगवान पता नहीं अब क्या होगा। क्या बोलेंगे लोग कि फलां शहनाई मास्टर ने ऐसी औलाद पैदा की....। तेरे को आठ क्या पढ़ा दी कि तू देवता के पूजारी गूर से ही उलझने लगा। सच बोलते थे ये लोग कि पांव की जूती पांव में ही जचती है, सिर पर नही।"  

पिता जी पूरी तरह बिफर गए थे। मैं पहले जुबान खोलना नहीं चाहता था, पर इतना कुछ सुन कर चुप नहीं रहा गया। 
"मैं आपसे क्षमा चाहता हूं पिता जी। सच तो यह है कि आपकी इज्जत कोई नहीं करता। आप भले ही बड़े शहनाई मास्टर हैं पर हैं कोली-चमार ही। आपकी इज्जत इसलिए रही कि आपने कभी इन के आगे जुबान नहीं खोली। दरवाजे पर टुकड़ा दिया चाहे दहलीज के बाहर, आप कबूलते रहे। पर इनकी नफरत की नजरों ने आपको कभी जख्मी नहीं किया। देवता के साथ इतने सालों से चल रहे हैं आप। एक रुपया दिया तो वह सिरमाथे। दो रुपए दिए तो भी कबूल। खेत-खलिहान में सुलाया वह भी ठीक, ऐसे ही रात बितानी पड़ी तो वह भी गनीमत। पर क्या हमारी बिरादरी ये सब सहने के लिए ही हैं। हमारी न कोई इज्जत, न परतीत। न हम अपने लिए कुछ मांग सकते न बोल सकते। हम इस तरह इनसे दब कर कब तक रहेंगे ..?"  

मेरे गाल पर इतना जोर का तमाचा पड़ा कि मैं गिरते-गिरते बच गया। भीतर से मां दौड़ती हुई आई और उन्होंने मुझे सम्भाल लिया। पिता अभी भी बड़बड़ाए जा रहे थे। मां की समझ में कुछ नहीं आया कि आखिर बात क्या थी। वे मुझे घसीटते हुए भीतर ले गई। 

सारा दिन मन उदास रहा। पता नहीं अब देवता कमेटी की तरफ से क्या सजा मिलेगी ? सोचकर परेशान हो जाता। शाम ढलते ही देवता लौट आया था। बाजा सुनाई दिया तो दिल धड़क गया। एक लड़का भागता हुआ हमारे यहां आया था। उसने पूजारी का संदेश पिता को दिया कि उन्हें कोठी के पास बुलाया है। मुझे सुनाई दिया तो जैसे काठ मार गया। पिता तो बौखला ही गए। बोलते रहे.......पता नहीं इस नालायक की बजह से क्या सुनने को मिलेगा। क्या सजा भुगतनी पड़ेगी। कहीं मिलने-बरतने से बाहर ही न कर दें।  

मैं भी घबरा गया था। कहीं देवता कमेटी ने कोई सजा तय कर दी तो हमारी इतनी हैसियत भी नहीं कि हम उसका विरोध कर सके। फिर देवता कमेटी का फैसला तो देवबोल। उसके खिलाफ तो न फरियाद न कोर्ट कचहरी में अपील। मैं किसी बुरे अंजाम के बारे में सोच कर घबरा जाता।  

अचानक शिब्बु मिस्त्री की याद आ गई। कलेजा मुंह को आने लगा। कहीं आज देवता कमेटी द्वारा उस जैसी सजा सुना दी तो.......? मेरी आंखों के सामने वह पूरी घटना एक वृतचित्र की तरह घूमने लगी।........दो साल पुरानी बात है। ठाकुर रामसिंह के यहां देवता गया था। ठाकुर पंचायत का सरपंच भी था। शिब्बु मिस्त्री की कोई पुरानी मनौती होगी। उसने पैसे सांज-सांज कर देवता के लिए एक चांदी का बड़ा छत्तर गढ़ाया था। बुढ़ापे में आंखों की नजर भी कमजोर हो गई थी। उसने सोचा कि क्यों न अपनी मन्नत वहीं देकर निपटा लें।  

ठाकुर के घर पहुंचा तो उस समय देवपूजा हो रही थी। पूजा समाप्त हुई तो लोगों ने श्रद्धानुसार देवता को चांदी, सोना और पैसे चढ़ाने शुरू कर दिए। एक किनारे वह भी खड़ा था। पता नहीं क्या हुआ। उसे हल्का सा धक्का लगा और देवता के रथ के साथ गिर गया। पर संभल भी जल्दी गया था। उसका हाथ भर रथ से छू गया। फिर क्या था पूजारी और देवता के पंचो सहित ठाकुर रामसिंह ने सिर पर पहाड़ उठा दिया। उन्होंने उस गरीब हरिजन को बेसब्री से पीटा। भद्दी-अश्लील गालियां दीं। उसके नाक-मुंह से खून निकलने लगा। वहां ऐसा कोई नहीं था जो उस का पक्ष लेता। तरह-तरह की बातें होने लगी।.......हरामजादे ने देवता का रथ अपवित्र कर दिया। अब जातर नहीं हो सकती। इसकी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। फिर पिता ने ही बीच-बचाव किया था। 

लेकिन रथ को पवित्र करने के लिए बतौर सजा तत्काल एक बकरा देना तय किया गया। अब बेचारा शिब्बु बकरा कहां से देता। जो कुछ पैसा सांजा था उसका देवता के लिए छत्तर लेकर आया था। अपनी गौशाला में भी अब कोई पशु-बकरी नहीं था। जब उसने हाथ जोड़ कर असमर्थता प्रकट की तो उसी की बलि देने तक की बातें होने लगी। वह घबरा गया। पिता ने ही उसकी मदद की। उसी गांव में अपनी जान-पहचान से एक बकरा ले लिया और उसकी कीमत के दो हजार रुपए की खुद जमानत दे दी। शिब्बु मिस्त्री ने जो चांदी का छत्तर लाया था उसे स्वीकार करके देवता के रथ में लगा दिया गया। उसकी जान तो बची पर उसे अपने गांव से बेदखल कर दिया गया। इसमें पिता भी कुछ न कर सके। उसके बाद शिब्बु कहां गया किसी को कुछ पता नहीं। उसकी घरवाली भी बूढ़ी थी। वह उसे भी कहीं साथ ले गया। उसके पास दस-बारह बीघे जो जमीन थी उसे देवता कमेटी ने अपने नाम कर लिया। अब उस पर देवता के एक ब्राह्मण पंच का कब्जा है।........शिब्बु हरिजन का चांदी देवता को भा गया। उससे रथ अपवित्र न हुआ। एक ब्राह्मण उसकी जमीन बाह-खा रहा है उसे भी कोई छोत नहीं लगी। पर बेचारा शिब्बु.............? मैं तो सोच कर ही जैसे पागल हो रहा था। कहीं इसी तरह की सजा आज पिता को मिल गई तो........? 

पछतावा भी हो रहा था कि एक छोटी सी बात के लिए इतना हंगामा मचा दिया। क्या जरूरत थी ? सोया पड़ा रहता चुपचाप। मेरे में ही क्या सुरखाब के पर लगे थे। दूसरे भी तो लोग थे मेरे साथ। मैं ही कौन सा घी-दूध का बना था जो पिघल जाता। अपनी औकात में रहता। जैसे वह द्वारपाल गेट पर खड़ा रहता है। उसका गूर दूर खेलता है। उसने तो कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की कि वह नंगा है या उसके शरीर पर कपड़ा नहीं है। सचमुच तुझे प्रणाम है देवता.......क्यों तूने मुझे भी अपनी तरह थोड़ी सी शान्ती या अक्ल नहीं दी कि मैं भी ....? पर अब जो हो गया था उसका कोई समाधान नहीं था। अब बात देवता कमेटी पर थी। 

देर रात पिता लौटे तो काफी परेशान और उदास थे। उन्होंने किसी से कोई बात नहीं की। न ही मन लगा कर खाना ही खाया। सो भी जल्दी गए थे। मुझे शंका थी कि मेरी फिर शामत आएगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं भी रात भर करवटें बदलता रहा। सोचता रहा कि देवता कमेटी ने क्या सजा दी होगी? पिता भी शायद नहीं सो पाए। उनका बार-बार उठना, बाहर जाना और खांसना इस बात का गवाह था कि पूजारी ने जरूर कुछ ऐसी बातें की हैं जो उनके लिए असहनीय और अपमानजनक थीं। 

इस बात ने तूल पकड़ लिया था। बात आग की तरह हर जगह फैल गई। जहां देखो यही चर्चा थी। मुझे गाहे-बगाहे खबर मिल जाती। गांव में तो ब्राहमण और कनैत बिरादरी के लोग मुझे देख कर ही मुंह चिढ़ा लेते। सामने से आते तो किनारा कर लेते। कुछ-कुछ अपनी बिरादरी में भी ऐसा ही माहौल था, जैसे मुझे कोई अछूत रोग लग गया हो। मुझे दुख पिता जी का था कि उनके हृदय को बहुत चोट पहुंची है। उनके जख्मों को भरने का मेरे पास न कोई उपाय था न ही अब कुछ कहने की हिम्मत।  

एक दिन फिर देवता की कहीं जातरा थी। एक कारदार गांव-परगने में सभी को बुला गया था। वह पिछली शाम पिता के पास भी आया था।  

पिता सुबह से ही शहनाई का अभ्यास करने लगे थे। उन्होंने शहनाई बड़े दिनों से उठाई थी। वरना सुबह-शाम वे बराबर अभ्यास करते रहते थे। बीमारी के कारण शायद पहले उन्होंने तय किया होगा कि बेटा ही अब इस काम को संभाल लेगा पर उनके मन की वह आस भी जाती रही थी। जब मेरे कानों में शहनाई के पत्तों की पीं...पीं..और चीं...चीं सुनाई पड़ी तो मेरा मन कुछ शान्त हुआ। सोचा कि देवता कमेटी ने शायद कोई कड़ी सजा नहीं सुनाई है। इसीलिए पिता देवता के साथ जाने की तैयारी करने लगे हैं। मुझे भेजने का तो अब सवाल ही न था। उन्होंने अभ्यास तो डट कर किया लेकिन देवता के साथ आज वे भी नहीं गए। कई बार एक लड़का उन्हें बुलाने आया पर हर बार उन्होंने अनसुना कर दिया। 

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। पिता का कई दिनों बाद शहनाई का अभ्यास। बीच-बीच में उठना और मुझे देख जाना। चेहरे पर सहजपन। उन्होंने आंगन में आकर आज दो-तीन बार चिड़ियों को चावल भी डाले थे और उनके लिए पेड़ में टांगे पानी के पौ में पानी भी भर दिया था। कई दिनों बाद आंगन में चिड़ियों की चहचाहट भर आई थी। इसका मतलब मेरी बात का..........? इतना सोच कर मैं मन ही मन खुश हो गया। पर पिता के सामने जाने का साहस नहीं हुआ। न ही उन्होंने मुझ से कोई बात की। लेकिन मैं जैसे आज सातवें आसमान पर उड़ रहा था। 

अन्धेरा हुआ तो अपना ट्रंक खोला। पिछले सप्ताह पिता ने मुझे टेरीकोट का साढ़े पांच मीटर कपड़ा सादे सूट के लिए लाया था। उसे चुपके से निकाला और अपने सिरहाने के नीचे छुपा दिया। सुबह के इंतजार में सारी रात नींद नहीं आई। सुबह होते ही उठा। हाथ-मुंह धोए। सूट के कपड़े को काछ के बीच छुपाए बिल्ली के पांव आंगन से निकल कर देवता के मन्दिर की तरफ निकल पड़ा गया। हांपता हुआ पहुंचा। शुक्र है कोई रास्ते में नहीं मिला। इधर-उधर देखा। वहां कोई नहीं था। जूते बाहर खोले। गेट के भीतर गया। द्वारपाल देवता की मूर्ति के सामने आकर मथा टेका। सूट के कोरे कपड़े की तहें खोली और उसे मूर्ति के सिर से लेकर पांव तक लपेट दिया। 

बाहर इतमिनान से निकला। जूते पहने। पहले मन किया कि छोटे रास्ते से निकल जाऊं पर मन हुआ कि ब्राह्मणों की बेड़ से ही चला जाए।

कंकाल (रतन चंद 'रत्नेश' द्वारा अनूदित गुरुदेव टैगोर की कहानी)

जब मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली तो मेरे पिताजी ने वैद्य बनाने के उद्देश्य से मेरे लिए एक प्रसिद्घ और योग्य गुरु को नियुक्त  किया। मेरे नये गुरु न केवल देशी जड़ी-बूटी में महारत थे, बल्कि वे आधुनिक  चिकित्सा पद्घति भी जानते थे। मनुष्य के शरीर की संरचना समझाने के लिए उन्होंने एक मनुष्य का ढांचा अर्थात् नर-कंकाल मंगवा लिया, जो उसी कमरे में रखा गया, जहां मैं पढ़ता था। हर व्यक्ति  जानता है कि हड्डियों के पिंजर से कम आयु वाले बच्चे डरेंगे, खासकर जब वे अकेले होंगे। सच तो यह है कि मुझे भी डर लगता था और शुरू-शुरू में मैं कभी उस कमरे में अकेला नहीं जाता था। अगर कभी जाना भी पड़ जाता तो उसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखता था। एक और विद्यार्थी भी मेरा सहपाठी था। जो बहुत निडर था। वह कभी उस पिंजर से नहीं डरता था बल्कि कहा करता था कि इसकी औकात ही क्या है जो किसी जीवित व्यक्ति  को हानि पहुंचा सके। अभी हड्डियां हैं, कुछ दिनों बाद मिट्टी में बदल जाएंंगी। पर मैं इस विषय में उससे कभी सहमत न हो सकता और हमेशा यही कहता रहा कि माना कि आत्मा इन हड्डियों से विलग हो चुकी है, फिर भी जब तक इसका अस्तित्व रहता है, वह समय-असमय पर आकर अपने पुराने मकान को देख जाया करती है। दरअसल मेरा यह विचार अनोखा या असम्भव प्रतीत होता था और कभी किसी ने यह नहीं देखा होगा कि आत्मा फिर अपनी हड्डियों में वापस आई हो। पर यह एक अमर घटना है कि मेरा विचार सत्य था और सत्य निकला।
कुछ दिनों पहले की घटना है कि एक रात घर की आवश्यकताओं के चलते मुझे उस कमरे में सोना पड़ा। मेरे लिए यह नई बात थी। अत: नींद नहीं आई और मैं बहुत देर तक करवटें बदलता रहा। यहां तक कि पास के गिरजाघर ने बारह का घंटा भी बजा दिया। जो लैम्प मेरे कमरे में प्रकाश दे रहा था, वह मद्घम होकर धीरे-धीरे बुझ गया। उस समय मैंने उस प्रकाश के बारे में सोचा कि क्षण-भर पहले वह यहां था पर अब हमेशा के लिए अंधेरे में तब्दील हो गया है। संसार में मानव-जीवन की भी यही दशा है। जो कभी दिन और कभी रात के अनन्त में जा समाता है।
धीरे-धीरे मेरे विचार अस्थि-पिंजर की ओर परिवर्तित होने लगे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि भगवान जाने ये हड्डियां अपने जीवन में क्या कुछ न होंगी। सहसा मुझे ऐसा लगा मानो कोई अनोखी चीज मेरे पलंग के चारों ओर अन्धेरे में घूम रही है। फिर लम्बी सांसों की आवाजें, जैसे कोई दुखी व्यक्ति  सांस ले रहा हो। मुझे किसी के पांवों की आहट भी सुनाई दी। मैंने सोचा यह मेरा भ्रम है और बुरे सपनों के कारण काल्पनिक आवाजें आ रही हैं। पर पांव की आहट फिर सुनाई दी। इस पर मैंने अपना भ्रम दूर करने के लिए ऊंंचे स्वर में पूछा, ”कौन है?”
यह सुनकर वह अपरिचित व्यक्ति मेरे पास आया और बोला, ”मैं हूं! अपने पिंजर को देखने आई हूं।”
मुझे लगा कि मेरा कोई परिचित मुझसे मजाक कर रहा है। अत: मैंने कहा, ”यह भी कोई समय है पिंजर देखने का। असल में तुम चाहते क्या हो।”
स्वर सुनाई दिया, ”इस असमय से मुझे क्या मतलब? मेरी चीज है, मैं जिस समय चाहूं इसे देख सकती हूं। क्या तुम्हें नहीं दिखाई देता कि ये मेरी पसलियां हैं और जिनमें वर्षों मेरा हृदय रहा है। मैं पूरे छब्बीस वर्ष इस घोंसले में बन्द रही, जिसको अब तुम पिंजर कहते हो। यदि मैं अपने पुराने घर को देखने चली आई तो इसमें तुम्हें क्या आपत्ति है।”
मैं डर गया और उस आत्मा को टालना चाहा, ”अच्छा ठीक है, तुम जाकर अपना पिंजर देख लो, मुझे नींद आ रही है। मैं सोने लगा हूं।” मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह जैसे ही यहां से हटेगी, मैं भागकर बाहर चला जाऊंगा। पर वह टलने वाली नहीं थी, कहने लगी, ”क्या तुम यहां अकेले सोते हो? अच्छा आओ कुछ बातें करें।”
उसका आग्रह मेरे लिए व्यर्थ की विपत्ति से कम न था। मृत्यु की रूपरेखा मेरी आंखों के सामने घूमने लगी। फिर भी विवश होकर मैंने कहा, ”ठीक है, बैठ जाओ और कोई मनोरंजक बात सुनाओ।”
आवाज आई, ”तो सुनो। पच्चीस वर्ष पहले मैं भी तुम्हारी तरह मनुष्य थी और मनुष्यों में बैठ कर बातें किया करती थी, लेकिन अब सूने श्मशान में इधर-उधर घूमती रहती हूं। आज मेरी इच्छा हुई कि फिर से एक लम्बे अंतराल के बाद किसी  मनुष्य से बात करूं। मुझे प्रसन्नता हुई कि तुम मेरी बातें सुनने के लिए राजी हो गए। क्यों? तुम सचमुच मुझे सुनना चाहते हो या नहीं।”
यह कहकर वह आगे सरकी और मुझे लगा कि कोई व्यक्ति मेरे पायताने आ बैठा है। फिर इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, उसने अपनी कथा सुनानी आरम्भ कर दी।
”महाशय, जब मैं मनुष्य के रूप में थी तो सिर्फ एक व्यक्ति  से डरती थी और मेरे लिए मानो यमराज था। वह था मेरा पति। जिस प्रकार कोई मछली को कांटे में फंसाकर पानी से बाहर ले आता है, ठीक उसी तरह वह व्यक्ति  मुझे मेरे माता-पिता के घर से ले आया था और मुझे वहां जाने से रोकता था। अच्छा हुआ कि उसका पत्ता जल्दी ही साफ हो गया यानी कि विवाह के दूसरे महीने ही वह संसार से चल बसा। लोगों की तरह मैंने वैष्णव रीति से उसका क्रियाकर्म तो किया, पर मन से बहुत प्रसन्न थी कि उससे पीछा छूटा। अब मुझे अपने माता-पिता से मिलने की आज्ञा मिल जाया करेगी और मैं अपनी उन पुरानी सहेलियों से मिल सकूंगी जिनके संग खेला करती थी। पर अभी मुझे मायके जाने की आज्ञा मिलने ही वाली थी कि मेरे ससुर घर आए और मेरा चेहरा ध्यान से देखने के बाद बुदबुदाने लगे, ”मुझे इसके हाथ और पांव के चिन्ह देखने से लगता है कि यह लड़की डायन है।”
अपने ससुर के वे शब्द मुझे अब तक याद हैं। वे मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उसके कुछ दिनों बाद मुझे अपने पिता के यहां जाने की आज्ञा मिली। पिता के घर जाने पर जो खुशी मुझे मिली, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। मैं वहां आनंदपूर्वक अपने यौवन के दिन बिताने लगी। मैंने उन दिनों कई बार लोगों से अपने बारे में कहते सुना कि मैं बहुत सुन्दर हूं, पर तुम कहो तुम्हारी क्या राय है?”
मैंने कहा, ”मैंने तुम्हें जीवित देखा नहीं, मैं कैसे अपनी राय दे सकता हूं। जो कुछ तुमने कहा ठीक ही होगा।”
वह बोली, ”मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरी आंखें देखने वालों पर बिजलियां गिराती थीं। खेद है कि तुम मेरी वास्तविक मुस्कान का अनुमान इन हड्डियों के खुले मुखड़े से नहीं लगा सकते। इन हड्डियों के चारों ओर जो सौन्दर्य बिखरा था, अब उसका नामोनिशान नहीं।  मेरे जीवन के उन पलोंं में कोई योग्य-से-योग्य डाक्टर भी कल्पना नहीं कर सकता था कि मेरी हड्डियां मानव-शरीर की रूप-रेखा दर्शाने के काम आएंगी। मुझे वे दिन याद हैं जब मैं चला करती थी तो प्रकाश की किरणें मेरे एक-एक बाल से निकलकर प्रत्येक दिशा में फैल जाती थीं। मैं अपनी बांहों को घण्टों निहारा करती थी। आह, ये वे बांहें थीं, जिसे भी दिखाईं, वही आसक्त होकर रह गया। सम्भवत: सुभद्रा को भी ऐसी बांहें नसीब न हुई होंगी। मेरी कोमल और पतली उंगलियां कमल नाल को भी मात देती थीं। खेद है कि मेरे इस नग्न-ढांचे ने तुम्हें मेरी सुन्दरता को लेकर बिल्कुल झूठी राय निर्धारित करने का अवसर दिया। तुम मुझे यौवन के क्षणों में देखते तो तुम्हारी आंखों से नींद उड़ जाती और इस आयुर्वेदिक ज्ञान की ललक मस्तिष्क से अशुद्घ शब्द की भांति समाप्त हो जाती।
उसने कहानी अबाध रूप से जारी रखी, ”मेरे भाई ने निर्णय लिया कि वह विवाह नहीं करेगा। इस तरह घर में मैं ही एकमात्र महिला थी। जब शाम को मैं अपने बगीचे में छायादार वृक्षों के नीचे बैठती तो तारे मुझे घूरा करते और मेरे पास से गुजरती शीतल हवा तो मेरे साथ अठखेलियां करने लगतीं। मैं अपनी सुन्दरता पर इतराती और अक्सर सोचा करती थी कि जिस धरती पर मेरे पांव पड़ते हंै, अगर उसमें अनुभव करने की शक्ति  होती तो प्रसन्नता से फूली न समाती। कभी ऐसा लगता जैसे संसार के सारे प्रेमी युवक घास के रूप में मेरे पैरों पर पड़े हैं। अब ये समस्त विचार मुझे दुखी करते हैं कि आह! क्या था और क्या हो गया।
”मेरे भाई का एक मित्र सतीश कुमार था जिसने मेडिकल कालेज से डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की थी। वह हमारा भी घरेलू डाक्टर था। वैसे उसने मुझेे नहीं देखा था पर मैंने उसे एक दिन देख ही लिया और मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं कि उसकी सुन्दरता ने मुझे बेहद प्रभावित किया। मेरा भाई अजीब किस्म का व्यक्ति  था। वह कभी घर के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता और न ही कोई हस्तक्षेप करता। उसे  मौन और एकान्त प्रिय था जिसका परिणाम यह हुआ कि संसार से विरक्त होकर वह एकान्तप्रिय बन गया और साधु-महात्माओं सा जीवन बिताने लगा।”
”हां तो वह युवक सतीश कुमार हमारे यहां अक्सर आता। वही एक ऐसा था, अपने घर के पुरुषों के अलावा जिसे मुझे देखने का संयोग प्राप्त हुआ था। जब मैं बगीचे में अकेली होती और फूलों से लदे हुए वृक्ष के नीचे महारानी की तरह बैठी रहती, मेरे मन में सतीश कुमार का ख्याल कुछ अधिक ही आने लगता।  पर तुम किस सोच में डूब गए। तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है?”
मैंने ठंडी सांसें लेते हुए कहा, ”मैं यह सोच रहा हूं कि कितना अच्छा होता कि मैं ही सतीश कुमार होता।”
वह हंसकर बोली, ”अच्छा, पहले मेरी कहानी सुन लो फिर प्रेमालाप कर लेना। एक दिन वर्षा हो रही थी। मुझे कुछ बुखार था। उस समय डाक्टर यानी कि मेरे प्रिय सतीश मुझे देखने आए। यह पहला अवसर था जब हम दोनों ने एक-दूसरे को आमने-सामने देखा और देखते ही डाक्टर मूर्ति की तरह जड़ हो गए। तब मेरे भाई की मौजूदगी ने उन्हें होश संभालने के लिए बाध्य कर दिया। वे मेरी ओर इशारा करके बोले, ”मैं इनकी नब्ज देखना चाहता हूं।” मैंने धीरे-से अपना हाथ दुशाले से बाहर निकाला। डाक्टर ने मेरी नब्ज पर हाथ रखा। मैंने कभी नहीं देखा है कि कोई डाक्टर  साधारण ज्वर के निरीक्षण में इतना सोच-विचार करता हो। उनके हाथ की उंगलियां कांप रही थीं। बड़ी मुश्किल से उन्होंने मेरे ज्वर को अनुभव किया, पर मेरा ज्वर टटोलते-टटोलते वे स्वयं ही बीमार हो गए। क्यों, तुम इस बात को मानते हो या नहीं?”
मैंने डरते-डरते कहा, ”हां, बिल्कुल मानता हूं। मनुष्य में बदलाव आना स्वाभाविक है।”
उसने आगे कहा, ”कुछ दिनों बाद मुझे भान हुआ कि मेरे मन में डाक्टर के अलावा और किसी युवक का विचार तक नहीं आया। शाम के समय हर रोज बसन्ती रंग की साड़ी पहनकर बालों में कंघी, गले में फूलों का हार डाले, बगीचे में जाकर घंटों स्वयं को आइने में निहारती। क्यों, क्या दर्पण देखना बुरा है?”
मैंने घबराकर कहा, ”नहीं तो।”
उसने कहानी का सिलसिला जारी रखते हुए कहा, ”आइना  देखकर मैं ऐसा अनुभव करती जैसे मेरे दो रूप हों यानी कि मैं स्वयं ही सतीश कुमार बन जाती और स्वयं ही अपने प्रतिबिम्ब को प्रेमिका समझकर उस पर तन-मन न्यौछावर करती। यह मेरा बहुत ही प्रिय मनोरंजन था और मैं घण्टों बीता देती। कई बार ऐसा हुआ कि दोपहर को बिस्तर पर लेटकर जरा-सी झपकी लेती तो सपने में सतीश कुमार आ जाते और मेरे हाथ को चूम लेते। बस, अब मैं कहानी समाप्त करती हूं, तुम्हें तो नींद आ रही है।”
मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी। अत: मैंने नम्रतापूर्वक कहा, ”नहीं, तुम कहती जाओ, मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।”
वह राजी हो गई, ” ठीक है, सुनो! कुछ ही दिनों में ही सतीश कुमार का कारोबार बहुत बढ़ गया और उसने हमारे मकान के नीचे के हिस्से में अपनी डिस्पेन्सरी खोल ली। जब उसे रोगियों से अवकाश मिलता तो मैं उसके पास जा बैठती और हंसी-मजाक में तरह-तरह की दवाइयों का नाम पूछती रहती। इस प्रकार मुझे ऐसी दवाओं के बारे में भी जानकारी मिल गई जो घातक होती हैं। मैं उससे जो कुछ पूछती, वह बड़े प्रेम और नम्रता से बताया करता। इस तरह एक लम्बा समय बीत गया और मैंने अनुभव किया कि डाक्टर साहब होशोहवाश खोये से रहते है और जब कभी मैं उसके सामने जाती हूं तो उसके चेहरे पर मुर्दनी-सी छा जाती है। पर ऐसा क्यों होता है? इसका कोई कारण मैं जान न सकी। एक दिन डाक्टर ने मेरे भाई से गाड़ी मांगी। मैं पास बैठी थी। मैंने भाई से पूछा, ”डाक्टर साहब रात में इस समय कहां जा रहे हैं?” उसने कहा, ”बर्बाद होने।”
मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अत: उससे अनुरोध किया कि मुझे बताए कि वे कहां जा रहे हंै? भाई ने कहा, ”वह विवाह करने जा रहा है।” यह सुनकर मुझ पर पहाड़ टूट पड़ा, पर मैंने अपने-आपको संभाला और भाई से फिर पूछा, ”क्या वह सचमुच विवाह करने जा रहे हंै या तुम मुझसे मजाक कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया, ”सच यही है कि आज वह दुल्हन लेकर आएगा।”
”मैं बता नहीं सकती कि इस बात ने मुझे कितना कष्ट पहुंचाया। मैंने अपने आप से यह प्रश्न बार-बार पूछा कि डाक्टर ने मुझसे यह बात क्यों छिपाकर रखी। क्या मैं उन्हें रोकती कि विवाह मत करो? इन पुरुषों की बात का कोई विश्वास नहीं।
”दोपहर को वे रोगियों को देखकर डिस्पेन्सरी में आए तो मैंने उनसे पूछा, ”डाक्टर साहब! क्या यह सच है कि आज आपका विवाह है?” यह कहकर मैं बहुत हंसी और डाक्टर यह देखकर कि मैं इस बात को हंसी में उड़ा रही हूं, न केवल लज्जित हुए  बल्कि कुछ चिन्तित भी दिखे। फिर मैंने सहसा पूछा, ”डाक्टर साहब, क्या आप विवाह के बाद भी लोगों की नब्ज देखा करेंगे? आप तो डाक्टर हैं और अन्य डाक्टरों की अपेक्षा प्रसिद्घ भी। आप शरीर के सारे अंगों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं पर मुझे खेद है कि एक डाक्टर होकर भी किसी के हृदय के बारे में नहीं जान पाते हैं कि वह किस दशा में है जबकि हृदय भी शरीर का एक अंग है।”
मेरे शब्द डाक्टर को तीर की भांति लगे, पर वे मौन रहे।
”लग्न का मुहूर्त देर रात गए निश्चित हुआ था और बारात देर से जानी थी। अत: डाक्टर और मेरा भाई रोज की तरह शराब पीने बैठ गए और इस शगल में उन्हें बहुत देर हो गई।
ग्यारह बजने को थे कि मैं उनके पास गई और कहा, ”डाक्टर साहब, ग्यारह बजने वाले हैं। आपको विवाह के लिए तैयार होना चाहिए।” वे कुछ हद तक सचेत हो गए और बोले, ”अभी होता हूं।”
वे फिर से मेरे भाई के साथ बातों में तल्लीन हो गए और मैंने अवसर पाकर जहर की पुडिय़ा, जो मैंने दोपहर को डाक्टर की अनुपस्थिति में उनकी अलमारी से निकाली थी, उनके सामने रखे शराब के गिलास में डाल दी। कुछ ही देर में डाक्टर ने अपना गिलास खाली किया और दूल्हा बनने के लिए चले गए। मेरा भाई भी उनके साथ चला गया।”
”मैं अपने दो मंजिले कमरे में गई और नई बनारसी साड़ी पहनी। फिर मांग में सिंदूर भरकर सुहागन के वेश में बगीचे में चली गई जहां प्रतिदिन शाम को बैठा करती थी। उस समय चांदनी छिटकी हुई थी। हवा में सिहरन थी और चमेली की सुगन्ध ने बगीचे को महका दिया था। मैंने पुडिय़ा में बची जहरीली दवा निकाली और उसे मुंह में डाल लिया। थोड़ी देर में मेरा सिर चकराने लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। चांदनी मद्घम पड़ गई। धरती-आकाश, पेड़-पौधे और अब मेरा घर जहां मैं अपनी उम्र बिता रही थी,  सब धीरे-धीरे लुप्त होते हुए चले गए और मुझे मीठी नींद आ गई।”
”डेढ़ साल के बाद सुख के सपने से चौंकी तो मैंने क्या देखा कि तीन विद्यार्थी मेरी हड्डियों से डाक्टरी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और एक अध्यापक मेरी छाती की ओर बेंत से इशारा करके लड़कों को विभिन्न हड्डियों के नाम बताते हुए कर रहे हैं, ”यहां हृदय रहता है, जो विवाह और दु:ख के समय धड़कता है और यह वह स्थान है जहां युवावस्था में फूल खिलते हैं।” अच्छा अब मेरी कहानी समाप्त होती है। मैं विदा लेती हूं, तुम भी सो जाओ।”
बांग्ला से अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’

चित्रांकन : संदीप जोशी

लघुकथा: भैस बड़ी (रतन चंद 'रत्नेश')

पहाड़ में गांव। गांव में एक किनारे पर बसा गरीब घर। घर में दो विधवाएं - सास और बहू। आगे बहू के तीन बच्चे और थोड़ा-सा खेत। आय का साधन -- विधवा पेंशन और गोड (गोशाला) में बंधी भैसों के दूध की बिक्री। सौभाग्य से इन दिनों दोनों भैसों में दूध था। बच्चों के लिए थोड़ा-सा दूध बचाकर बाकी सारा पास के ही एक दुकान में भेज दिया जाता और इस प्रकार किसी तरह परिवार का गुजर-बसर हो रहा था।
गरीबी में आटा भी अक्सर गीला होता ही रहता है। एक दिन अचानक दोनों भैसें एक साथ बीमार पड़ गईं और दुर्भाग्य दबे पांव ऐसे आया कि उसी दिन घर का एक बच्चा भी रोगग्रस्त हो गया।
तत्क्षण झाड़-फूंक करने वाले गांव के चेले को बुलाया गया। चेला समझदार था। उसे ज्ञान था कि गांव के मुहाने पर खुले देसी ठेके के दारू ने उसके पुश्तैनी मंत्र-सिद्धि को बेअसर कर दिया है। जंत्र और धूणी-धागे का अब कोई असर नहीं होता। मंत्रोच्चारण करते समय भी षब्द अटक-भटक जाते हैं। अब न पशुओं के ओपरे पर उसका वश चलता है, न बच्चों की आधि-व्याधि पर। पर फिर भी गांव के गरीबों का वही सबसे पहला उद्धारक था। उसके प्रति आस्था बची हुई थी। भैसों पर उसने बुदबुदाते हुए हाथ फेरा। लगे हाथों ज्वर-पीड़ित बच्चे पर भी मोर-पंखों का मुठ चलवा दिया गया।
  ‘‘ओपरे का इलाज तो मैंने कर दिया है पर डंगर-डाक्टर को भी दिखा लेणा चाहिदा। इस बरसात में पीने का पानी गंदा हो जाने के कारण माणू (मनुष्य) ही नहीं, माल-मवेशी भी बीमार पड़ रहे हैं।’’ कहकर चेले ने मंत्रसिद्ध आटे का बटा हुआ पेड़ा (लोई) दोनों भैसों के मुंह में धकेला और अपना कोहाड़ू (कुल्हाड़ी) उठाकर चलता बना।
दोनों विधवाओं के चेहरे पर परेशानी की रेखाएं उभर आयीं। घर में एक बच्चा भी ताप से तप रहा था। लिहाजा एक मानव-चिकित्सक और एक पशु-चिकित्सक दोनों की बराबर आवश्यकता  आन पड़ी थी, पर दोनों के इलाज के लिए पैसे........ ?
यों तो पंचायत में एक पशु-चिकित्सालय भी था जो सारा दिन खुला रहता  पर वहां डाक्टर नामके उस सरकारी कर्मचारी के कभी कभार ही दर्शन  होते। छः गांवों में से पता नहीं किस गांव में वह गुम हुआ रहता। अतः गांव से आधा किलोमीटर दूर सड़क के किनारेवाले प्राइवेट डंगर-डाक्टर की ही पूछ थी। कुछ लोग कहते कि सरकारी पशु-चिकित्सालय से गायब रहने की एवज में उस सरकारी कर्मचारी को इस प्राइवेट डंगर-डाक्टर से कुछ बंधी-बंधाई मिलती है। पता नहीं, यह झूठ था या सच?
सास न बहू को देखा और बहू ने सास को और आंखों ही आंखों में अंतिम निर्णय हो गया। गोड की बीह पर चिंतामग्न बैठी सास उठकर प्राइवेट डंगर-डाक्टर को बुलाने चल पड़ी।


भ्रष्टाचारियों का ड्रेस-कोड : रतन चंद ‘रत्नेश’




वैसे तो रिश्वत  लेना और देना हमेशा चर्चा का विषय  रहता है। एक कांड की चर्चा कुछ दिनों तक होती है, उसके बाद कोई नया कांड सामने आ जाता है तो उसकी चर्चा आरंभ हो जाती है। पुराना कांड हासिये पर चला जाता है। यों भी इनसान के दिमाग का आकार इतना छोटा है कि उसमें सभी कांडों को झेलने की ताकत नहीं होती, इसलिए पुराने कांडों को डिलीट यानी कि हटाते रहना पड़ता है। पिछले दिनों सिटी ब्यूटीफुल में भी एक रिश्ववत कांड सुखियों में था जो अब धीरे-धीरे धूमिल होने लगा है। यों तो मुझ जैसे साधारण लोगों को रिश्ववत कांड से कुछ लेना-देना नहीं होता लेकिन यह जानकर तब बड़ा दुःख होता है जब पांच-दस हजार रूपए की रिश्ववत लेते हुए कोई पकड़ा जाता है। बड़ी शर्म महसूस होती है। लोग छोटी-मोटी रकम रिश्वतस्वरूप लेते हैं और उससे भी शर्मनाक बात यह होती है कि वे पकड़े जाते हैं। मेरा यह मानना है कि जो सैकड़ों-हजारों में रिश्वत लेते हैं, वे या तो अनाड़ी होते हैं या फिर अज्ञानी। उन्हें कम से कम इतना ज्ञान होना चाहिए कि आज के दौर में कितना
रिश्वत लेना वाजिब है। उन कमअक्लों को यह भी पता नहीं होता कि जो शख्स पांच हजार की रिश्वत दे रहा है, वह उन्हें मूर्ख समझ रहा है। भला आज के जमाने में रिश्वत में हजारों का क्या काम? इससे बेहतर यह है कि आप रिश्वत देने वाले को पकड़वा दें और अपना सर गर्व से ऊंचा करें। आखिरकार रिश्ववत लेने में भी अपनी औकात बनाए रखना समझदारी की निशानी है।
भ्रष्टाचार के मामले में हम पचास से भी अधिक देशों से आगे हैं। कम से कम एक मिसाल तो कायम की ही जा सकती है कि यहां लाख से नीचे लेन-देन नहीं होता। जो लाख से नीचे रिश्वत लेते धरे जाते हैं, उनके लिए ड्रेस-कोड  तो अवश्य होना चाहिए ताकि आइंदा से कोई कम रिश्वत लेने की हिमाकत न करे। ड्रेस-कोड  का अर्थ स्पष्ट करना यहां उचित रहेगा। इस मामले में फिलहाल शीर्षस्थ भ्रष्ट देश इंडोनेशिया में विचार-विमर्श चल रहा है। वहां के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का मानना है कि भ्रष्टाचार मामले के आरोपियों के लिए यदि ड्रेसकोड निर्धारित कर दिया जाय तो शायद वे कुछ शर्म  महसूस करें। एक विशेष  रंग के कपड़े पहने व्यक्ति को देखते ही लोग जान जाएगें कि वह भ्रष्टाचारी है। इससे दूसरे लोगों को भ्रष्टाचार से दूर रहने का सबक मिलेगा। वहां की आम जनता ने यह सुझाव भी दे डाला है कि ड्रेस-कोड  का रंग चटख लाल या गुलाबी रखा जाय। हमारे देश में भ्रष्टाचार के लिए इन रंगों का ड्रेस-कोड चुना गया तो इसका उल्टा असर हो सकता है। भ्रष्टाचारी कहीं अपने आप को फिल्मी सितारे न समझने लगें और शर्म महसूस करे के वजाय कुछ ज्यादा ही गौरान्वित महससू करने न लग जाएं। यहां के लिए काला रंग ही शायद बेहतर रहेगा क्योंकि ऐसे लोगों का मुंह काला करने की हमारे यहां प्राचीन परम्परा है। इंडोनेशिया करप्शन -वाच की राय है कि ड्रेस-कोड के पीछे आरोपी का नाम, केस संख्या आदि का भी उल्लेख हो। हमारे यहां राज्य का नाम लिखना भी जरूरी है क्योंकि कई बार राज्यों में भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त होड़ देखने को मिलती है। कई लोगों की मानसिकता ही यही रहती है कि हम किसी मामले में पीछे न रहें, चाहे वह भ्रष्टाचार ही क्यों न हो। इंडोनेशिया  में भ्रष्टाचार-निरोधक इकाई के उपप्रमुख एम.जेसिन के अनुसार विशेष पोशाक पहनाकर किसी कैदी को जेल में डाला जाए ताकि वह अलग दिखे तथा अन्य कैदी यह जान सकें कि उसे भ्रष्टाचार के अपराध में सजा मिली है। इस मामने में भी हमारे यहां दिक्कत है। भ्रष्टाचारी को पहचान-चिह्न मिलते ही कई लोग उसे गॉडफादर बनाने के लिए व्यग्र हो उठते हैं। पुलिस भी उनकी सेवा में ऐसे जुट जाती है मानो वही उनका बेड़ा पार करेगा।
पुनश्चः मौजूदा भ्रष्टाचारी-निरोधक जो घमासान चल रहा है, उसमें इस पर भी विचार किया जाए.

आज के लोकार्पण

 शहर के मेन बस स्‍टैंड के पास बड़े दिनों से महिला शौचालय बनकर तैयार था पर कमेटी के प्रधान बड़ी दौड़ धूप के बाद भी उस शौचालय के लोकार्पण के लिए मंत्री जी से वक्‍त नहीं ले पा रहे थे और महिला यात्री थे कि पुरुष शौचालय में जाने के लिए विवश थे। पर वहां जब देखो कुत्‍ते लेटे हुए। अब कमेटी के कर्मचारियों का शौचालय की रखवाली करना मुश्‍किल हो रहा था। वे किस किसको कहते फिरें कि अभी इस शौचालय का मंत्री जी ने लोकार्पण नहीं किया है। लोगों को तो चलो जैसे कैसे मना लिया जाए पर औरों को कौन समझाए?सभी के आगे हाथ जोड़ते- जोड़ते बेचारों के अति हो गई थी।और आज कमेटी के प्रधान को बधाई देने की शुभ घड़ी आ पहुंची। बारह बजे महिला शौचालय को मंत्री जी ने जनता को समर्पित करना था। सुबह नौ बजे से शहर के सभी विभागों के मुखिया नाक पर रूमाल रखे सांसें रोके वहां खड़े हुए। मैंने उन्‍हें कहा ,‘ साहब !नाक पर रूमाल तो वाजिब है पर शौचालय के पास अभी से नाक पकड़ कर खड़े होने की जरूरत नहीं। अभी तो इसका लोकार्पण भी नहीं हुआ है,' पर वे अपनी नाक पर रूमाल रखे रहे। पता नहीं क्‍यों? मेरी समझ में आज तक नहीं आया।शौचालय को शादी के मंडप की तरह सजाया गया था गोया वहां किसी के फेरे लगने हों। पास ही लोक संपर्क विभाग वालों ने देश भक्‍ति के गीत पुरजोर चलाए हुए थे। उन्‍हें पता था कि मंत्री जी के दादा जी स्‍वतंत्रता सेनानी थी। छद्‌म थे ये केवल विपक्ष वाले कहते हैं। वैसे भी असली लोग फल की इच्‍छा रखते ही कहां हैं?आखिर एक बजे मंत्री जी का काफिला बस स्‍टेंड पहुंचा तो अफसरों की जान में जान आई। एक अफसर जो कोने जैसे में खडा. था अपने मोबाइल में टाइम देख मुंह में ही बड़बड़ाया,‘ साले ने भूखा मार कर रख दिया। अपने आप तो पता नहीं कहां -कहां काजू- बादाम मार कर आ रहा होगा।' कमेटी की सुंदर जवान महिला कर्मचारियों को खास तौर पर इओ ने सज धज कर आने को कहा था। उन्‍हें असल में मुस्‍कुराते हुए मंत्री जी को रिसीव करना था। मंत्री जी ने अपने स्‍वागत के लिए चार- चार सुंदर महिलाएं मुस्‍कुराते हुए अपनी राह में पलकें बिछाएं देखीं तो उनके चेहरे पर से एक झुर्री और गायब हुई।कुछ देर तक जुटाई गई भीड़ की ओर से खुश हो मंत्री जी कमेटी के प्रधान की पीठ थपथपाते रहे तो वह फूल कर कुप्‍पा हुए। उन्‍हें तय लगा कि अब वे किसी बोर्ड के चेयरमेन कभी भी हुए। देखते ही देखते उनका गला फूल मालाओं से पूरी तरह घुट गया। यह देख साथ चले पीए ने पूछा भी,‘सर! आपका गला फूलों से घुट रहा हो तो निकाल दूं?' पर वे उसकी बात को अनसुनी कर गए। आखिर उन्‍होंने महिला शौचालय के द्वार पर मुस्‍कराती लाल साड़ी में खड़ी, थाली में फूल, कैंची, तिलक लिए सुंदर नवयौवना को मंद मंद मुस्‍कराहट से देखा तो उसे लगा कि अब वह भी पक्‍की हो गई। महिला ने ज्‍यों ही मंत्री जी के माथे पर सिंदूर का टीका लगाया, उन्‍होंने अपने मन के वहम को बनाए रखने के लिए गठिया हुए हाथ से एक झटके से थाली से कैंची उठाई और खच से शौचालय के द्वार पर बंधा रिबन काट दिया। रिबन कटते ही पूरा बस स्‍टेंड अफसरों, पार्टी वर्करों की तालियों से गरज उठा। रिबन कटने के बाद ज्‍यों ही मंत्री जी शौचालय में जाने लगे तो पीए ने उन्‍हें रोक उनके कान में कहते उनसे पूछा,‘ सर! कहां जा रहे हैं आप?'‘लोकार्पण नहीं करना है क्‍या!?'‘ ये महिला शौचालय का लोकार्पण है सर! पुरुष शौचालय का नहीं।'‘ तो क्‍या हो गया! जाएंगे तो यहां मर्द ही। दूसरे हम मंत्री हैं, कहीं भी जा सकते हैं। मैं केवल पुरूषों का ही मंत्री थोड़े हूं। बल्‍कि महिलाओं का मंत्री अधिक हूं। पीछे हटो,' वे पीए को धक्‍का दे अंदर जाने को हुए तो पीए ने उनके कान में फुसफुसाया,' अखबार वाले आ गए हैं। एक ने तो कैमरा भी आपकी ओर ही कर रखा है', तो वे संभले और जिस पैर अंदर को चले थे उसके साथ सौ पैर और बाहर को मुड़े तो पार्टी वर्करों की जान में जान आई।महिला सशक्‍तीकरण हेतु महिला शौचालय के लोकार्पण के बाद मंत्री जी सीधे रेस्‍ट हाउस गए। वहां पर वे केवल खासमखासों से ही मिले। कमेटी के प्रधान को कार्यक्रम की सफलता की बधाई देते उन्‍होंने पूछा,‘ वे स्‍वागत के लिए अप्‍सराएं किस लोक से लाए थे?'‘ अपनी कमेटी की हैं साहब!' कह प्रधान मुस्‍कुराया।‘गड! वैरी गुड!! मेन टेन करके रखा है कमेटी को?'‘बस जनाब की दुआ है।'‘मन लग रहा है यहां?'‘मतलब, मैं समझा नहीं जनाब का???'‘राजधानी में एक बोर्ड के चेयरमेन का पद खाली है। कहो तो??'‘आपकी दुआ चाहिए बस!' कह कमेटी प्रधान उनके चरणों में गिरा तो उन्‍होंने उसकी पीठ थपथपाई,‘ तो अब राजधानी जाने की तैयारी करो ।'काफी देर तक वे रेस्‍ट हाउस पसरे रहे। पार्टी वर्कर उनसे मिलना चाहते थे पर उन्‍होंने यह कह कर टाल दिया कि वे कई दिनों के थके हैं। अगली बार वे उनसे ही मिलने आएंगे। अभी वे वीआईपी बेड पर पड़े उनका स्‍वागत करने वाली महिलाओं के रूप सौंदर्य के बारे में सोच-सोच मस्‍त हुए जा रहे थे कि दरवाजे पर ठक- ठक हुई तो वे भीतर से ही बोले,‘ कौन??'‘ मंत्री जी!मैं पार्टी का जिला अध्‍यक्ष। आपसे अजेंर्ट काम है।'‘तो कल फोन पर बता देना,' उन्‍होंने अनमने से कहा।‘एक लोकार्पण और है साहब! आप अपने सोने वाले समय में से तनिक हमें दे देते तो हमारा उद्धार हो जाता।' उसने कहा तो उनकी बांछें खिल गईं। वे आनन- फानन में बेड पर से उठे और दरवाजा खोल बोले,‘ आओ, भीतरी आओ! कहो, कहां का लोकार्पण है?'‘ मनरेगा के तहत बने नए श्‍मशान घाट का!!' दरवाजा खुलने की देर थी कि जिला प्रधान के साथ चार पांच और जबरदस्‍ती भीतर घुस गए।‘यार! ये क्‍या मजाक कर रहे हो?श्‍मशान घाट का लोकार्पण करने को मंत्री ही रह गया क्‍या! अपने उस कब्र में टांगें लटकाए एमएलए से करवा लेते।'‘मंत्री जी, वह अपोजीशन का है।' सभी ने एक सुर में कहा तो मंत्री जी का गुस्‍सा कम हुआ,‘ पर श्‍मशान घाट!'‘ जनाब! उस श्‍मशान घाट पर दस गांवों के मुर्दे जलने आते हैं।'‘तो एक गांव में कितने वोटर हैं?'‘दस गांवों के कुल पांच सौ तो हैं ही। और वे सरकार से इन दिनों नाराज भी चल रहे हैं।'‘क्‍यों??'‘कह रहे हैं सरकार ने उनके इलाके से रूख ही मोड़ लिया है। अगर वे ऐसे ही नाराज रहे तो जनाब अगले चुनाव में हम कहीं के न रहेंगे,‘ जिला प्रधान ने कहा तो उनके चेहरे पर चिंता की रेखा खिंच आई। काफी देर तक सोचते रहने के बाद बोले,‘ तो??'‘तो आप जाने साहब! हमारी डूबती नैया की पतवार आपके हाथों में हैं। हमें जनता के बीच मुंह दिखाने लायक बना दीजिए बस! आप जो एकबार श्‍मशान घाट का लोकार्पण कर दें तो आगे तो हम खुद संभाल लेंगे। पांच सौ वोट अपने पक्‍के।' सबने एक साथ कहा तो वे एकबार फिर जवान हुए,‘पर वहां भीड़ कहां से आएगी? तुम्‍हें तो पता है कि मैं रोटी के सहारे नहीं समारोह में जुटी भीड़ के सहारे जीता हूं।'‘ आप वह चिंता न कीजिए। यह काम हमारे जिम्‍मे रहा। हजारों तो वहां पहले ही बैठे हैं। उन्‍हें भी तालियां बजाने के लिए मजबूर न कर दिया तो हम भी कर्मठ पार्टी वर्कर नहीं! आपको वहां हम हरगिज भी निराश नहीं होने देंगे।'‘ तो एक काम करते हैं!'‘कहो मंत्री जी?'‘श्‍मशान घाट के लोकार्पण को ऐतिहासिक बनाने के लिए सीएमओ को फोन करो। और हां !वहां जाने को कतना समय लगेगा?'‘एक घंटा सर।'‘तो सारे विभागों को कह दो कि मंत्री जी चार घंटे बाद अमुक श्‍मशान घाट का लोकार्पण करने जा रहे हैं। वहां सब पहुंच जांए।'‘सीएमओ से क्‍या कहना है मंत्री जी??'‘उससे कहो कि मंत्री जी श्‍मशान घाट का लोकार्पण करने जा रहे हैं। एक मुर्दे का इंतजाम करो। पर एक बात ध्‍यान रखी जाए कि मुर्दा विपक्ष का हो। अपने पक्ष का हम मुर्दा भी खोना नहीं चाहते। मेरे पीए को बुलाना।'भीतर से आकर पीए ने सीएमओ को फोन लगाया,‘ कौन? सीएमओ ?'‘जी!'‘मैं मंत्री जी का बोल रहा हूं।'‘कहिए, क्‍या सेवा है मेरे लायक?' वह फोन सुनते -सुनते कुर्सी से खड़े हो गए।‘मंत्री जी एक मुर्दा चाहते हैं। इसी वक्‍त! वह भी अपोजीशन का!'‘पर इस वक्‍त तो․․․․․'‘मैं कुछ नहीं जानता! मंत्री जी ने चाहा है तो बस चाहा है․․․․' और फोन कट गया।देखते ही देखते सारे विभागों की गाडियां अपने- अपने अफसरों को लादे श्‍मशान घाट की ओर हवा पर बैठ दौड़ीं।․․․․․․․सीएमओ साहब की गाड़ी मुर्दा लिए सबसे आगे। बेचारे! पसीना पोंछते भगवान का धन्‍यवाद करते थक नहीं रहे थे। भगवान ने उनकी सुन ली जो ऐन मौके पर गलत इंजेक्‍शन लगने से बंदा मंत्री जी को प्‍यारा हो गया। वरना पद की गरिमा को सदा सदा के लिए बट्‌टा लग जाता।--

हिंदी ! तेरा झाड़ा अमृत

शांति कीतलाश में दिन रैन कस्‍तूरा हो भटक रहे मेरे शहर में एकाएक किसी ऐरे गैरे नत्‍थूखैरे बाबा के आने पर जो हाल बेहाल हो जाता है वही हाल बेहाल हिंदी पखवाड़े के आनेपर मेरे देश का हो जाता है। जो आदरणीय बंधु सारा साल अंग्रेजी थूक- थूक कर पूरेदेश का थोबड़ा थुकियाए रहते हैं इन दिनों वे बगल में हिंदी के बजट रुपी बकरे कीखाल लिए, जुबान पर चाशनीकी तरह किसी के अच्‍छे से निबंध के दो चार पहरे चिपकाए, करमंड़ में सौदो सौ भारी भरकम ठेठ हिंदी के शब्‍द लिए, हाथ में हिंदी के पॉलिशड्शब्‍दों की मालाफेरते- फेरते,हर विभागमें हिंदी की धुनी जमाए स्‍वयं को देश का सबसे बड़ा हिंदी प्रेमी कहते जीभ सुखाएनहीं थकते। वाह रे बायस समय के फेर! विभाग हैं कि इस पखवाड़े हिंदी के साथ की सारेसाल की गुस्‍ताखियों से उऋण होने के लिए के हिंदी के कल्‍याणार्थ सड़कों पर कबाड़ीके कपड़ों के ढेरों की तरह बजट के ढेर लिए बैठे होते हैं। पर बेचारों को उठानेवाला ही नहीं मिलता। अब वे भी सच्‍चे हैं। पंद्रह दिन में साल भर पिचके पेट रहनेवाला कितना की खा लेगा? इन दिनों जिस विभाग ने साहित्‍यिक गऊओं को जितना ग्रास दियाउसे हिंदी ने उतना अधिक फल दिया।
सच कहूंतो हिंदी पखवाड़े में इतना आकर्षण होता है कि․․․․कि इतना तो अपने जमाने में मेनका और उर्वशी में भी नहीं रहाहोगा। अगर आज भी मेनका , उर्वशी होतीं तो इस पखवाड़े में सारा साल इनकी चौखट पर पड़ेरहने वाले बुद्धिजीवी इन दिनों हिंदी की चौखट पर ही ड़ार लेते,पेट पर हाथफेरते ही दिखते,मेरी तरह।
सारी उम्रअपने पुरखों और हिंदी को दाने दाने से मोहताज रखने वाले उनका श्राद्ध जिस लगन सेकरते हैं तो लगता है देश में धर्म अभी भी शेष है। पूरी तन्‍मयता से , सारी लोक लाजछोड़ पांव में हिंदी के घुंघरू बांध हे हर मंच पर नाचने वालो हिंदी प्रेमियों!! आपकोशत्‌ शत्‌ नमन्‌! आपका हिंदी प्रेम हर पे्रम से बड़ा है। याद रखना! आपके कंधों परही हिंदी का सारा भार है। पंद्रह दिन तक तो आप हर मंच पर ऐसे नाचो कि घुघंरू टूटजाएं तो टूट जाएं। लोक लाज छूट जाए तो छूट जाए। पर हर हाल में बजट खत्‍म होना चाहिए।अगर ये न हुआ तो हिंदी को बहुत बुरा लगेगा कि कैसे हिंदी प्रेमी हैं? उसके लिए रखाबजट तो खा नहीं सके और फिर दावा ये कि हमसे बड़ा कोई हिंदी प्रेमी नहीं! आप ये सबकर अपना पेट नहीं हिंदी का पेट भर रहे हो। इन दिनों आप जितना खाओगे वह आपको नहींदुर्बल हिंदी को ही लगेगा। आप तो हिंदी का पेट भरने के लिए माध्‍यम हो बस! इसलिएमन में कोई संकोच नहीं, कोई हीन सोच नहीं। वैसे मुझे पता है अधिकतर हिंदी प्रेमीसोच और संकोच से ऊपर उठे हुए होते हैं।
कल यों हीअपने गांव की साल भर सूखे रहने वाले तालाब के पास से गुजर रहा था। पर भैंसे हैं किसूखे तालाब की मिट्‌टी में लोट पोट हो ही अपने में स्‍वदेशी होने का बहम पाले रहतीहैं। उसमें मेंढक टर्रा रहे थे। एक मेंढक ने मुझे वहां से जाते देखा तो सूखे तालाबको फांद मेरे आगे खड़ा हो गया बोला,‘ और हिंदी प्रेमी! क्‍या हाल है?'
‘ठीक हूं।'
‘बैठो! कोई कविता-शविता हो जाए! बड़े दिनों से तुम्‍हारी कोई ताजा चोरी हुई कविता नहीं सुनी।' उसने कहा तोमुझे गुस्‍सा आ गया। हद है यार! हम मर गए चोरी के लिए हाथ पांव मारते- मारते और येमेंढक हैं कि․․․․․ आप ही कहो, चोरी के लिए क्‍याहाथ पैर नहीं मारने पड़ते? ऊपर से चोरी की कविता के कवि से जो उसके मन में आए सुनतेरहो। कवि जिंदा तो जिंदा, मरे भी अपनी कविता पर फणिधर की तरह कुंड़ी मारे बैठे रहतेहैं। अपनी कविता को हम जैसों का हाथ नहीं लगाने देते तो नहीं लगाने देते । इनकीकविता पर हाथ साफ करना महीनों भूखे शेर के मुंह में हाथ डालने से कम नहीं होता।मैं तो कहता हूं ये सब करना किसी मौलिक कविता को लिखने से सौ गुणा ज्‍यादा मेहनतका काम है । हम जैसे जब इनकी कविता की ओर बढ़ते ही हैं कि ये नरक से भी भौंकनाशुरू कर देते हैं। खैर, मैंने उसकी बात का कोई बुरा नहीं माना क्‍योंकि बुरा मानजाता तो हिंदी पखवाड़े की रात्रि पर कविता सुनाने जाने का सारा मजा किरकिरा होजाता।
सच कहूं, आजकल तो मेरेजैसों के मजे ही मजे हैं। हरिद्वार के पंडे की तरह एक मिनट की भी फुर्सत नहीं।सबेरे नौ बजे से हिंदी प्रेमी विभागों में पदिआना शुरू कर देता हूं कि सिलसिला रातको भी चलता रहता है। मैंने उसके द्वारा जले पर खुद ही गुलाब जल ड़लते कहा,‘ अभी तो हिंदी काउद्धार करने के लिए एक आयोजन में जा रहा हूं। पर तुम बिन पानी ही सूखे तालाब मेंटर्र -टर्र क्‍यों किए जा रहे हो?'
‘तो अपनी कवितायहीं सुना दो न! हम भी हिंदी पखवाड़ा मना रहे हैं।' उसने कहा औरहाइकू के नाम पर दो बाद टर्र- टर्र की।
‘पर सूखे तालाबमें? यार इन दिनों तोहिंदी की फटी किताबें भी तर हो जाती हैं और तुम हो कि․․․ क्‍या किसी विभाग ने तुम्‍हें टर्राने के लिएबजट नहीं भेजा?इन दिनोंतो हिंदी में ,टर्राने तोटर्राने, खुर्राने वालेभी साल भर के लिए पैसा इकट्‌ठा कर टाटा हुए जा रहे हैं,' मैंने कहा तोमेंढक बिन कुछ कहे सूखे तालाब में जा मरा, सिर झुकाए। चलो देश में किसी को तो सच सुननेपर शर्म आई।
चोरी कीकविताओं के असहनीय भार वाले थैले को कांधे पर उठाए मैं वहां से सीधा हिंदी पखवाड़ेके कवि आयोजन में। वहां देखा तो हैरानी हो गई! कवि गोष्‍ठी में कई साल पहले दिवंगतकवि अधिक तो दूसरे गिनती के ! हद है यार! मरने के बाद भी कवि गोष्‍ठी नहीं छूटी।आखिर मैंने एक को आयोजकों की नजर बचा किनारे ले जाते पूछ ही लिया,‘ बंधु ये क्‍या! अबतो चैन करते। अगर मरने के बाद भी हिंदी पखवाड़े की गोष्‍ठियों में यों ही आतेरहोगे तो हम तो जिंदा जी ही मर लिए। यही पंद्रह दिन ही तो होते हैं हिंदी प्रेमीहोने का अहसास करने के लिए। हमें मारना ही है तो लो हमारे गले में अंगूठा दे दो।दिवंगत हुए पितृ पक्ष में आते ही शोभा देते हैं। वे कवि हों या श्रोता! कब है तुम्‍हाराश्राद्ध?'
‘ मेरे श्राद्धमें क्‍या तुम ऐसी सेवा करोगे जैसी यहां हो रही है?इस पखवाड़े के कार्यक्रमों में आ तो हमएक बार फिर जिंदा हो उठते हैं। साल भर इस पखवाड़े का इंतजार रहता है और तुम कहतेहो कि․․․'अब समझा! मेरेदादा ने अपना श्राद्ध पितृ पक्ष के सबसे बाद वाले दिन करने को क्‍यों कहा? वे भी कभी कभारअपने को हिंदी हिमायती कहा करते थे।